Baidyanath Dham Mahashivratri: झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का केंद्र है। भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल यह धाम महाशिवरात्रि के दिन एक अलग ही रूप में नजर आता है। जैसे ही फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी आती है, पूरा देवघर ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से गूंज उठता है। दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं की भीड़, शिवभक्ति में डूबी गलियां और मंदिर परिसर में पसरा आध्यात्मिक माहौल इस पर्व को विशेष बना देता है।
बैद्यनाथ धाम को मनोकामना लिंग भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी खाली नहीं जाती। यही वजह है कि महाशिवरात्रि पर यहां केवल पूजा-अर्चना ही नहीं होती, बल्कि जीवन से जुड़ी उम्मीदें, रिश्तों की गांठें और भविष्य के सपने भी बाबा के चरणों में अर्पित किए जाते हैं।
देवघर क्यों कहलाता है देवों की नगरी
देवघर को देवों की नगरी यूं ही नहीं कहा जाता। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पवित्र भूमि पर भगवान शिव और माता पार्वती का वास माना जाता है। शिवपुराण में भी बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का विशेष उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि यहां शिव स्वयं वैद्य बनकर भक्तों के कष्ट हरते हैं। यही कारण है कि लोग न केवल आध्यात्मिक शांति के लिए, बल्कि मानसिक और पारिवारिक समस्याओं के समाधान के लिए भी यहां आते हैं।
महाशिवरात्रि के दिन शिव-पार्वती विवाह का पर्व माना जाता है। इस दिन मंदिर में चारों प्रहर विशेष पूजा होती है। तीर्थपुरोहित षोडशोपचार विधि से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और श्रद्धालु घंटों लाइन में लगकर बाबा के दर्शन करते हैं।
मोर मुकूट परंपरा: विवाह की अड़चनों का समाधान
बैद्यनाथ धाम की सबसे चर्चित और अनोखी परंपरा मोर मुकूट चढ़ाने की है। यह परंपरा साल में केवल महाशिवरात्रि के दिन ही निभाई जाती है। जिन युवक-युवतियों की शादी में बार-बार रुकावट आ रही हो, रिश्ते तय होकर टूट जाते हों या विवाह में अत्यधिक देरी हो रही हो, वे बाबा बैद्यनाथ को मोर मुकूट अर्पित करते हैं।
मान्यता है कि मोर मुकूट चढ़ाने से विवाह से जुड़ी सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं और योग्य वर या वधू का शीघ्र योग बनता है। देवघर के पंडा-पुजारियों के अनुसार, इस परंपरा को निभाने वाले अनेक श्रद्धालुओं को सकारात्मक परिणाम मिले हैं, जिसके चलते हर साल इसकी आस्था और भी गहरी होती जा रही है।
गठबंधन परंपरा: टूटते रिश्तों को जोड़ने की आस्था
जहां मोर मुकूट अविवाहितों के लिए आशा की किरण है, वहीं गठबंधन परंपरा विवाहित जोड़ों के लिए वरदान मानी जाती है। जिन दंपतियों के बीच तनाव, मनमुटाव, कलह या अलगाव की स्थिति बन गई हो, वे महाशिवरात्रि के दिन मंदिर में गठबंधन करते हैं।
इस परंपरा में पति-पत्नी एक-दूसरे के हाथ में गठरी बांधकर शिव-पार्वती से अपने रिश्ते की मजबूती की प्रार्थना करते हैं। मान्यता है कि इससे वैवाहिक जीवन में मधुरता लौट आती है और आपसी विश्वास फिर से मजबूत होता है। यह परंपरा केवल बैद्यनाथ धाम में ही देखने को मिलती है, जो इसे अन्य शिव मंदिरों से अलग बनाती है।
महाशिवरात्रि पर विशेष पूजा और धार्मिक अनुष्ठान
महाशिवरात्रि के अवसर पर बाबा बैद्यनाथ का भव्य श्रृंगार किया जाता है। मंदिर को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है। भक्त दूध, दही, घी, शहद, बेलपत्र, भांग, धतूरा और पुष्प अर्पित करते हैं। शिव पुराण पाठ, रुद्राभिषेक और रात्रि जागरण का विशेष महत्व माना जाता है।
निशिता काल में होने वाली पूजा को अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस दिन दान-पुण्य करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
आस्था और विश्वास का जीवंत उदाहरण
बैद्यनाथ धाम की ये परंपराएं केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि लोगों के जीवन से जुड़ी भावनाओं का प्रतिबिंब हैं। यहां आने वाला हर श्रद्धालु किसी न किसी उम्मीद के साथ बाबा के दरबार में शीश नवाता है। महाशिवरात्रि पर मोर मुकूट और गठबंधन जैसी परंपराएं इस बात का प्रमाण हैं कि आस्था आज भी लोगों को जोड़ने और संवारने का काम कर रही है।