Social Media Ban for Children: आज का बच्चा किताबों और मैदान से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन से जुड़ा हुआ नजर आता है। सुबह उठते ही YouTube, स्कूल से लौटकर Instagram और रात को सोने से पहले Reels—यह दिनचर्या अब आम हो गई है। कई माता-पिता मानते हैं कि मोबाइल बच्चों को शांत रखता है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनती जा रही है। गोवा सरकार की नई सोच इसी चिंता से निकली है, जहां 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने पर गंभीर विचार किया जा रहा है।
राज्य सरकार का मानना है कि कम उम्र में सोशल मीडिया की दुनिया बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित कर रही है। बच्चे असल जिंदगी की बजाय वर्चुअल लाइक्स और कमेंट्स में उलझते जा रहे हैं, जिसका असर उनके आत्मविश्वास, व्यवहार और पढ़ाई पर साफ दिख रहा है।
गोवा सरकार क्यों सोच रही है सख्त कदम पर
गोवा सरकार के मंत्री ने हाल ही में संकेत दिए कि राज्य में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर नियंत्रण जरूरी हो गया है। उनका कहना है कि बच्चे मोबाइल की लत का शिकार हो रहे हैं। घंटों स्क्रीन देखने से न केवल आंखों पर असर पड़ रहा है, बल्कि नींद की कमी, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की समस्या भी बढ़ रही है।
सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया पर मौजूद हर कंटेंट बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं होता। कई बार हिंसक वीडियो, गलत भाषा, भ्रामक जानकारियां और गलत सोच बच्चों के मन में घर कर जाती है। इतना ही नहीं, साइबर बुलिंग जैसी समस्याएं भी तेजी से बढ़ रही हैं, जहां बच्चे ऑनलाइन मानसिक उत्पीड़न का शिकार बनते हैं।
माता-पिता की चिंता और असहाय स्थिति
अधिकांश माता-पिता यह जानते हैं कि सोशल मीडिया बच्चों के लिए नुकसानदायक हो सकता है, लेकिन आज के दौर में बच्चों को पूरी तरह मोबाइल से दूर रखना आसान नहीं है। पढ़ाई के नाम पर मोबाइल दिया जाता है और कब वह मनोरंजन का साधन बन जाता है, इसका पता ही नहीं चलता।
कई अभिभावक यह भी मानते हैं कि बच्चों पर रोक लगाने से बेहतर है उन्हें सही और गलत की समझ दी जाए, लेकिन गोवा सरकार का तर्क है कि कम उम्र में बच्चे खुद फैसले लेने में सक्षम नहीं होते। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह बच्चों के हित में ठोस कदम उठाए।
मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता गहरा असर
विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया बच्चों में तुलना की भावना को बढ़ाता है। दूसरे बच्चों की दिखावटी जिंदगी देखकर वे खुद को कमतर समझने लगते हैं। इससे तनाव, अकेलापन और अवसाद जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं।
गोवा सरकार की पहल का उद्देश्य बच्चों को इस मानसिक दबाव से बचाना है। सरकार चाहती है कि बच्चे अपने बचपन को खुलकर जिएं, खेलें, पढ़ें और परिवार के साथ समय बिताएं, न कि स्क्रीन के सामने सिमटकर रह जाएं।
ऑस्ट्रेलिया की मिसाल और भारत में बहस
गोवा सरकार का यह विचार नया नहीं है। ऑस्ट्रेलिया पहले ही 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर सख्त नियम लागू कर चुका है। वहां सरकार का साफ कहना है कि सोशल मीडिया बच्चों के विकास में बाधा बन रहा है।
ऑस्ट्रेलिया के इस फैसले के बाद बच्चों के स्क्रीन टाइम में कमी आई और वे शारीरिक गतिविधियों की ओर लौटे। इसी मॉडल को देखते हुए गोवा सरकार भी ऐसा कदम उठाने पर विचार कर रही है। हालांकि भारत जैसे बड़े और विविध देश में इसे लागू करना आसान नहीं होगा।
क्या यह रोक पूरी तरह संभव है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सोशल मीडिया पर उम्र के आधार पर रोक लगाना व्यावहारिक होगा। आज ज्यादातर ऐप्स पर उम्र की पुष्टि केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है। बच्चे आसानी से गलत उम्र डालकर अकाउंट बना लेते हैं।
गोवा सरकार के सामने चुनौती होगी कि वह नियमों को केवल कागजों तक सीमित न रखे, बल्कि उन्हें प्रभावी ढंग से लागू भी करे। इसके लिए स्कूलों, अभिभावकों और टेक कंपनियों की साझेदारी जरूरी होगी।