Akhand Bharat 2047: भारत आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां भय नहीं बल्कि आत्मविश्वास उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा मुंबई में दिया गया वक्तव्य केवल एक भाषण नहीं, बल्कि राष्ट्र के मनोविज्ञान को दिशा देने वाला विचार है। 2047 को लेकर देश को तोड़ने की आशंकाओं पर उन्होंने जो कहा, वह डर के वातावरण में आशा की आवाज़ जैसा है।
अखंड भारत का विचार: कल्पना नहीं, संकल्प
डॉ. भागवत ने स्पष्ट कहा कि 2047 में देश के विभाजन का भय पालने की बजाय अखंड भारत के उदय की कल्पना की जानी चाहिए। यह कथन भावनात्मक नहीं, ऐतिहासिक यथार्थ पर आधारित है। सदियों तक विदेशी आक्रांताओं ने भारत को कमजोर करने का प्रयास किया, लेकिन वे इसकी आत्मा को तोड़ नहीं सके।
इतिहास से मिला आत्मबल
उन्होंने याद दिलाया कि जिन शक्तियों ने पांच सौ वर्षों तक यहां शासन किया, और जो अंग्रेज दो सौ वर्षों तक भारत पर काबिज रहे, वे भी भारत को स्थायी रूप से विभाजित नहीं कर पाए। ऐसे में स्वतंत्र और सशक्त भारत को कमजोर करने की कल्पना स्वयं में एक भ्रम है।
1947 से 2047 तक बदला भारत
आज का भारत 1947 वाला भारत नहीं है। सामाजिक चेतना, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मजबूती ने देश को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया है। जो शक्तियां आज भी भारत को तोड़ने के स्वप्न देखती हैं, वे बदलते भारत को समझने में असफल हैं।
समाज की भूमिका और जिम्मेदारी
डॉ. भागवत का संदेश साफ है—भारत को जोड़ने की जिम्मेदारी केवल सरकार या संस्थाओं की नहीं, बल्कि हर नागरिक की है। जब समाज संकल्पित होता है, तब षड्यंत्र स्वतः विफल हो जाते हैं।
यह वक्तव्य डर के दौर में आत्मबल जगाने का प्रयास है, और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।