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Bengal Politics: कांग्रेस से मोहभंग, जब पार्टी की चुप्पी राजनीतिक विद्रोह का कारण बन जाए

Congress Leader, Khobayeb Amin Joins JUP: पीरजादा खोबायेब अमीन ने कांग्रेस छोड़ी, ममता बनर्जी की आलोचना पर रोक लगाने से नाराज
Congress Leader, Khobayeb Amin Joins JUP: पीरजादा खोबायेब अमीन ने कांग्रेस छोड़ी, ममता बनर्जी की आलोचना पर रोक लगाने से नाराज (Image Source: FB/@khobayeb.777amin)

Bengal Politics: बसीरहाट के पीरजादा खोबायेब अमीन ने कांग्रेस छोड़कर जनता उन्नयन पार्टी ज्वाइन की। कांग्रेस हाई कमान ने ममता बनर्जी की आलोचना पर रोक लगाई थी जिससे वे नाराज हो गए। मुर्शिदाबाद में JUP में शामिल होकर राज्य अध्यक्ष बने और कांग्रेस पर हमला बोला।

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पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक और उथल-पुथल देखने को मिली जब बसीरहाट के मौलानाबाग दरबार शरीफ के पीरजादा खोबायेब अमीन ने कांग्रेस पार्टी छोड़कर जनता उन्नयन पार्टी में शामिल होने का फैसला किया। मुर्शिदाबाद के मोराडीघी में एक जनसभा के दौरान हुमायूं कबीर के हाथों उन्होंने JUP की सदस्यता ली और तुरंत राज्य अध्यक्ष का पद भी मिल गया। लेकिन असली सवाल यह है कि एक राज्य कार्यकारी सचिव के पद पर रहने वाले नेता को अचानक पार्टी छोड़ने की क्या जरूरत पड़ी? क्या कांग्रेस की नीतियों में कोई ऐसी खामी है जो अपने ही कार्यकर्ताओं को निराश कर रही है?

विद्रोह की असली वजह

खोबायेब अमीन ने एक संवाददाता सम्मेलन में जो कहा, वह कांग्रेस के लिए आईना दिखाने जैसा था। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वे पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए कांग्रेस में शामिल हुए थे। लेकिन जब उन्होंने वास्तविक काम शुरू किया, तो कांग्रेस हाई कमान की ओर से उन्हें ममता बनर्जी के खिलाफ किसी भी तरह की आलोचनात्मक टिप्पणी करने से रोक दिया गया।

यह रोक उनके लिए सबसे बड़ी निराशा बन गई। एक ऐसे नेता के लिए जो अपने क्षेत्र में जमीनी स्तर पर काम करता है और जिसे स्थानीय मुद्दों की गहरी समझ है, यह आदेश असहनीय था। जब विपक्षी दल के रूप में आपको विरोध करने की आजादी ही न हो, तो फिर उस पार्टी में रहने का क्या मतलब?

हाई कमान की चुप्पी का सवाल

कांग्रेस हाई कमान की यह नीति न केवल खोबायेब अमीन के लिए, बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए चिंता का विषय है। जब राज्य में तृणमूल कांग्रेस की सरकार है और जनता विपक्ष से उम्मीद रखती है कि वह सरकार की गलतियों को उजागर करे, तब विपक्षी दल के नेताओं को मुंह बंद रखने का आदेश देना कितना तर्कसंगत है?

क्या कांग्रेस हाई कमान राज्य स्तर पर किसी समझौते या गठबंधन की संभावना को ध्यान में रखकर ऐसा कर रही है? या फिर यह केंद्रीय राजनीति की कोई बड़ी रणनीति है जिसमें राज्य के नेताओं की आवाज को दबाया जा रहा है?

स्थानीय नेताओं की उपेक्षा

खोबायेब अमीन की यह शिकायत नई नहीं है। देश भर में कांग्रेस के कई राज्य नेताओं ने यह आरोप लगाया है कि हाई कमान उन्हें पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं देता और राज्य स्तर की राजनीति को समझे बिना निर्णय थोप दिए जाते हैं।

पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में जहां राजनीति बेहद जटिल और स्थानीय मुद्दों से जुड़ी है, वहां दिल्ली से बैठकर निर्णय लेना हमेशा उचित नहीं होता। स्थानीय नेताओं को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे अपने क्षेत्र की समस्याओं के अनुसार रणनीति बना सकें।

बसीरहाट का राजनीतिक परिदृश्य

बसीरहाट पश्चिम बंगाल का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जहां मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा रहता है। मौलानाबाग दरबार शरीफ के पीरजादा के रूप में खोबायेब अमीन का इस क्षेत्र में काफी प्रभाव है। ऐसे नेता को कांग्रेस ने राज्य कार्यकारी सचिव का पद दिया था, जो उनके महत्व को दर्शाता है।

लेकिन जब उन्हें काम करने की आजादी नहीं मिली, तो उन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला किया। यह कांग्रेस के लिए न केवल एक नेता का नुकसान है, बल्कि उस क्षेत्र में पार्टी के प्रभाव में भी कमी आएगी।

जनता उन्नयन पार्टी में शामिल होना

मुर्शिदाबाद के मोराडीघी में हुई जनसभा में खोबायेब अमीन ने हुमायूं कबीर के साथ हाथ मिलाया और जनता उन्नयन पार्टी की सदस्यता ली। तुरंत उन्हें राज्य अध्यक्ष का पद दिया गया, जो कांग्रेस से कहीं बड़ी जिम्मेदारी है।

यह कदम दिखाता है कि JUP ने खोबायेब अमीन की क्षमता और प्रभाव को पहचाना और उन्हें सम्मान दिया। एक नई पार्टी में शामिल होते ही इतना बड़ा पद मिलना यह संकेत देता है कि JUP उन्हें पश्चिम बंगाल में पार्टी की उपस्थिति मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण मानती है।

क्या JUP में मिलेगी आजादी?

सवाल यह है कि क्या जनता उन्नयन पार्टी में खोबायेब अमीन को वह स्वतंत्रता मिलेगी जो कांग्रेस में नहीं मिली? क्या वे यहां ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ खुलकर बोल सकेंगे?

JUP एक छोटी पार्टी है और उसे पश्चिम बंगाल में अपनी पहचान बनाने की जरूरत है। ऐसे में खोबायेब अमीन जैसे प्रभावशाली नेता को शामिल करना और उन्हें राज्य अध्यक्ष बनाना एक रणनीतिक कदम है। लेकिन क्या यह पार्टी उन्हें वास्तविक काम करने का अवसर देगी, यह समय ही बताएगा।

कांग्रेस के खिलाफ खुला आक्रोश

JUP में शामिल होते ही खोबायेब अमीन ने कांग्रेस के खिलाफ खुलकर अपना गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने कांग्रेस हाई कमान की नीतियों की कड़ी आलोचना की और कहा कि पार्टी ने उन्हें धोखा दिया।

यह आक्रोश स्वाभाविक है। जब कोई नेता किसी पार्टी में शामिल होता है तो उसकी कुछ अपेक्षाएं होती हैं। वह सोचता है कि वह अपने क्षेत्र के लोगों के मुद्दे उठाएगा, सरकार की गलतियों को उजागर करेगा और बदलाव लाने की कोशिश करेगा। लेकिन जब पार्टी उसे मुंह बंद रखने को कहे, तो निराशा और गुस्सा होना लाजिमी है।

राजनीतिक विश्वासघात का एहसास

खोबायेब अमीन को यह लग रहा होगा कि कांग्रेस ने उनके साथ विश्वासघात किया। उन्हें एक महत्वपूर्ण पद दिया गया, लेकिन काम करने की आजादी नहीं दी गई। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी को तलवार तो दे दी जाए लेकिन म्यान से निकालने की इजाजत न हो।

ऐसी स्थिति में कोई भी सक्रिय राजनेता निराश होगा और विकल्प तलाशेगा। खोबायेब अमीन ने यही किया।

कांग्रेस की राज्य स्तरीय समस्याएं

यह घटना कांग्रेस की उन व्यापक समस्याओं को उजागर करती है जो पार्टी को पूरे देश में कमजोर बना रही हैं। केंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया, स्थानीय नेताओं की उपेक्षा, और राज्य स्तरीय मुद्दों को नजरअंदाज करना – ये सब कांग्रेस की पुरानी समस्याएं हैं।

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पहले से ही कमजोर है। वाम मोर्चे के पतन के बाद तृणमूल कांग्रेस ने राज्य की राजनीति पर कब्जा कर लिया है। ऐसे में कांग्रेस को मजबूत होने के लिए स्थानीय नेताओं पर भरोसा करना होगा और उन्हें काम करने की आजादी देनी होगी।

क्या कांग्रेस सबक लेगी?

सवाल यह है कि क्या कांग्रेस हाई कमान इस घटना से कोई सबक लेगी? क्या वे अपनी नीतियों में बदलाव लाएंगे और राज्य स्तरीय नेताओं को ज्यादा स्वतंत्रता देंगे?

अगर नहीं, तो खोबायेब अमीन जैसे और नेता भी पार्टी छोड़ सकते हैं। और हर नेता के जाने के साथ पार्टी और कमजोर होती जाएगी।

तृणमूल बनाम विपक्ष

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस का दबदबा है। विपक्ष बिखरा हुआ है और प्रभावी विरोध नहीं कर पा रहा। ऐसे में अगर कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी भी अपने नेताओं को ममता बनर्जी की आलोचना से रोकती है, तो विपक्ष की भूमिका कौन निभाएगा?

जनता को विपक्ष से यह उम्मीद होती है कि वह सरकार की जवाबदेही तय करे, गलत नीतियों का विरोध करे, और जनता के मुद्दे उठाए। लेकिन अगर विपक्षी दल ही चुप रहे, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।

गठबंधन की राजनीति

हो सकता है कि कांग्रेस हाई कमान भविष्य में किसी संभावित गठबंधन को ध्यान में रखकर ममता बनर्जी की आलोचना से बच रही हो। राष्ट्रीय स्तर पर अगर BJP के खिलाफ एकजुट होना है, तो क्षेत्रीय दलों के साथ संबंध बनाए रखना जरूरी है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि राज्य स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पूरी तरह चुप करा दिया जाए। एक संतुलन बनाना होगा।


खोबायेब अमीन का कांग्रेस छोड़कर जनता उन्नयन पार्टी में शामिल होना केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं है। यह कांग्रेस की उन संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करता है जो पार्टी को पूरे देश में कमजोर बना रही हैं।

जब एक राज्य कार्यकारी सचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहने वाला नेता यह कहकर पार्टी छोड़ दे कि उसे काम करने की आजादी नहीं मिली, तो यह पार्टी नेतृत्व के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

कांग्रेस को अपनी केंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया पर पुनर्विचार करना होगा। राज्य स्तरीय नेताओं को स्थानीय मुद्दों पर बोलने और काम करने की स्वतंत्रता देनी होगी। अन्यथा, ऐसी घटनाएं बढ़ती रहेंगी और पार्टी का आधार और कमजोर होता जाएगा।

खोबायेब अमीन के लिए यह एक नई शुरुआत है। जनता उन्नयन पार्टी में उन्हें राज्य अध्यक्ष का पद मिला है और अब उनके सामने यह चुनौती है कि वे इस छोटी पार्टी को पश्चिम बंगाल में एक विकल्प के रूप में स्थापित कर सकें।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इस घटना से सबक लेगी और अपने में सुधार करेगी? या फिर यह सिलसिला जारी रहेगा और और नेता पार्टी छोड़ते रहेंगे? समय ही बताएगा।


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Gangesh Kumar

Rashtra Bharat में Writer, Author और Editor। राजनीति, नीति और सामाजिक विषयों पर केंद्रित लेखन। BHU से स्नातक और शोधपूर्ण रिपोर्टिंग व विश्लेषण के लिए पहचाने जाते हैं।