West Bengal DA Case Supreme Court: पश्चिम बंगाल के लाखों सरकारी कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला किसी बड़ी राहत से कम नहीं है। वर्षों से लंबित महंगाई भत्ते को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में आखिरकार अदालत ने कर्मचारियों के पक्ष में साफ और सख्त रुख अपनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महंगाई भत्ता किसी सरकार की मर्जी पर निर्भर सुविधा नहीं, बल्कि कर्मचारियों का संवैधानिक और कानूनी अधिकार है।
न्यायमूर्ति संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया है कि वह बकाया महंगाई भत्ते का 25 प्रतिशत हिस्सा एरियर के साथ तय समय सीमा में भुगतान करे। इसके साथ ही शेष बकाया राशि के भुगतान को लेकर एक नई समिति के गठन का भी आदेश दिया गया है, ताकि वर्षों से चले आ रहे इस विवाद का स्थायी समाधान निकाला जा सके।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और बंगाल सरकार के लिए संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ शब्दों में कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार के कर्मचारियों को महंगाई भत्ता नियमों के अनुसार मिलना चाहिए। अदालत ने निर्देश दिया कि 31 मार्च तक बकाया डीए का 25 प्रतिशत भुगतान किया जाए, जबकि शेष 75 प्रतिशत राशि का भुगतान 15 मई तक पूरा किया जाए।
यह आदेश सिर्फ भुगतान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राज्य सरकार के लिए एक स्पष्ट संदेश भी छिपा है कि कर्मचारियों के अधिकारों को लंबे समय तक टाला नहीं जा सकता। अदालत ने माना कि बढ़ती महंगाई के दौर में डीए का भुगतान रोकना कर्मचारियों के साथ अन्याय के बराबर है।
चार सदस्यीय समिति से निकलेगा भुगतान का रास्ता
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में बकाया डीए के शेष 75 प्रतिशत भुगतान को लेकर चार सदस्यीय समिति गठित करने का आदेश दिया है। इस समिति की अध्यक्षता एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश करेंगे। समिति का काम यह तय करना होगा कि बकाया राशि का भुगतान कितनी किस्तों में और किस समय सीमा में किया जाए।
यह मामला लंबे समय से अदालतों में चल रहा है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को छह सप्ताह के भीतर 25 प्रतिशत डीए भुगतान का आदेश दिया था, लेकिन तय समय सीमा में भुगतान नहीं हो सका। इसके बाद राज्य सरकार ने अदालत से अतिरिक्त समय की मांग की।
अगस्त 2025 में इस मामले की कई दिनों तक रोजाना सुनवाई हुई। लंबी बहस के बाद अदालत ने साफ कर दिया कि अब और देरी स्वीकार नहीं की जाएगी।
कलकत्ता हाईकोर्ट से शुरू हुई लड़ाई
पश्चिम बंगाल में महंगाई भत्ते का यह मामला सबसे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट के राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण में पहुंचा था। वहां से कर्मचारियों के पक्ष में फैसला आया, जिसमें कहा गया कि डीए राज्य सरकार के कर्मचारियों का अधिकार है और उन्हें केंद्रीय कर्मचारियों के समान दर पर यह भुगतान मिलना चाहिए।
इसके बाद राज्य सरकार इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंची, लेकिन वहां भी अदालत ने कर्मचारियों के हक को प्राथमिकता दी।
बंगाल और केंद्र के डीए में बड़ा अंतर
वर्तमान समय में पश्चिम बंगाल सरकार अपने कर्मचारियों को लगभग 18 प्रतिशत की दर से महंगाई भत्ता देती है, जबकि केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 58 प्रतिशत डीए मिल रहा है। यानी दोनों के बीच करीब 40 प्रतिशत का अंतर है। यही अंतर लंबे समय से कर्मचारियों में नाराजगी की वजह बना हुआ है।
सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षक, गैर-शिक्षण कर्मचारी, पंचायत और नगरपालिका कर्मियों को भी इसी कम दर पर डीए मिल रहा है। भुगतान की अनियमितता ने आर्थिक दबाव और बढ़ा दिया है।
आने वाले समय में बढ़ सकती है चुनौती
केंद्र सरकार में आठवें वेतन आयोग के लागू होने की चर्चा तेज है। अगर ऐसा होता है, तो केंद्र और पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों के बीच डीए का अंतर और बढ़ सकता है। ऐसे में राज्य सरकार के लिए यह फैसला भविष्य की नीति तय करने में अहम साबित हो सकता है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों के लिए एक मजबूत कानूनी जीत है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि राज्य सरकार इस फैसले को कितनी गंभीरता से और कितनी जल्दी लागू करती है।