Earthquakes in Bengal: पिछले कुछ दिनों से पश्चिम बंगाल की धरती एक अजीब बेचैनी में है। खासकर राज्य के उत्तरी हिस्से—सिलीगुड़ी, दार्जिलिंग और आसपास के इलाकों में लोगों की नींद उड़ चुकी है। वजह है लगातार आ रहे भूकंप के झटके। शुक्रवार देर रात से लेकर मंगलवार सुबह तक बंगाल और उससे सटे सिक्किम क्षेत्र में कुल 39 बार धरती कांप चुकी है। भले ही इन झटकों की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 3 से 4 के बीच रही हो, लेकिन इतनी बार एक के बाद एक झटकों का आना सामान्य नहीं माना जा रहा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने पहले कभी इस तरह की स्थिति नहीं देखी। कभी रात के सन्नाटे में अचानक बिस्तर हिल जाता है, तो कभी सुबह-सुबह कंपन महसूस होता है। डर इस बात का नहीं है कि झटके हल्के हैं, डर इस बात का है कि ये रुक क्यों नहीं रहे।
लगातार भूकंप क्या किसी बड़े खतरे का संकेत हैं?
भूगर्भ विज्ञान की भाषा में लगातार आने वाले छोटे-छोटे भूकंप को हल्के में नहीं लिया जाता। विशेषज्ञों के मुताबिक, कई बार यह किसी बड़े भूकंप से पहले की चेतावनी भी हो सकती है। भले ही अभी कोई तबाही नहीं हुई हो, लेकिन धरती के भीतर चल रही हलचल को नजरअंदाज करना खतरे से खाली नहीं है।
भूगर्भ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्थिति आम जनता के लिए चेतावनी है कि वे सतर्क रहें और आपदा से निपटने की तैयारी रखें।
शुक्रवार रात से शुरू हुई भूकंपों की श्रृंखला
स्थानीय निवासियों के अनुसार, पहला झटका शुक्रवार की देर रात महसूस किया गया। उस समय अधिकतर लोग सो रहे थे, इसलिए घबराहट और ज्यादा फैल गई। इसके बाद हालात और गंभीर हो गए, जब महज चार घंटे बारह मिनट के भीतर 12 बार धरती कांपी। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। शनिवार, रविवार और सोमवार को भी छोटे-छोटे झटके आते रहे और मंगलवार सुबह तक लोगों की चिंता बनी रही।
सिलीगुड़ी और आसपास के क्षेत्रों में कई लोगों ने एहतियातन रात घर के बाहर या खुले स्थानों पर बिताई।
सिक्किम केंद्र में, लेकिन बंगाल पर असर क्यों?
इन भूकंपों का केंद्र भले ही सिक्किम बताया जा रहा हो, लेकिन इसका असर सीधे तौर पर बंगाल के उत्तरी हिस्सों पर पड़ रहा है। भौगोलिक दृष्टि से यह पूरा इलाका संवेदनशील जोन में आता है। पहाड़ी संरचना और फॉल्ट लाइन की मौजूदगी इसे और भी जोखिम भरा बनाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सिक्किम क्षेत्र में कोई बड़ा भूकंप आता है, तो उत्तरी बंगाल उससे अछूता नहीं रहेगा।
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
भूगर्भ विशेषज्ञ संदीप बनर्जी के अनुसार, यह स्थिति ‘चौथे झटके’ जैसी हो सकती है। उनका मानना है कि भूकंप कभी-कभी झुंड में आते हैं, ठीक वैसे ही जैसे टिड्डियों का झुंड। ये छोटे झटके किसी बड़े भूकंप से पहले की भूमिका भी हो सकते हैं।
वे इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि क्या इन भूकंपों के पीछे मानवीय गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं। पहाड़ों में जलाशयों का निर्माण, चौड़ी सड़कों का विकास और रेलवे लाइन बिछाने के लिए सुरंगों में डायनामाइट का इस्तेमाल—ये सभी कारक धरती की संतुलन व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।
सरकार और प्रशासन अलर्ट मोड में
सिक्किम सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग ने लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। सुरक्षित स्थानों की पहचान करने और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत बाहर निकलने के निर्देश दिए गए हैं। भले ही बंगाल सरकार की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक चेतावनी जारी न हुई हो, लेकिन स्थानीय प्रशासन हालात पर नजर बनाए हुए है।
पर्यटन क्षेत्र में भी चिंता
उत्तरी बंगाल और सिक्किम का यह इलाका साल भर पर्यटकों से भरा रहता है। दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी और गंगटोक जैसे स्थानों पर बड़ी संख्या में सैलानी मौजूद रहते हैं। ऐसे में लगातार भूकंप की खबरों से पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों में भी डर है। किसी बड़े हादसे की आशंका न केवल जान-माल के लिए खतरा बन सकती है, बल्कि पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर भी असर डाल सकती है।
आम लोगों को क्या करना चाहिए?
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन लापरवाही भी नहीं बरतनी चाहिए। भारी अलमारियों और खिड़कियों से दूर रहना, आपात स्थिति में खुले स्थान की ओर जाना और अफवाहों पर ध्यान न देना बेहद जरूरी है।