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दिल्ली पुलिस जनरल नरवाणे की अप्रकाशित किताब के लीक होने की जांच में जुटी

General Naravane memoir leak controversy Rahul Gandhi Parliament: दिल्ली पुलिस ने शुरू की जांच, राहुल गांधी के संसद में किताब दिखाने के बाद मचा बवाल
General Naravane memoir leak controversy Rahul Gandhi Parliament: दिल्ली पुलिस ने शुरू की जांच, राहुल गांधी के संसद में किताब दिखाने के बाद मचा बवाल

General Naravane memoir leak controversy Rahul Gandhi Parliament: दिल्ली पुलिस ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवाणे की अप्रकाशित किताब 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' के लीक होने की जांच शुरू की है। किताब को रक्षा मंत्रालय की मंजूरी नहीं मिली थी, फिर भी राहुल गांधी ने इसे संसद में दिखाया और गलवान घाटी मामले पर सरकार की आलोचना की। विपक्ष इसे असहमति दबाने का प्रयास बता रहा है।

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General Naravane memoir leak controversy Rahul Gandhi Parliament: दिल्ली पुलिस ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवाणे की अप्रकाशित आत्मकथा के लीक होने के मामले में जांच शुरू कर दी है। यह किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ नाम से लिखी गई है, लेकिन इसे अभी तक रक्षा मंत्रालय की मंजूरी नहीं मिली है। पिछले हफ्ते जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने संसद में इस किताब की एक प्रति दिखाई, तब से यह मामला चर्चा में आ गया है। राहुल गांधी ने इस किताब का इस्तेमाल सरकार पर 2020 की गलवान घाटी की घटना के दौरान कथित रूप से गलत फैसले लेने के आरोप लगाने के लिए किया था।

किताब लीक होने का मामला क्या है

जनरल नरवाणे ने अपनी आत्मकथा 2023 के आखिर में रक्षा मंत्रालय को जमा करवाई थी। सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों के लिए यह नियम है कि वे अपनी किसी भी किताब को छापने से पहले रक्षा मंत्रालय से मंजूरी लेनी जरूरी है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किताब में कोई ऐसी जानकारी न हो जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सके। लेकिन इस मामले में किताब को अभी तक मंजूरी नहीं मिली थी, फिर भी यह किसी तरह से बाहर आ गई और विपक्ष के हाथों में पहुंच गई।

दिल्ली पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि किताब की प्रति किस तरह से लीक हुई और किसने इसे बिना मंजूरी के बाहर फैलाया। यह मामला सिर्फ किताब के लीक होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक पहलू भी जुड़ गए हैं।

संसद में राहुल गांधी ने किताब दिखाई

पिछले हफ्ते लोकसभा में राहुल गांधी ने इस किताब की एक प्रति दिखाते हुए सरकार पर हमला बोला था। उन्होंने दावा किया कि किताब में जनरल नरवाणे ने 2020 की गलवान घाटी की घटना के समय सरकार की तैयारियों और फैसलों की आलोचना की है। गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई झड़प में 20 भारतीय जवान शहीद हो गए थे। यह घटना भारत-चीन संबंधों में एक बड़ा मोड़ साबित हुई थी।

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार ने उस समय सही तरीके से जवाब नहीं दिया और सेना की तैयारियों में कमी थी। इस बयान के बाद संसद में हंगामा मच गया। सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्यों ने इसे देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाना बताया और इसकी कड़ी निंदा की। नतीजतन, राहुल गांधी सहित कई विपक्षी सदस्यों को सदन से निलंबित कर दिया गया।

रक्षा मंत्रालय की मंजूरी क्यों जरूरी है

भारत में सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों के लिए यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वे अपनी किसी भी किताब या लेख को प्रकाशित करने से पहले रक्षा मंत्रालय से मंजूरी लें। इसका उद्देश्य यह है कि कोई भी ऐसी गोपनीय जानकारी सार्वजनिक न हो जाए जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नुकसानदायक हो सकती है। सैन्य रणनीति, ऑपरेशन की जानकारी, या सरकार के आंतरिक फैसले अगर बिना जांच के छप जाएं, तो इससे देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

जनरल नरवाणे ने अपनी किताब को समय पर जमा तो करवा दिया था, लेकिन मंत्रालय ने अभी तक इसे मंजूरी नहीं दी थी। ऐसे में यह सवाल उठता है कि अगर किताब अभी तक अधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई, तो फिर इसकी प्रति बाहर कैसे पहुंची।

विपक्ष का आरोप – असहमति दबाने की कोशिश

विपक्षी दलों ने इस पूरे मामले को सरकार द्वारा असहमति को दबाने की कोशिश बताया है। उनका कहना है कि दिल्ली पुलिस की जांच का असली मकसद किताब के लीक होने की जांच नहीं, बल्कि उन लोगों को डराना है जो सरकार की आलोचना कर रहे हैं। विपक्ष का तर्क है कि अगर किताब में सच्चाई लिखी है, तो सरकार को उससे डरने की जरूरत नहीं। इसके बजाय, उसे पारदर्शिता दिखानी चाहिए।

कांग्रेस के कई नेताओं ने कहा कि लोकतंत्र में बोलने की आजादी हर नागरिक का हक है। अगर एक पूर्व सेना प्रमुख अपने अनुभव साझा करना चाहते हैं, तो इसमें कोई बुराई नहीं होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या रक्षा मंत्रालय जानबूझकर किताब को मंजूरी नहीं दे रहा ताकि सच्चाई बाहर न आए।

पुलिस जांच का फोकस क्या है

दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया है कि उनकी जांच का केंद्र किताब की सामग्री नहीं, बल्कि उसके अप्रकाशित रूप में लीक होने की प्रक्रिया है। पुलिस यह जानना चाहती है कि किताब की प्रति किसने, कब, और किस मकसद से बाहर की। क्या यह जानबूझकर राजनीतिक फायदा उठाने के लिए किया गया, या फिर यह कोई साधारण सुरक्षा चूक थी।

पुलिस ने कई लोगों से पूछताछ शुरू कर दी है, जिसमें प्रकाशन से जुड़े लोग, मीडिया कर्मी, और राजनीतिक दलों के सदस्य शामिल हो सकते हैं। यह जांच काफी संवेदनशील है क्योंकि इसमें सेना, सरकार, और विपक्ष तीनों शामिल हैं।

सुरक्षा जांच और अभिव्यक्ति की आजादी के बीच तनाव

यह मामला एक बार फिर से सुरक्षा जांच और अभिव्यक्ति की आजादी के बीच के तनाव को सामने लाता है। एक तरफ सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारी को नियंत्रित करना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और नागरिक समाज का मानना है कि पारदर्शिता और सच बोलने का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

पिछले कुछ सालों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां सेवानिवृत्त अधिकारियों की किताबों को मंजूरी में देरी हुई या रोक दिया गया। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह प्रक्रिया सचमुच सुरक्षा के लिए है, या फिर इसका इस्तेमाल असुविधाजनक सच्चाइयों को छुपाने के लिए किया जा रहा है।

जनता की प्रतिक्रिया

आम जनता में भी इस मामले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया है। कुछ लोगों का मानना है कि सेना के पूर्व प्रमुख की किताब को रोकना गलत है और लोगों को सच्चाई जानने का हक है। वहीं कुछ का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सावधानी जरूरी है और हर चीज को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।

सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा ट्रेंड कर रहा है। कई लोग सरकार से पूछ रहे हैं कि अगर किताब में कुछ गलत नहीं है, तो मंजूरी क्यों नहीं दी जा रही। कुछ लोग राहुल गांधी के संसद में किताब दिखाने को सही ठहरा रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक नाटक बता रहे हैं।

आगे क्या होगा

General Naravane memoir leak controversy Rahul Gandhi Parliament: अभी यह देखना बाकी है कि दिल्ली पुलिस की जांच किस नतीजे पर पहुंचती है। अगर यह साबित होता है कि किताब जानबूझकर लीक की गई थी, तो इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। वहीं अगर यह पता चलता है कि यह कोई साधारण चूक थी, तो मामला ठंडा पड़ सकता है।

लेकिन राजनीतिक रूप से यह मुद्दा लंबे समय तक चर्चा में रह सकता है। विपक्ष इसे चुनावों में भी मुद्दा बना सकता है, खासकर सुरक्षा और पारदर्शिता के सवालों को लेकर। सरकार को भी यह स्पष्ट करना होगा कि रक्षा मंत्रालय की मंजूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और निष्पक्ष है।

यह पूरा प्रकरण दिखाता है कि भारतीय लोकतंत्र में सुरक्षा, स्वतंत्रता, और जवाबदेही के बीच संतुलन बनाना कितना जरूरी और चुनौतीपूर्ण है।

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Asfi Shadab

एक लेखक, चिंतक और जागरूक सामाजिक कार्यकर्ता, जो खेल, राजनीति और वित्त की जटिलता को समझते हुए उनके बीच के रिश्तों पर निरंतर शोध और विश्लेषण करते हैं। जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को सरल, तर्कपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध।