नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच चल रहे व्यापार समझौते को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने रविवार को साफ शब्दों में कहा कि व्यापार से जुड़े लोगों को विदेशी बयानों की जगह भारत पर भरोसा करना चाहिए। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटनिक के दावों को भारत सरकार ने खारिज कर दिया है।
एक कार्यक्रम में मीडिया से बात करते हुए पीयूष गोयल ने कहा, “व्यापार समझौते की बातचीत मीडिया में नहीं की जाती। भारत पर भरोसा करें, विदेशी बयानों पर नहीं। अपने देश पर, अपनी मातृभूमि भारत पर विश्वास रखें।” यह टिप्पणी तब आई जब उनसे भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की स्थिति के बारे में पूछा गया।
अमेरिकी वाणिज्य सचिव के विवादित बयान
पिछले हफ्ते अमेरिकी वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटनिक ने एक बयान में दावा किया था कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन नहीं किया। उन्होंने कहा था कि कुछ अन्य देशों के नेताओं ने ट्रंप को फोन किया और उन्हें भारत पर लगाए गए 50 फीसदी शुल्क की तुलना में कम शुल्क मिल गया।
इस बयान पर भारत सरकार ने तुरंत सख्त जवाब दिया था। विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि इन परिस्थितियों पर की गई टिप्पणी “सटीक नहीं” है। साथ ही मंत्रालय ने दोहराया कि भारत एक ऐसे द्विपक्षीय व्यापार समझौते में रुचि रखता है जो दोनों देशों के लिए फायदेमंद हो।
व्यापार वार्ता की असली स्थिति
अब तक भारत और अमेरिका के बीच पांच दौर की बातचीत हो चुकी है। भारत ने अपना संशोधित प्रस्ताव भी पेश कर दिया है। इस प्रस्ताव में भारत ने “महत्वपूर्ण रूप से खुलने” की इच्छा जताई है, लेकिन साथ ही अपने संवेदनशील क्षेत्रों जैसे कृषि, डेयरी और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों की सुरक्षा की बात भी कही है।
हालांकि, वाशिंगटन ने अभी तक इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है और बातचीत में एक तरह का गतिरोध बना हुआ है। दोनों देश अपने-अपने हितों को ध्यान में रखते हुए बातचीत कर रहे हैं, लेकिन किसी ठोस नतीजे तक पहुंचना अभी बाकी है।
रूसी तेल आयात का मुद्दा
समय-समय पर राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत द्वारा रूसी तेल के आयात का मुद्दा भी उठाया है। इस पर भारत का रुख बिल्कुल साफ रहा है। भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह अपने उपभोक्ताओं के सर्वोत्तम हित में नीतियां बनाएगी और खरीदारी करेगी।
भारत ने खुलकर यह भी कहा है कि वह अमेरिका से अधिक ऊर्जा खरीदने के लिए तैयार है। यह रुख दर्शाता है कि भारत अपनी जरूरतों और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देते हुए भी अमेरिका के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए इच्छुक है।
देश में बहस का माहौल
पीयूष गोयल के इस बयान ने देश में एक नई बहस को जन्म दिया है। कुछ लोग मानते हैं कि व्यापार मामलों में विदेशी बयानों के बजाय भारत सरकार पर भरोसा करना चाहिए। उनका तर्क है कि देश की नीतियां देश के हित में ही बनाई जाती हैं।
दूसरी तरफ, कुछ आलोचक सरकारी नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं। वे मानते हैं कि कुछ फैसले आम लोगों के लिए नुकसानदेह साबित हो रहे हैं। नेतृत्व की योग्यता पर भी कुछ लोगों ने सवाल खड़े किए हैं।
आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
हालांकि, एक बड़ा वर्ग आत्मनिर्भरता और भारतीय उद्यमों को समर्थन देने की वकालत कर रहा है। इन लोगों का मानना है कि भारत को अपनी ताकत पर भरोसा करना चाहिए और विदेशी दबाव में आकर फैसले नहीं लेने चाहिए।
यह विचारधारा भारत सरकार की “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसी योजनाओं से भी मेल खाती है। सरकार लगातार यह कोशिश कर रही है कि भारतीय उद्योग मजबूत हों और देश अपनी जरूरतों के लिए आत्मनिर्भर बने।
वर्तमान व्यापार नीति का दृष्टिकोण
भारत की वर्तमान व्यापार नीति संतुलित दृष्टिकोण पर आधारित है। एक तरफ सरकार विदेशी निवेश और व्यापार को बढ़ावा दे रही है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू उद्योगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रही है। यह खासतौर पर कृषि और छोटे उद्योगों के मामले में देखा जा सकता है।
अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में भी यही नीति अपनाई जा रही है। भारत चाहता है कि समझौता दोनों देशों के लिए फायदेमंद हो, लेकिन इसके लिए वह अपने महत्वपूर्ण क्षेत्रों से समझौता करने को तैयार नहीं है।
आगे की राह
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता एक जटिल मामला है जिसमें दोनों देशों के आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं। पीयूष गोयल का बयान इस बात का संकेत देता है कि भारत सरकार अपनी शर्तों पर बातचीत करने के लिए तैयार है, न कि किसी दबाव में आकर।
विदेश मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय दोनों ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत एक न्यायसंगत और संतुलित व्यापार समझौते के पक्ष में है। ऐसा समझौता जो भारत के किसानों, छोटे उद्यमियों और आम उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करे।
समय बताएगा कि यह व्यापार वार्ता किस दिशा में जाती है। लेकिन फिलहाल भारत सरकार का रुख स्पष्ट है – देश के हित सर्वोपरि हैं और उनसे कोई समझौता नहीं किया जाएगा। यह रुख दर्शाता है कि भारत अब एक मजबूत और आत्मविश्वासी देश के रूप में अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात रख रहा है।