Election Commission vs Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल में चुनावी तैयारियों के बीच एक बार फिर से सियासी घमासान शुरू हो गया है। चुनाव आयोग और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच तनातनी चरम पर पहुंच गई है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक काउंटर एफिडेविट दायर करके ममता बनर्जी पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। इन आरोपों में भड़काऊ भाषण देना, डर फैलाना और चुनावी अधिकारियों के काम में रुकावट डालना शामिल है। यह मामला स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है, जिसको लेकर पश्चिम बंगाल में लगातार विवाद बना हुआ है।
स्पेशल इंटेंसिव रिविजन प्रक्रिया में हो रही समस्याएं
चुनाव आयोग ने अपने एफिडेविट में साफ तौर पर कहा है कि पश्चिम बंगाल एकमात्र ऐसा राज्य है जहां स्पेशल इंटेंसिव रिविजन की प्रक्रिया के दौरान चुनावी अधिकारियों को लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। देश के दूसरे राज्यों में यह काम बिना किसी रुकावट के पूरा हो रहा है, लेकिन बंगाल में स्थिति अलग है। आयोग का कहना है कि यहां अधिकारियों को धमकियां दी जा रही हैं, उनके काम में बाधा डाली जा रही है और उन्हें डराया-धमकाया जा रहा है। कई चुनावी अधिकारियों ने तो मुख्य चुनाव अधिकारी को पत्र लिखकर एसआईआर की ड्यूटी से हटाने की गुहार लगाई है। यह स्थिति बताती है कि वहां का माहौल कितना तनावपूर्ण हो गया है।
ममता बनर्जी पर भड़काऊ भाषण के आरोप
चुनाव आयोग ने अपनी दलीलों में यह भी कहा है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद भड़काऊ और डर फैलाने वाले भाषण दे रही हैं। इन भाषणों की वजह से चुनावी अधिकारियों के बीच एक डर का माहौल बन गया है। जब एक मुख्यमंत्री सार्वजनिक मंचों पर इस तरह की बातें करती हैं, तो स्वाभाविक रूप से उनके समर्थकों और कार्यकर्ताओं में एक संदेश जाता है। आयोग का मानना है कि इस वजह से जमीनी स्तर पर चुनावी अधिकारियों को काम करने में दिक्कत हो रही है। उन्हें लगातार दबाव में रखा जा रहा है और उनकी सुरक्षा को भी खतरा है।
24 नवंबर की घटना और एफआईआर का मुद्दा
चुनाव आयोग ने पिछले साल 24 नवंबर को हुई एक गंभीर घटना का भी जिक्र किया है। उस दिन एक भीड़ ने मुख्य चुनाव अधिकारी के दफ्तर में घुसने की कोशिश की थी। इस घटना के दौरान तोड़फोड़ भी हुई और बाद में दफ्तर को बाहर से ताला लगा दिया गया। यह एक बेहद चिंताजनक घटना थी, लेकिन आयोग का कहना है कि इस मामले में अब तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। ना ही किसी को गिरफ्तार किया गया है। यह राज्य सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है। चुनाव आयोग का आरोप है कि बीएलओ यानी बूथ लेवल ऑफिसर्स ने भी कई शिकायतें दर्ज कराई हैं, लेकिन उन पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
अधिकारियों की सुरक्षा का सवाल
हालात की गंभीरता को देखते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी को वाई प्लस श्रेणी की सुरक्षा दी गई है। यह पूरे देश में एकमात्र ऐसा राज्य है जहां सीईओ को इतनी सुरक्षा की जरूरत पड़ी है। इसके अलावा कई दूसरे शीर्ष अधिकारियों को भी सुरक्षा मुहैया कराई गई है। यह साफ दर्शाता है कि चुनावी अधिकारियों को किस तरह के खतरों का सामना करना पड़ रहा है। जब अधिकारियों को सुरक्षा की इतनी जरूरत पड़े, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है।
तृणमूल कांग्रेस के आरोप और जवाब
दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस ने भी चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्टी का दावा है कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं। पार्टी के राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने कहा है कि यह काम एक रहस्यमय और खराब सॉफ्टवेयर के जरिए किया जा रहा है। उनका आरोप है कि इस प्रक्रिया से तृणमूल कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की साजिश रची जा रही है। गोखले ने दावा किया कि चुनाव आयोग के अधिकारियों ने भी माना है कि सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी की वजह से सही वोटरों के नाम हट गए हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी कई महीनों से इस मुद्दे को उठा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई
Election Commission vs Mamata Banerjee: यह पूरा मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है। पिछले दिनों खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोर्ट पहुंची थीं और अपनी दलीलें पेश की थीं। उन्होंने एसआईआर प्रक्रिया को विधानसभा चुनाव से पहले वोट काटने की साजिश बताया था। अब चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखा है। कोर्ट अब इस मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर फैसला देगा। यह फैसला पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।
लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय
पश्चिम बंगाल में जो कुछ हो रहा है, वह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए चिंता का विषय है। चुनावी अधिकारियों को निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से काम करने देना बेहद जरूरी है। अगर उन्हें डर, धमकी और दबाव में रखा जाएगा, तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कैसे हो पाएंगे। दूसरी तरफ, मतदाताओं की सूची से अगर सही नाम हटाए जा रहे हैं, तो यह भी एक गंभीर मामला है। लोकतंत्र में हर नागरिक को वोट डालने का अधिकार है और उससे किसी को वंचित नहीं किया जा सकता। इस मामले में सच्चाई जो भी हो, उसे निष्पक्ष जांच के जरिए सामने आना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की भूमिका इस मामले में अहम होगी और उम्मीद की जाती है कि कोर्ट एक निष्पक्ष और संतुलित फैसला देगा।