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नागपुर विश्वविद्यालय में आदिवासी शिक्षा और विकास पर आयोजित हुई संगोष्ठी

Nagpur University Tribal Education Seminar: नागपुर विश्वविद्यालय में आदिवासी शिक्षा पर संगोष्ठी का आयोजन
Nagpur University Tribal Education Seminar: नागपुर विश्वविद्यालय में आदिवासी शिक्षा पर संगोष्ठी का आयोजन

नागपुर के राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज विश्वविद्यालय में आदिवासी शिक्षा और विकास पर संगोष्ठी आयोजित की गई। कुलगुरु डॉ. मनाली क्षीरसागर की अध्यक्षता में हुए कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने आदिवासी समाज की शैक्षिक, सामाजिक और स्वास्थ्य चुनौतियों पर चर्चा की। संगोष्ठी में आदिवासी संस्कृति, ज्ञान परंपरा और महिला सशक्तिकरण पर जोर दिया गया।

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नागपुर के राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज विश्वविद्यालय में आदिवासी समाज की शिक्षा और विकास को लेकर एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम डॉ. अनंत एवं लता लाभशेटवार व्याख्यानमाला के तहत आयोजित हुआ, जिसमें विशेषज्ञों ने आदिवासी समुदाय के सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पहलुओं पर गहन चर्चा की। शुक्रवार 16 जनवरी 2026 को हुए इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर समाजशास्त्र विभाग ने मेजबानी की।

संगोष्ठी का आयोजन और उद्देश्य

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर समाजशास्त्र स्वायत्त विभाग ने इस एक दिवसीय संगोष्ठी को आयोजित करके आदिवासी समाज के मुद्दों को सामने लाने का प्रयास किया। आदिवासी शिक्षा और विकास जैसे विषय समाज के लिए बेहद जरूरी हैं क्योंकि यह समुदाय आज भी कई चुनौतियों का सामना कर रहा है।

संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य आदिवासी समुदाय की शैक्षिक स्थिति, सांस्कृतिक पहचान, महिलाओं के संघर्ष और पारंपरिक ज्ञान को समझना था। साथ ही यह जानना भी जरूरी था कि किस तरह से इनके विकास में सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं मदद कर सकती हैं।

कुलगुरु ने किया कार्यक्रम का संचालन

इस संगोष्ठी की अध्यक्षता माननीय कुलगुरु डॉ. मनाली क्षीरसागर ने की। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि आदिवासी समाज देश का एक अहम हिस्सा है और उनकी शिक्षा और विकास पर ध्यान देना हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि शिक्षा ही वह माध्यम है जो किसी भी समुदाय को सशक्त बना सकती है।

कुलगुरु ने विश्वविद्यालय की ओर से आदिवासी छात्रों के लिए विशेष शैक्षिक कार्यक्रम और छात्रवृत्ति योजनाओं की जानकारी भी दी। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय आदिवासी समाज के युवाओं को उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसर देने के लिए प्रतिबद्ध है।

मानव विज्ञान संकाय अधिष्ठाता का विशेष संबोधन

मानव विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता डॉ. शामराव कोरेटी ने प्रमुख अतिथि के रूप में कार्यक्रम में हिस्सा लिया। उन्होंने अपने संबोधन में बताया कि भारतीय आदिवासी समाज देश के करीब 40 प्रतिशत भू-भाग में फैला हुआ है। यह समुदाय प्रकृति के साथ सीधे जुड़ा हुआ है और जंगल, जल स्रोत, औषधीय पौधे और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा में अहम भूमिका निभाता है।

डॉ. कोरेटी ने कहा कि आदिवासी समाज के पास पोषणयुक्त खाद्य पदार्थों और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का गहरा ज्ञान है जो आधुनिक समय में भी प्रासंगिक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस ज्ञान को संरक्षित करना और आगे बढ़ाना जरूरी है।

आदिवासी समाज और शिक्षा की चुनौतियां

संगोष्ठी में वक्ताओं ने आदिवासी समुदाय की शिक्षा से जुड़ी समस्याओं पर विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि दूरदराज के इलाकों में स्कूल और कॉलेज की कमी, गरीबी, भाषा की बाधा और सामाजिक भेदभाव जैसी समस्याएं आदिवासी बच्चों की शिक्षा में बाधा बनती हैं।

समाजसेविका श्रीमती कुमारीताई जमकातन ने आदिवासी महिलाओं की शिक्षा की स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आदिवासी लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना बेहद जरूरी है क्योंकि शिक्षित महिलाएं समाज को बदल सकती हैं। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे शिक्षा के माध्यम से आदिवासी महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं।

स्वास्थ्य और पोषण का महत्व

हमारे स्वास्थ्य के लिए संस्था के अध्यक्ष डॉ. मुकेश शेंडे ने आदिवासी समुदाय में स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति पर बात की। उन्होंने कहा कि आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है और पोषण की जानकारी भी पर्याप्त नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को इन इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और मोबाइल हेल्थ यूनिट की सुविधा बढ़ानी चाहिए।

डॉ. शेंडे ने यह भी कहा कि आदिवासी समाज की पारंपरिक औषधीय जानकारी को आधुनिक चिकित्सा से जोड़ने की जरूरत है। इससे न केवल उनकी सेहत बेहतर होगी बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान भी मजबूत होगी।

आदिवासी संस्कृति और ज्ञान परंपरा का संरक्षण

श्री इजामसाय कातेंगे ने आदिवासी संस्कृति और ज्ञान परंपरा के संरक्षण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी भाषा, लोक कला, नृत्य, गीत और परंपराएं हैं जो उनकी पहचान हैं। लेकिन आधुनिकीकरण की होड़ में ये धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं।

उन्होंने सुझाव दिया कि स्कूलों में आदिवासी भाषा और संस्कृति को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। इससे नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का मौका मिलेगा और उन्हें गर्व महसूस होगा।

विभागाध्यक्ष ने दी महत्वपूर्ण भूमिका

विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक बोरकर ने संगोष्ठी की भूमिका और महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि समाजशास्त्र विभाग का उद्देश्य समाज के हर वर्ग के मुद्दों को शैक्षिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझना है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज पर शोध और अध्ययन की जरूरत है ताकि नीति निर्माताओं को सही दिशा मिल सके।

डॉ. बोरकर ने यह भी बताया कि विभाग में आदिवासी अध्ययन से जुड़े विशेष पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिसमें छात्रों को जमीनी स्तर पर काम करने का मौका मिलता है।

सामाजिक विकास की दिशा में कदम

संगोष्ठी में यह बात उभरकर आई कि आदिवासी समाज का विकास तभी संभव है जब उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मान के समान अवसर मिलें। सरकारी योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करने की जरूरत है। साथ ही समाज के अन्य वर्गों को भी आदिवासी समुदाय के प्रति संवेदनशील बनना होगा।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि आदिवासी युवाओं को कौशल प्रशिक्षण और उद्यमिता विकास कार्यक्रमों में शामिल किया जाए। इससे वे अपने परंपरागत कौशल को आधुनिक रोजगार से जोड़ सकेंगे।

कार्यक्रम का संचालन और समापन

कार्यक्रम का संचालन डॉ. राजश्री कापसे ने बखूबी किया। उन्होंने सभी वक्ताओं का परिचय देते हुए संगोष्ठी को सुचारु रूप से आगे बढ़ाया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रियंका अंबादे ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और उपस्थित लोगों का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रम समाज में जागरूकता लाने में सहायक होते हैं।

इस संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के छात्र, शोधकर्ता, शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए। सभी ने आदिवासी समाज के सर्वांगीण विकास के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत पर जोर दिया। यह कार्यक्रम आदिवासी शिक्षा और विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।

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Asfi Shadab

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