पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर चुनाव आयोग और तृणमूल कांग्रेस के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। इस बार विवाद का केंद्र राज्य में चल रही मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया है। टीएमसी ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि एक रहस्यमय सॉफ्टवेयर के जरिए बड़े पैमाने पर वास्तविक मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। यह मुद्दा अब राज्य की राजनीति में गर्मा गया है और आने वाले चुनावों को देखते हुए इसकी अहमियत और भी बढ़ गई है।
टीएमसी के गंभीर आरोप और सवाल
तृणमूल कांग्रेस के राज्य सभा सांसद साकेत गोखले ने शुक्रवार को एक गंभीर बयान जारी करते हुए चुनाव आयोग पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग के अधिकारियों ने खुद माना है कि एक सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी की वजह से सही मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हट गए हैं। गोखले ने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी पिछले कई महीनों से इस मुद्दे को उठाते आ रहे हैं, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चुप्पी साधे हुए हैं।
साकेत गोखले ने सवाल उठाया कि आखिर यह रहस्यमय सॉफ्टवेयर किसने बनाया और अगर यह खराब है तो चुनाव आयोग इसका इस्तेमाल क्यों कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है। टीएमसी सांसद का कहना है कि जब धरातल पर मतदाता सूची में हेरफेर की कोशिशें नाकाम रहीं, तो दिल्ली में बैठकर सॉफ्टवेयर के जरिए नाम हटाए गए। यह पूरी तरह से अलोकतांत्रिक तरीका है और इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
एसआईआर प्रक्रिया क्या है
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके जरिए चुनाव आयोग मतदाता सूची को साफ और अपडेट करता है। इस प्रक्रिया में नकली मतदाताओं, दूसरी जगह जा चुके लोगों और मृत व्यक्तियों के नाम हटाए जाते हैं। साथ ही नए पात्र मतदाताओं को सूची में जोड़ा जाता है। यह प्रक्रिया चुनाव को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए जरूरी मानी जाती है।
आम तौर पर यह काम बूथ स्तर के अधिकारियों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में कई चरणों में पूरा होता है। लेकिन टीएमसी का आरोप है कि इस बार इस प्रक्रिया को बाइपास करते हुए सीधे सॉफ्टवेयर के जरिए नाम हटाए गए हैं। यह आरोप अगर सही साबित होता है तो यह चुनावी प्रक्रिया में एक बड़ा सवाल खड़ा करेगा।
भाजपा पर साधा निशाना
टीएमसी ने इस पूरे मामले में भारतीय जनता पार्टी पर भी हमला बोला है। साकेत गोखले ने आरोप लगाया कि भाजपा के नियंत्रण में काम कर रहा चुनाव आयोग राज्य में जनतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह सबसे ऊंचे स्तर की गंदी राजनीति है जिसमें केंद्रीय स्तर से बैठकर राज्य के मतदाताओं के अधिकार छीने जा रहे हैं।
टीएमसी का मानना है कि जब जमीनी स्तर पर मतदाता सूची में गड़बड़ी की कोशिशें विफल रहीं, तो तकनीकी तरीके से यह काम किया जा रहा है। यह आरोप पश्चिम बंगाल में पहले से ही तनावपूर्ण राजनीतिक माहौल को और गर्म कर रहा है।
ममता बनर्जी की लगातार लड़ाई
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पिछले कई महीनों से मतदाता सूची के मुद्दे पर आवाज उठा रही हैं। उन्होंने कई बार मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाना बनाया है। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग केंद्र सरकार के दबाव में काम कर रहा है और निष्पक्षता नहीं बरत रहा है।
इस मामले को लेकर ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा चुकी हैं। उन्होंने कहा है कि अगर मतदाता सूची में गड़बड़ी जारी रही तो चुनाव की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े होंगे। राज्य की मुख्यमंत्री का कहना है कि लाखों असली मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित किया जा रहा है जो कि संविधान के खिलाफ है।
चुनाव आयोग की चुप्पी
इन सभी गंभीर आरोपों के बावजूद चुनाव आयोग की तरफ से अभी तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है। आयोग ने पहले अपने बयानों में कहा है कि मतदाता सूची में किसी भी तरह का बदलाव पूरी तरह से तय प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है। इसमें बूथ स्तर के अधिकारी, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि और कई स्तर पर सत्यापन शामिल होता है।
लेकिन टीएमसी के ताजा आरोपों के बाद चुनाव आयोग की चुप्पी सवाल खड़े कर रही है। अगर वाकई किसी सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी से नाम हटे हैं तो इसकी जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखना बेहद जरूरी है।
राजनीतिक दलों की चिंता
सिर्फ टीएमसी ही नहीं, बल्कि दूसरे राजनीतिक दल भी इस मुद्दे को गंभीरता से देख रहे हैं। पश्चिम बंगाल में आने वाले चुनावों को देखते हुए हर पार्टी मतदाता सूची पर पैनी नजर रख रही है। किसी भी तरह की गड़बड़ी चुनाव के नतीजों को प्रभावित कर सकती है।
कई विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता होनी चाहिए। अगर कोई सॉफ्टवेयर इस्तेमाल हो रहा है तो उसकी पूरी जानकारी सभी राजनीतिक दलों को दी जानी चाहिए। इससे किसी भी तरह के संदेह को दूर किया जा सकता है।
मतदाताओं का अधिकार
इस पूरे विवाद के केंद्र में आम मतदाता हैं जिनका मताधिकार सबसे अहम है। अगर किसी तकनीकी गड़बड़ी या प्रशासनिक लापरवाही से किसी भी वास्तविक मतदाता का नाम हट जाता है तो यह उसके संवैधानिक अधिकार का हनन है। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कोई भी पात्र मतदाता अपने वोट के अधिकार से वंचित न हो।
राज्य में हजारों लोगों ने शिकायत की है कि उनके नाम मतदाता सूची से गायब हो गए हैं। अगर यह बड़े पैमाने पर हो रहा है तो इसकी तुरंत जांच होनी चाहिए और प्रभावित लोगों के नाम वापस जोड़े जाने चाहिए।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर चल रहा यह विवाद सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि जनतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ा मामला है। इसका समाधान पारदर्शी तरीके से होना जरूरी है ताकि लोगों का चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा बना रहे। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि चुनाव आयोग इन आरोपों का क्या जवाब देता है और क्या कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं।