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मकर संक्रांति 2026: षटतिला एकादशी के साथ बन रहा दुर्लभ संयोग, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

Makar Sankranti Time, Makar Sankranti 2026: षटतिला एकादशी के साथ बन रहा दुर्लभ संयोग, जानें शुभ मुहूर्त
Makar Sankranti Time, Makar Sankranti 2026: षटतिला एकादशी के साथ बन रहा दुर्लभ संयोग, जानें शुभ मुहूर्त (AI Photo)

इस वर्ष मकर संक्रांति विशेष रूप से पुण्यदायक है क्योंकि कई सालों बाद षटतिला एकादशी का संयोग बन रहा है। सर्वार्थ सिद्धि योग और सूर्य-शुक्र युति इस दिन का महत्व बढ़ा रही है। 14 फरवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे। 14 और 15 जनवरी दोनों दिन स्नान-दान के लिए शुभ रहेंगे। तिल, गुड़, खिचड़ी और वस्त्र दान करना विशेष फलदायी माना जा रहा है।

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भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति का पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व हर साल जनवरी माह में मनाया जाता है जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस बार का मकर संक्रांति पर्व बेहद खास होने वाला है क्योंकि कई वर्षों के बाद षटतिला एकादशी और मकर संक्रांति का संयोग एक साथ बन रहा है। इसके साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग भी बनने से इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है।

क्यों खास है इस बार की मकर संक्रांति

इस साल मकर संक्रांति का पर्व विशेष रूप से पुण्यदायक माना जा रहा है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस दिन कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है। षटतिला एकादशी का योग मकर संक्रांति के साथ मिलना एक दुर्लभ घटना है जो कई सालों में एक बार ही देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस प्रकार के संयोग में किया गया स्नान, दान और पूजा कई गुना फल देने वाला होता है।

सूर्य और शुक्र की युति भी इस दिन को और अधिक शुभ बना रही है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा का कारक और शुक्र को सुख-समृद्धि का कारक माना जाता है। इन दोनों ग्रहों का एक साथ मिलन व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने वाला होता है।

मकर संक्रांति की तिथि और समय

इस बार सूर्य देव 14 फरवरी के दिन मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इसी दिन से मकर संक्रांति का पर्व शुरू होगा। हालांकि, इस बार की खासियत यह है कि स्नान और दान के लिए दो दिन शुभ माने जा रहे हैं। 14 जनवरी और 15 जनवरी दोनों दिन ही पवित्र स्नान और दान-पुण्य के लिए उत्तम रहेंगे। धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि इन दोनों दिनों में किया गया कोई भी धार्मिक कार्य विशेष फलदायी होता है।

पंचांग के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सुबह के समय को स्नान के लिए सबसे उत्तम माना गया है। सूर्योदय से पहले पवित्र नदियों या घर पर ही स्नान करने का विशेष महत्व है। इसके बाद दान-पुण्य का कार्य करना चाहिए।

स्नान और दान का महत्व

मकर संक्रांति के दिन स्नान और दान को अत्यधिक पुण्यदायक माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है। गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी जैसी पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है। यदि पवित्र नदी में स्नान संभव न हो तो घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है।

स्नान के बाद दान करने की परंपरा है। इस दिन तिल, गुड़, खिचड़ी, कंबल, वस्त्र और अनाज का दान करना शुभ माना जाता है। गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन कराना भी इस दिन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन किया गया दान सौ गुना फल देता है।

सर्वार्थ सिद्धि योग का लाभ

इस बार मकर संक्रांति पर सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है जो अत्यंत शुभ माना जाता है। इस योग में शुरू किया गया कोई भी शुभ कार्य सफल होता है। व्यापार, नौकरी, शिक्षा या किसी भी नए कार्य की शुरुआत के लिए यह समय बहुत अच्छा है। इस योग में किए गए मंत्र जाप और पूजा-पाठ का फल कई गुना बढ़ जाता है।

ज्योतिषीय दृष्टि से यह योग तब बनता है जब कुछ विशेष ग्रह स्थितियां एक साथ मिलती हैं। इस योग में किए गए कार्यों में बाधा नहीं आती और सफलता निश्चित मानी जाती है।

षटतिला एकादशी का महत्व

षटतिला एकादशी व्रत का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है। यह एकादशी माघ मास के कृष्ण पक्ष में आती है। इस व्रत में तिल का विशेष महत्व होता है। तिल से स्नान, तिल का दान, तिल का भोजन, तिल की आहुति, तिल का उबटन और तिल युक्त जल पीने का विधान है। इसीलिए इसे षटतिला कहा जाता है।

जब यह एकादशी मकर संक्रांति के साथ आती है तो इसका महत्व और बढ़ जाता है। ऐसे में व्रत और दान दोनों का फल अधिक मिलता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से विशेष लाभ होता है।

पूजा विधि और परंपराएं

मकर संक्रांति के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर सूर्य देव की पूजा करनी चाहिए। सूर्य को जल अर्पित करते समय उनके मंत्रों का जाप करना शुभ होता है। इसके बाद घर में पूजा स्थल पर दीपक जलाकर भगवान की आराधना करनी चाहिए।

इस दिन खिचड़ी बनाने की परंपरा है। कई स्थानों पर इसे खिचड़ी पर्व के नाम से भी जाना जाता है। तिल और गुड़ के लड्डू बनाकर भोग लगाया जाता है। पतंग उड़ाने की परंपरा भी मकर संक्रांति से जुड़ी हुई है।

विभिन्न क्षेत्रों में उत्सव

मकर संक्रांति पूरे भारत में अलग-अलग नामों से मनाई जाती है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति कहते हैं तो दक्षिण में पोंगल के रूप में मनाया जाता है। पंजाब में लोहड़ी, असम में बिहू और गुजरात में उत्तरायण के नाम से यह पर्व प्रसिद्ध है। हर जगह अपनी-अपनी परंपराओं के साथ यह त्योहार मनाया जाता है।

दान में क्या दें

मकर संक्रांति पर तिल, गुड़, चावल, दाल, कंबल, ऊनी कपड़े, अनाज और फल दान करना शुभ माना जाता है। गाय को चारा खिलाना और ब्राह्मणों को भोजन कराना भी पुण्यदायक है। जरूरतमंदों की सहायता करना इस दिन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। जितना हो सके उतना दान करने से घर में सुख-समृद्धि आती है।

ज्योतिषीय महत्व

ज्योतिष के अनुसार मकर संक्रांति से सूर्य की उत्तरायण गति शुरू होती है। इस समय से दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी। उत्तरायण को देवताओं का दिन माना जाता है। इस समय से शुभ कार्यों की शुरुआत की जा सकती है। विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों के लिए यह समय अच्छा होता है।

इस दिन सूर्य और शुक्र की युति से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। यह समय आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी उत्तम माना जाता है। ध्यान, मंत्र जाप और योग साधना के लिए यह समय विशेष फलदायी होता है।

मकर संक्रांति का यह पर्व हमें प्रकृति के साथ जुड़ने और सामाजिक सद्भावना का संदेश देता है। दान और परोपकार की भावना इस त्योहार की मुख्य विशेषता है। इस बार बन रहे दुर्लभ योगों के कारण यह पर्व और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

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Asfi Shadab

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