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भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: टैरिफ घटा, लेकिन विवाद बढ़ा

India US Trade Deal: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर सहमति, टैरिफ घटा लेकिन विवाद बढ़ा
India US Trade Deal: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर सहमति, टैरिफ घटा लेकिन विवाद बढ़ा (Image Source: FB/@narendramodi)

India US Trade Deal Latest Update | Tariffs Reduces: भारत और अमेरिका ने व्यापार समझौते की अंतरिम रूपरेखा पर सहमति जताई है। अमेरिका ने भारतीय सामानों पर टैरिफ 50% से घटाकर 18% किया। रूसी तेल की खरीद बंद करने की शर्त लगाई गई। मोदी सरकार ने इसे सराहा, जबकि विपक्ष ने आत्मसमर्पण बताया। भारत 5 साल में 500 अरब डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदेगा।

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भारत-अमेरिका के बीच ऐतिहासिक व्यापार समझौता

भारत और अमेरिका के बीच एक बड़ा व्यापार समझौता होने जा रहा है। दोनों देशों ने 6 फरवरी को एक अंतरिम रूपरेखा पर अपनी सहमति जताई है। इस समझौते के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने भारतीय सामानों पर लगने वाले टैरिफ में बड़ी कमी की है। पहले जहां टैरिफ 50 प्रतिशत था, अब उसे घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। यह फैसला दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में एक नया मोड़ लेकर आया है।

इस समझौते को लेकर भारत में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं। सरकार इसे एक बड़ी उपलब्धि बता रही है, वहीं विपक्षी दल इसे देश के हितों का आत्मसमर्पण मान रहे हैं। खासतौर पर रूसी तेल की खरीद पर लगाई गई शर्त को लेकर बहस तेज हो गई है।

रूसी तेल पर लगी शर्त का मुद्दा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश के जरिए भारतीय सामानों पर लगे अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ को हटा दिया है। लेकिन इसके बदले में भारत को एक बड़ी शर्त माननी पड़ी है। भारत ने रूस से तेल की खरीद को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बंद करने का वादा किया है।

ट्रंप प्रशासन ने साफ कर दिया है कि अमेरिकी अधिकारी इस मामले में लगातार निगरानी रखेंगे। अगर भारत फिर से रूसी तेल की खरीद शुरू करता है, तो टैरिफ को दोबारा लागू किया जा सकता है। यह शर्त भारत की ऊर्जा नीति पर सीधा असर डालने वाली है क्योंकि पिछले कुछ समय से भारत रूस से सस्ते दाम पर तेल खरीद रहा था।

अमेरिका लंबे समय से भारत पर दबाव बना रहा था कि वह रूस के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को सीमित करे। अब इस समझौते के साथ यह दबाव और बढ़ गया है।

व्यापार समझौते की मुख्य बातें

इस व्यापार समझौते की रूपरेखा में कई अहम बिंदु शामिल हैं। दोनों देश ग्लोबल सप्लाई चेन को फिर से व्यवस्थित करना चाहते हैं। इसके तहत ऊर्जा संबंधों को नया रूप दिया जाएगा और आर्थिक सहयोग को और गहरा किया जाएगा।

भारत अगले पांच सालों में 500 अरब डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदेगा। इसमें तेल, गैस, विमान और उनके पुर्जे, कीमती धातुएं और टेक्नोलॉजी उत्पाद शामिल हैं। खासकर ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट जैसे एआई से जुड़े उपकरणों की खरीद बढ़ेगी।

भारत भी अपनी तरफ से अमेरिकी औद्योगिक सामानों और कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम या खत्म करेगा। इसमें पशु आहार, सूखे मेवे, फल, सोयाबीन तेल, वाइन और शराब जैसी चीजें शामिल हैं।

किसानों के हितों की सुरक्षा का दावा

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस समझौते को किसानों के हित में बताया है। उन्होंने कहा कि यह डील संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पादों की पूरी तरह से रक्षा करती है। जेनेटिकली मॉडिफाइड कृषि उत्पादों के आयात की सीधे तौर पर इजाजत नहीं दी जाएगी क्योंकि समझौते में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।

हालांकि सेब जैसे कुछ फलों को टैरिफ कोटे के तहत अनुमति दी जाएगी। सरकार का कहना है कि इससे किसानों की आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुरक्षित रहेगी।

पीयूष गोयल ने रूसी तेल के मुद्दे पर सीधे कोई टिप्पणी नहीं की और कहा कि विदेश मंत्रालय इस पर जवाब देगा। उनके मुताबिक मार्च में इस समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है।

प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को भारत-अमेरिका संबंधों की गहराई का सबूत बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद देते हुए लिखा कि यह रूपरेखा दोनों देशों की साझेदारी की बढ़ती गहराई, भरोसे और गतिशीलता को दर्शाती है।

मोदी ने आगे कहा कि यह समझौता निवेश और तकनीक की साझेदारी को और गहरा करेगा। उनके मुताबिक इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्ते और मजबूत होंगे।

वाइट हाउस ने भी अपनी वेबसाइट पर इस व्यापार समझौते की जानकारी दी और इसे दोनों देशों के लिए फायदेमंद बताया।

अमेरिकी सामानों पर लगेगा टैरिफ

यह डील सिर्फ एक तरफा नहीं है। भारत से अमेरिका को होने वाले अधिकांश आयात पर 18 फीसदी टैरिफ दर लागू रहेगी। इसमें कपड़ा और वस्त्र, चमड़ा और जूते, प्लास्टिक और रबर, ऑर्गेनिक रसायन, होम डेकोर, हस्तशिल्प उत्पाद और कुछ मशीनरी शामिल हैं।

हालांकि पहले की तुलना में यह टैरिफ दर काफी कम है। इससे भारतीय निर्यातकों को राहत मिलेगी और अमेरिकी बाजार में उनकी पहुंच बढ़ेगी।

दोनों देशों ने साझा बयान में कहा है कि समझौते को पूरा करने के लिए आगे की बातचीत जरूरी है। अभी यह सिर्फ एक अंतरिम रूपरेखा है और अंतिम समझौते में कुछ बदलाव हो सकते हैं।

विपक्ष का तीखा हमला

कांग्रेस पार्टी ने इस व्यापार समझौते को अमेरिकी शर्तों पर तय हुआ बताया है। पार्टी का कहना है कि इससे किसानों और व्यापारियों को नुकसान होगा। कांग्रेस ने इस समझौते को राष्ट्रीय हितों का पूर्ण आत्मसमर्पण बताया है।

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने शनिवार को सवाल उठाया कि वह भारत कहां है जो निक्सन, जॉर्ज बुश और ओबामा की आंखों में आंखें डालकर व्यावहारिक रिश्ते बनाता था। उन्होंने आरोप लगाया कि आज भारत के आम लोगों के हितों को नरेंद्र मोदी और उनके दो दोस्तों अंबानी और अडानी के हितों के आगे छोटा कर दिया गया है।

पवन खेड़ा ने कहा कि यह अमेरिका के साथ कोई समझौता नहीं है बल्कि हमारे आत्मसम्मान के साथ एक समझौता है। विपक्ष का मानना है कि रूसी तेल पर शर्त लगाना भारत की विदेश नीति की स्वतंत्रता पर सवाल उठाता है।

राजद सांसद का तर्क

राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज कुमार झा ने भी सरकार पर तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि भारत का ऐतिहासिक 2.9 प्रतिशत टैरिफ पहले धमकी देकर 50 प्रतिशत तक बढ़ाया गया और फिर उसे घटाकर 18 प्रतिशत किया गया।

मनोज झा का तर्क है कि यह कदम जश्न की वजह नहीं बल्कि देश के लिए एक नुकसान है। उनके मुताबिक अगर पहले से ही टैरिफ कम था तो उसे बढ़ाकर फिर घटाना कोई उपलब्धि नहीं कही जा सकती।

विपक्षी दलों का मानना है कि सरकार ने अमेरिकी दबाव में आकर यह फैसला लिया है और इससे भारत के दीर्घकालिक हितों को नुकसान होगा।

व्यापार संबंधों का भविष्य

यह पहली बार नहीं है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत हुई है। अगस्त 2025 में भी दोनों देशों के बीच ट्रेड डील पर बातचीत हुई थी लेकिन वह सफल नहीं हो पाई थी। अब फिर से दोनों देश समझौते के करीब आए हैं।

दोनों देशों के बीच व्यापार संबंध काफी पुराने हैं। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच सालाना 190 अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार होता है।

इस नए समझौते से दोनों देशों के बीच व्यापार और बढ़ने की उम्मीद है। खासकर टेक्नोलॉजी, ऊर्जा और रक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ेगा।

ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव

रूसी तेल की जगह अब भारत अमेरिकी तेल और गैस की खरीद बढ़ाएगा। इससे भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अमेरिका की भूमिका बढ़ेगी। हालांकि सवाल यह है कि क्या अमेरिकी तेल उतना ही सस्ता होगा जितना रूसी तेल था।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की ऊर्जा लागत बढ़ सकती है जिसका असर आम लोगों पर भी पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने की आशंका है।

दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि यह समझौता भारत को ऊर्जा के मामले में ज्यादा विकल्प देगा और एक देश पर निर्भरता कम होगी।

तकनीकी सहयोग का विस्तार

इस समझौते में तकनीकी सहयोग पर भी जोर दिया गया है। भारत एआई और अन्य उन्नत तकनीक के लिए अमेरिका से ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट और दूसरे उपकरण खरीदेगा।

इससे भारत में तकनीकी विकास को बढ़ावा मिलेगा। खासकर स्टार्टअप और आईटी कंपनियों को इसका फायदा होगा। दोनों देशों के बीच तकनीकी साझेदारी से नए रोजगार के अवसर भी बनेंगे।

हालांकि विपक्ष का सवाल है कि क्या यह साझेदारी भारत के घरेलू तकनीकी उद्योग को नुकसान तो नहीं पहुंचाएगी। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी तकनीक विकसित करने पर ज्यादा जोर देना चाहिए।

कृषि क्षेत्र पर प्रभाव

कृषि क्षेत्र में इस समझौते का क्या असर होगा यह देखना होगा। सरकार का दावा है कि संवेदनशील कृषि उत्पादों की रक्षा की गई है लेकिन विपक्ष इस पर सवाल उठा रहा है।

अमेरिकी फलों और अन्य कृषि उत्पादों के आयात से भारतीय किसानों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। खासकर सेब, सूखे मेवे और अन्य फलों के उत्पादकों पर असर हो सकता है।

सरकार का कहना है कि टैरिफ कोटे के जरिए इसे नियंत्रित किया जाएगा लेकिन विपक्ष को यह भरोसा नहीं है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि किसानों के हितों की अनदेखी की गई है।

आगे की राह

यह समझौता अभी अंतिम नहीं है। मार्च में औपचारिक हस्ताक्षर होने हैं। तब तक और बातचीत होगी और कुछ बिंदुओं में बदलाव भी हो सकते हैं।

दोनों देशों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि समझौता दोनों के हितों को संतुलित करे। एक तरफा फैसले लंबे समय तक टिक नहीं सकते।

भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए बातचीत करनी होगी। रूसी तेल जैसे संवेदनशील मुद्दों पर स्पष्टता जरूरी है।

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Asfi Shadab

एक लेखक, चिंतक और जागरूक सामाजिक कार्यकर्ता, जो खेल, राजनीति और वित्त की जटिलता को समझते हुए उनके बीच के रिश्तों पर निरंतर शोध और विश्लेषण करते हैं। जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को सरल, तर्कपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध।