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स्पेन ने ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस को किया खारिज, संयुक्त राष्ट्र पर जताया भरोसा

Spain Rejects Board of Peace: स्पेन ने ट्रंप की पहल को ठुकराया, UN पर बरकरार है विश्वास
Spain Rejects Board of Peace: स्पेन ने ट्रंप की पहल को ठुकराया, UN पर बरकरार है विश्वास (Image Source: X/Screengrab)
स्पेन ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया है। प्रधानमंत्री सांचेज ने कहा कि स्पेन का भरोसा संयुक्त राष्ट्र पर बरकरार है। फिलिस्तीनी प्राधिकरण की गैरमौजूदगी भी इनकार का कारण है। यूरोपीय देशों ने भी इस पहल से दूरी बनाई है जबकि मध्य पूर्व के कुछ देशों ने सहमति दी है।
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Spain Rejects Board of Peace: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी पहल ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को एक और झटका लगा है। नाटो सहयोगी देश स्पेन ने इस पहल में शामिल होने के निमंत्रण को साफ शब्दों में अस्वीकार कर दिया है। स्पेन सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह अंतरराष्ट्रीय मामलों और शांति व्यवस्था के लिए संयुक्त राष्ट्र पर भरोसा करती है और किसी समानांतर संगठन की जरूरत नहीं समझती। यह घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।

स्पेन का साफ इनकार

यूरोपीय संघ के शिखर सम्मेलन के बाद बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में पत्रकारों से बातचीत करते हुए स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने अपनी सरकार के फैसले को सार्वजनिक किया। उन्होंने कहा कि स्पेन अमेरिकी राष्ट्रपति के निमंत्रण की सराहना तो करता है, लेकिन इसे स्वीकार नहीं कर सकता। सांचेज ने बताया कि यह निर्णय बहुपक्षवाद और संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के अनुरूप है।

स्पेन का यह रुख दिखाता है कि यूरोप के कई देश अभी भी पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को ही वैध मानते हैं। प्रधानमंत्री सांचेज ने अपने बयान में यह भी साफ किया कि स्पेन किसी भी ऐसी पहल का हिस्सा नहीं बनना चाहता जो स्थापित वैश्विक व्यवस्था के समानांतर काम करे।

फिलिस्तीन की गैरमौजूदगी भी एक कारण

स्पेन सरकार ने बोर्ड ऑफ पीस को खारिज करने का एक और महत्वपूर्ण कारण बताया है। सांचेज ने कहा कि इस बोर्ड में फिलिस्तीनी प्राधिकरण को शामिल नहीं किया गया है, जो उनके लिए चिंता का विषय है। स्पेन का मानना है कि मध्य पूर्व में शांति के लिए दो राष्ट्र समाधान यानी टू-स्टेट सॉल्यूशन जरूरी है और फिलिस्तीन की भागीदारी के बिना कोई भी शांति पहल अधूरी है।

यह रुख स्पेन की विदेश नीति के अनुरूप है। पिछले कुछ समय से स्पेन फिलिस्तीन के हक में खुलकर आवाज उठाता रहा है और फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता का समर्थन करता रहा है। इसलिए किसी भी ऐसी पहल में शामिल होना जहां फिलिस्तीन को जगह नहीं मिली हो, स्पेन के लिए स्वीकार्य नहीं है।

बोर्ड ऑफ पीस का उद्देश्य

अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, बोर्ड ऑफ पीस की स्थापना का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में चल रहे संघर्षों को सुलझाना है। इस बोर्ड की जिम्मेदारी युद्धविराम कराना, सुरक्षा व्यवस्थाओं की निगरानी करना और युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्निर्माण के कार्यों को समन्वित करना होगी।

यह पहल डोनाल्ड ट्रंप की गाजा शांति योजना से जुड़ी मानी जा रही है। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि यह बोर्ड तेजी से निर्णय लेने और संघर्ष समाधान में ज्यादा प्रभावी होगा। इसकी घोषणा स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच के दौरान की गई थी, जहां ट्रंप ने इसे एक क्रांतिकारी कदम बताया था।

हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह पहल संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर करने का प्रयास है और एकतरफा निर्णय लेने का जरिया बन सकती है।

यूरोप का ठंडा रुख

बोर्ड ऑफ पीस के शुभारंभ कार्यक्रम में यूरोपीय देशों की भागीदारी न के बराबर रही। कनाडा, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के अधिकांश सदस्य देशों ने इस कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया। यूरोपीय संघ की ओर से केवल हंगरी और बुल्गारिया ने इस पहल में शामिल होने की सहमति दी।

यह स्थिति साफ दिखाती है कि यूरोप में ट्रंप की इस पहल को लेकर संदेह और असहमति का माहौल है। यूरोपीय देश मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र ही अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का सबसे विश्वसनीय मंच है। किसी समानांतर व्यवस्था से वे दूरी बनाए रखना चाहते हैं।

फ्रांस और जर्मनी जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों ने भी अभी तक इस पहल पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी है। विश्लेषकों का मानना है कि यूरोप अमेरिका की एकतरफा कार्रवाइयों से असहज है और बहुपक्षीय व्यवस्था को बनाए रखना चाहता है।

किन देशों ने दी सहमति

हालांकि यूरोप ने दूरी बनाई है, लेकिन मध्य पूर्व और एशिया के कई देशों ने इस बोर्ड में शामिल होने की सहमति दी है। इनमें पाकिस्तान, इजरायल, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश शामिल हैं।

इजरायल की भागीदारी स्वाभाविक है क्योंकि ट्रंप प्रशासन पारंपरिक रूप से इजरायल समर्थक रहा है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की भागीदारी अमेरिका के साथ उनके मजबूत रणनीतिक संबंधों को दर्शाती है। पाकिस्तान ने भी अमेरिका के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है, हालांकि इसके पीछे की राजनीतिक वजहें अभी स्पष्ट नहीं हैं।

संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता

स्पेन के इस फैसले ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता को रेखांकित किया है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्थापित संयुक्त राष्ट्र संगठन आज भी अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का सबसे बड़ा मंच है। हालांकि इसकी कार्यप्रणाली को लेकर कई बार आलोचना होती है, लेकिन इसकी वैधता पर सवाल नहीं उठाए जाते।

स्पेन जैसे देशों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को सुलझाने के लिए एक स्थापित और सर्वमान्य व्यवस्था जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र में दुनिया के लगभग सभी देश शामिल हैं और इसके निर्णय अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित होते हैं।

किसी एक देश या समूह द्वारा बनाई गई समानांतर व्यवस्था न तो प्रतिनिधित्वपूर्ण होती है और न ही निष्पक्ष। इसलिए स्पेन ने संयुक्त राष्ट्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।

भविष्य की चुनौतियां

Spain Rejects Board of Peace: ट्रंप प्रशासन के लिए यह एक बड़ा झटका है कि उसका एक महत्वपूर्ण नाटो सहयोगी इस पहल से दूर रहना चाहता है। यह स्थिति दिखाती है कि अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व क्षमता को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

यूरोप और अमेरिका के बीच नीतिगत मतभेद बढ़ते दिख रहे हैं। जलवायु परिवर्तन, व्यापार और अब अंतरराष्ट्रीय शांति के मुद्दों पर दोनों के बीच असहमति है। यदि यह स्थिति जारी रही तो पश्चिमी गठबंधन कमजोर हो सकता है।

दूसरी ओर, बोर्ड ऑफ पीस की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि प्रमुख यूरोपीय देश इसमें शामिल नहीं होते तो इसकी स्वीकार्यता और प्रभावशीलता सीमित रहेगी।

स्पेन का यह फैसला अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह दिखाता है कि दुनिया एकध्रुवीय नहीं रह गई है और देश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाने में सक्षम हैं। स्पेन ने यह साबित किया है कि वह अमेरिका के दबाव में नहीं आएगा और अपने सिद्धांतों के अनुसार फैसले लेगा।

बहुपक्षवाद और संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के प्रति स्पेन की प्रतिबद्धता सराहनीय है। यह रुख दूसरे देशों के लिए भी एक उदाहरण है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में स्थापित संस्थाओं को मजबूत करना चाहिए, न कि समानांतर व्यवस्थाएं बनानी चाहिए।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि बोर्ड ऑफ पीस कितना प्रभावी साबित होता है और क्या यह वास्तव में वैश्विक शांति में योगदान दे पाता है या केवल एक राजनीतिक प्रयोग बनकर रह जाता है।

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Asfi Shadab

एक लेखक, चिंतक और जागरूक सामाजिक कार्यकर्ता, जो खेल, राजनीति और वित्त की जटिलता को समझते हुए उनके बीच के रिश्तों पर निरंतर शोध और विश्लेषण करते हैं। जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को सरल, तर्कपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध।