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तीन दशक का सफर पूरा करेगा अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन, 2030 में होगा रिटायर

International Space Station Retiring in 2030: तीन दशक बाद रिटायर होगा अंतरिक्ष स्टेशन, जानें पूरी योजना
International Space Station Retiring in 2030: तीन दशक बाद रिटायर होगा अंतरिक्ष स्टेशन, जानें पूरी योजना (File Photo)

International Space Station Retiring in 2030: तीन दशकों से अंतरिक्ष में मानव उपस्थिति का प्रतीक अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन 2030 में रिटायर हो जाएगा। स्पेसएक्स की मदद से इसे पॉइंट नेमो में विसर्जित किया जाएगा। इसके बाद निजी स्टेशनों का युग शुरू होगा जबकि भारत 2035 तक अपना स्वदेशी स्पेस स्टेशन बनाने की तैयारी में है।

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International Space Station Retiring in 2030:  तीन दशकों से अंतरिक्ष में मानव उपस्थिति का प्रतीक रहा अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन अपनी आखिरी यात्रा की तैयारी कर रहा है। 2030 में यह ऐतिहासिक स्टेशन रिटायर हो जाएगा और प्रशांत महासागर में विसर्जित कर दिया जाएगा। यह खबर दुनिया भर के अंतरिक्ष प्रेमियों और वैज्ञानिकों के लिए भावुक करने वाली है।

अंतरिक्ष में तीन दशक का गौरवशाली इतिहास

नवंबर 2000 से लेकर अब तक अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में हमेशा कोई न कोई इंसान मौजूद रहा है। यह स्टेशन एक फुटबॉल मैदान के आकार का है और आठ किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से पृथ्वी की परिक्रमा करता रहता है। अगले हफ्ते जब नया चालक दल इस स्टेशन पर जाने की तैयारी कर रहा है, तब जमीन पर मौजूद वैज्ञानिक और विशेषज्ञ इसके अंत को लेकर उदास हैं।

यह स्टेशन सिर्फ एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक जीता जागता उदाहरण है। दुनिया के कई देश मिलकर इस स्टेशन को चलाते हैं और यहां वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं। यह मानवता की उस क्षमता को दर्शाता है जब हम मिलकर काम करते हैं तो क्या हासिल कर सकते हैं।

इंसानी सहयोग का अद्भुत नमूना

नासा के साइंस एंड मिशन सिस्टम ऑफिस के पूर्व प्रबंधक जॉन होरैक ने इसे सीमाओं, भाषाओं और संस्कृतियों के पार मानवीय सहयोग का एक भव्य मंदिर बताया है। उनका कहना है कि 25 साल से भी ज्यादा समय से हमारे पास साल के 365 दिन और 24 घंटे अंतरिक्ष में लोग मौजूद हैं। यह इस बात का सबूत है कि जब हम एक दूसरे के साथ जुड़ना चाहते हैं तो हम लड़ने के बजाय समस्याओं का हल निकालना जानते हैं।

इस स्टेशन का प्रस्ताव शीत युद्ध के बाद रखा गया था। यह रूस और अमेरिका जैसे पूर्व प्रतिद्वंद्वियों के बीच सहयोग की एक नई भावना का प्रतीक था। आज भी जब यूक्रेन युद्ध के कारण रूस और पश्चिमी देशों के बीच कई रिश्ते टूट चुके हैं, तब भी अंतरिक्ष स्टेशन पर यह सहयोग बरकरार है।

पुराने होते उपकरण और जरूरी फैसला

समय के साथ अंतरिक्ष स्टेशन पुराना होता जा रहा है और इसके उपकरण भी अब पुराने पड़ चुके हैं। इस वजह से इसे चलाना मुश्किल होता जा रहा है। पिछले साल नासा ने घोषणा की थी कि उसने एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स को एक ऐसा वाहन बनाने के लिए चुना है जो 2030 में इस स्टेशन को वापस पृथ्वी के वायुमंडल में धकेल देगा।

यह कोई आसान काम नहीं होगा। इतनी बड़ी संरचना को सुरक्षित तरीके से पृथ्वी पर वापस लाना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए खास तैयारी और योजना की जरूरत है ताकि यह किसी आबादी वाले इलाके में न गिरे।

पॉइंट नेमो पर होगा अंतिम विसर्जन

स्पेसएक्स एक बड़ा रॉकेट इंजन तैयार करेगा जो इस स्टेशन की गति को धीमा कर देगा। इसके बाद यह प्रशांत महासागर के एक खास इलाके में गिरेगा जहां कोई इंसान नहीं रहता है। इस जगह का नाम है पॉइंट नेमो।

पॉइंट नेमो समुद्र का वह हिस्सा है जो जमीन और इंसानों से सबसे ज्यादा दूर है। यह जगह किसी भी तट से करीब 2,700 किलोमीटर दूर है। इससे पहले रूस के मीर स्टेशन सहित कई अंतरिक्ष मलबे यहीं विसर्जित किए जा चुके हैं। यह जगह इसलिए चुनी जाती है ताकि गिरने वाले मलबे से किसी को कोई नुकसान न हो।

जब स्टेशन वायुमंडल में प्रवेश करेगा तो इसका ज्यादातर हिस्सा जल जाएगा। लेकिन कुछ बड़े टुकड़े बच सकते हैं जो समुद्र में गिरेंगे। वैज्ञानिक पूरी सटीकता से यह सुनिश्चित करेंगे कि ये टुकड़े सिर्फ पॉइंट नेमो के आसपास ही गिरें।

निजी कंपनियों का बढ़ता दखल

2030 के बाद पृथ्वी की कक्षा में एकमात्र सक्रिय स्टेशन चीन का तियांगोंग होगा। लेकिन अमेरिका और दूसरे देश खाली हाथ नहीं बैठेंगे। भविष्य की योजनाओं को लेकर अब ध्यान निजी कंपनियों द्वारा संचालित स्टेशनों पर केंद्रित हो रहा है।

अब अंतरिक्ष स्टेशन उसी व्यावसायिक मॉडल पर चलेंगे जैसे आज रॉकेट और सैटेलाइट चलते हैं। जेफ बेजोस की ब्लू ओरिजिन और एक्सिओम स्पेस जैसी कंपनियां पहले से ही निजी स्टेशन बनाने पर काम कर रही हैं। ये कंपनियां अंतरिक्ष पर्यटन और वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए जगह किराए पर देंगी।

फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी के लियोनेल सुचेट का मानना है कि व्यापारिक मॉडल के बावजूद सरकारें हमेशा अपने अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने में रुचि रखेंगी। इसलिए सरकारी और निजी सहयोग का मिश्रण देखने को मिलेगा।

चंद्रमा पर नई दौड़

अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के रिटायर होने के बाद ध्यान अब चंद्रमा की तरफ जा रहा है। अमेरिका और चीन दोनों ही चंद्रमा पर अपने आधार शिविर बनाने की दौड़ में हैं। यह एक नए अंतरिक्ष युग की शुरुआत होगी।

जॉन होरैक ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के पूर्व प्रमुख के शब्दों को दोहराते हुए कहा कि अगर आप तेज चलना चाहते हैं तो अकेले चलें, लेकिन अगर आप दूर तक जाना चाहते हैं तो साथ मिलकर चलें। यह बात अंतरिक्ष अन्वेषण पर पूरी तरह लागू होती है।

चंद्रमा पर बेस कैंप बनाना एक बड़ी चुनौती होगी। वहां इंसानों को लंबे समय तक रहने के लिए जरूरी सुविधाएं चाहिए होंगी। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बेहद जरूरी है।

भारत की महत्वाकांक्षी योजना

भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन बनाने का सपना अब एक ठोस योजना का रूप ले चुका है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो इस पर तेजी से काम कर रहा है। भारत ने 2035 तक अपना खुद का अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य रखा है।

यह भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा कर देगा जिनके पास अपना निजी स्पेस स्टेशन है। इसरो का लक्ष्य है कि 2028 तक स्टेशन का पहला मॉड्यूल लॉन्च कर दिया जाए। यह एक प्रयोगात्मक मॉड्यूल होगा जिसका उपयोग तकनीकी परीक्षण के लिए किया जाएगा।

शुरुआत में यह अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से छोटा होगा। इसका वजन लगभग 20 से 25 टन होगा। इसमें दो से चार अंतरिक्ष यात्री एक साथ रह सकेंगे और 15 से 20 दिनों तक अनुसंधान कर सकेंगे। इसे पृथ्वी की निचली कक्षा में लगभग 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया जाएगा।

स्वदेशी तकनीक पर जोर

भारत के इस स्टेशन की सबसे खास बात यह होगी कि यह पूरी तरह से स्वदेशी होगा। इसे भारत के सबसे शक्तिशाली रॉकेट एलवीएम3 के उन्नत संस्करण से लॉन्च किया जाएगा। इससे भारत को सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण से जुड़े प्रयोगों के लिए किसी दूसरे देश या अंतरराष्ट्रीय स्टेशन पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

International Space Station Retiring in 2030: गगनयान मिशन यानी भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन इस स्टेशन की नींव है। जो तकनीक गगनयान के लिए विकसित की जा रही है वही आगे चलकर स्टेशन बनाने और अंतरिक्ष यात्रियों को वहां पहुंचाने में काम आएगी।

यह स्टेशन भविष्य के चंद्र मिशन के लिए एक बेस कैंप या प्रशिक्षण केंद्र की तरह काम करेगा। भारत ने 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय को भेजने का लक्ष्य रखा है। इसरो ने स्पेस डॉकिंग तकनीक पर काम शुरू कर दिया है जिसमें दो अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष में एक दूसरे से जुड़ते हैं। यह स्टेशन के निर्माण के लिए सबसे महत्वपूर्ण तकनीक है।

वैज्ञानिक अनुसंधान में नया अध्याय

अंतरिक्ष स्टेशन का होना किसी भी देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यहां वैज्ञानिक कई तरह के प्रयोग कर सकते हैं जो पृथ्वी पर संभव नहीं हैं। सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण में दवाइयां बनाना, नई सामग्री विकसित करना और जीव विज्ञान से जुड़े प्रयोग करना इसके कुछ उदाहरण हैं।

भारत का अपना स्टेशन होने से हमारे वैज्ञानिकों को अपनी शर्तों पर प्रयोग करने का मौका मिलेगा। इससे भारत की अंतरिक्ष क्षमता में बड़ा इजाफा होगा। युवा वैज्ञानिकों को नए अवसर मिलेंगे और देश की तकनीकी प्रगति को गति मिलेगी।

भले ही अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन का अंत भावुक करने वाला हो लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक नए अध्याय का द्वार खोलेगा। अंतरिक्ष अन्वेषण में अब नई संभावनाएं बन रही हैं और भारत इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहता। आने वाले सालों में अंतरिक्ष में भारत की उपस्थिति और मजबूत होगी।

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Asfi Shadab

एक लेखक, चिंतक और जागरूक सामाजिक कार्यकर्ता, जो खेल, राजनीति और वित्त की जटिलता को समझते हुए उनके बीच के रिश्तों पर निरंतर शोध और विश्लेषण करते हैं। जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को सरल, तर्कपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध।