Bengaluru Student Suicide: कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में एक डेंटल कॉलेज की 23 वर्षीय छात्रा द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटना ने न सिर्फ कॉलेज परिसर, बल्कि पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। बताया जा रहा है कि मृतका थर्ड ईयर की छात्रा थी और 9 जनवरी को उसका शव उसके ही घर में फांसी के फंदे से लटका मिला। इस घटना के बाद कॉलेज प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से छह लेक्चरर्स को निलंबित कर दिया है। आरोप है कि इन शिक्षकों ने छात्रा के रंग, कपड़ों और भाषा को लेकर सार्वजनिक रूप से आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं, जिसने उसकी आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुंचाई।
कॉलेज परिसर में क्या हुआ उस दिन
परिजनों के अनुसार, छात्रा आंख में दर्द के कारण एक दिन कॉलेज नहीं जा सकी थी। उसी दिन कॉलेज में एक सेमिनार आयोजित था, जिसमें उसकी अनुपस्थिति दर्ज हुई। जब वह अगले दिन कॉलेज पहुंची, तो उसे कक्षा में सभी छात्रों के सामने सवालों और टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। यह कोई साधारण फटकार नहीं थी, बल्कि ऐसी बातें कही गईं, जो सीधे उसकी पहचान और आत्मविश्वास पर वार करती थीं।
रंग और कपड़ों पर टिप्पणी का असर
छात्रा की मां ने बताया कि प्रोफेसर्स ने बेटी के रंग को लेकर टिप्पणी की और यहां तक कह दिया कि ऐसे व्यक्ति डॉक्टर बनने के योग्य नहीं होते। कपड़ों और बोलचाल के तरीके पर भी सवाल उठाए गए। यह घटनाक्रम बताता है कि शब्दों की चोट कितनी गहरी हो सकती है। कभी-कभी शारीरिक चोट से ज्यादा मानसिक अपमान इंसान को तोड़ देता है।
परिवार का दर्द और टूटता भरोसा
मृतका अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। बेटी को खोने के बाद मां का दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि उनकी बेटी को सरेआम बेइज्जत किया गया और उसी अपमान ने उसे आत्महत्या जैसे कदम की ओर धकेल दिया। यह घटना माता-पिता के उस भरोसे को भी तोड़ती है, जिसके साथ वे अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज भेजते हैं।
छात्रों का आक्रोश और सवाल
घटना के बाद कॉलेज के छात्रों ने धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया। छात्रों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है, जब किसी छात्र को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया हो। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार एक जान चली गई। छात्रों की मांग है कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो और कॉलेज में ऐसा माहौल बने, जहां सम्मान और संवाद की जगह हो, न कि डर और अपमान की।
प्रशासन की कार्रवाई
कॉलेज प्रशासन ने छह प्रोफेसर्स को निलंबित कर जांच के आदेश दिए हैं। पुलिस ने भी मामला दर्ज कर लिया है और जांच जारी है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या निलंबन ही पर्याप्त है। क्या इससे उस मानसिक पीड़ा की भरपाई हो सकती है, जो छात्रा ने झेली? और क्या इससे भविष्य में ऐसी घटनाएं रुक पाएंगी?
शिक्षा बनाम संवेदनशीलता
यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था केवल डिग्री देने तक सीमित रह गई है। शिक्षक का दायित्व सिर्फ पढ़ाना नहीं, बल्कि मार्गदर्शन और समर्थन देना भी होता है। जब वही शिक्षक अपमान का स्रोत बन जाएं, तो छात्र कहां जाए। मानसिक स्वास्थ्य, सम्मान और सहानुभूति को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाए बिना ऐसी त्रासदियों को रोका नहीं जा सकता।