No-Confidence Motion: लोकसभा में चल रहा गतिरोध अब एक नए और ज्यादा गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। विपक्ष ने सीधे तौर पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का नोटिस सौंपकर साफ कर दिया है कि अब मामला केवल कार्यवाही ठप होने तक सीमित नहीं रहा। संसद के भीतर और बाहर, दोनों जगह यह कदम लोकतांत्रिक व्यवस्था और संसदीय मर्यादाओं को लेकर एक बड़ी बहस को जन्म दे रहा है।
कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने मंगलवार दोपहर 1 बजकर 14 मिनट पर नियम और प्रक्रिया के नियम 94C के तहत लोकसभा सचिवालय को यह नोटिस सौंपा। यह कदम अचानक नहीं उठाया गया, बल्कि पिछले कई दिनों से लोकसभा में हो रहे हंगामे, निलंबन और आरोप-प्रत्यारोप की पृष्ठभूमि में इसे लगभग तय माना जा रहा था।
लोकसभा में गतिरोध और विपक्ष की नाराजगी
लोकसभा का मौजूदा सत्र लगातार हंगामे की भेंट चढ़ता रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सदन को चलाने में संतुलन नहीं रखा जा रहा और उनकी आवाज को बार-बार दबाया जा रहा है। इसी नाराजगी ने अब स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का रूप ले लिया है।
मंगलवार को भी जैसे ही सदन की कार्यवाही शुरू हुई, जोरदार शोर-शराबे के कारण पहले 12 बजे और फिर दोपहर 2 बजे तक कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। विपक्षी दलों का कहना है कि जब तक उनके निलंबित सांसदों को बहाल नहीं किया जाता, तब तक सदन को सामान्य तरीके से चलाना संभव नहीं है।
कांग्रेस ने क्यों खोला स्पीकर के खिलाफ मोर्चा
कांग्रेस का तर्क है कि लोकसभा अध्यक्ष का पद निष्पक्षता और संतुलन का प्रतीक होता है। यदि विपक्ष को लगता है कि इस पद की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। गौरव गोगोई ने साफ शब्दों में कहा कि यह नोटिस नियमों के तहत दिया गया है और इसका मकसद संसदीय व्यवस्था को लेकर गंभीर चर्चा कराना है।
यह पहली बार नहीं है जब किसी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया हो, लेकिन यह हमेशा असाधारण परिस्थिति में ही होता है। यही कारण है कि इस कदम को राजनीतिक गलियारों में बेहद अहम माना जा रहा है।
सरकार की कोशिशें और फ्लोर लीडर्स की बैठक
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने गतिरोध खत्म करने के लिए सभी दलों के फ्लोर लीडर्स के साथ बैठक बुलाई थी। बैठक में विपक्ष की ओर से साफ संकेत दिया गया कि यदि आठ निलंबित सांसदों का निलंबन समाप्त किया जाता है, तो वे सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि, इस पर अब तक कोई ठोस सहमति नहीं बन पाई है। सरकार का कहना है कि नियमों के तहत ही कार्रवाई की गई है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता रहा है।
अविश्वास प्रस्ताव का राजनीतिक संदेश
स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना केवल एक संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है। विपक्ष यह दिखाना चाहता है कि वह अब आक्रामक रुख अपनाने को तैयार है और संसदीय संस्थाओं की भूमिका पर खुलकर सवाल उठाएगा।
वहीं, सत्तापक्ष इसे बेवजह का राजनीतिक दबाव और सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला कदम मान रहा है। दोनों पक्षों के बीच बढ़ता टकराव आने वाले दिनों में संसद के कामकाज को और मुश्किल बना सकता है।
आगे क्या हो सकता है
अब सबकी नजर इस पर है कि लोकसभा अध्यक्ष इस नोटिस पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या यह प्रस्ताव सदन में चर्चा के लिए स्वीकार किया जाता है। यदि ऐसा होता है, तो यह संसद के इतिहास में एक अहम अध्याय होगा।
फिलहाल, संसद का माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है। आम जनता के लिए यह सवाल भी अहम है कि क्या इस राजनीतिक टकराव के बीच उनके मुद्दों पर चर्चा हो पाएगी या नहीं।