No-Confidence Motion: लोकसभा की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां प्रक्रिया, परंपरा और टकराव तीनों आमने-सामने दिख रहे हैं। विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंपकर संसद के भीतर जारी गतिरोध को और तीखा कर दिया है। यह कदम सिर्फ एक प्रस्ताव भर नहीं है, बल्कि इसके जरिए विपक्ष ने यह संकेत दिया है कि वह सदन के संचालन और अध्यक्ष की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े करना चाहता है।
इस प्रस्ताव पर कांग्रेस, डीएमके, समाजवादी पार्टी सहित कई विपक्षी दलों के करीब 120 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। नोटिस लोकसभा सचिवालय को सौंपा जा चुका है। इसके तुरंत बाद अध्यक्ष ओम बिरला ने खुद को सदन की कार्यवाही के संचालन से अलग कर लिया और मंगलवार को वह आसन पर नहीं बैठे। यह दृश्य अपने आप में असामान्य रहा, क्योंकि आमतौर पर लोकसभा अध्यक्ष का इस तरह कार्यवाही से अलग होना बहुत दुर्लभ माना जाता है।
अविश्वास प्रस्ताव के पीछे की पूरी पृष्ठभूमि
विपक्ष का आरोप है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान अध्यक्ष की भूमिका निष्पक्ष नहीं रही। विपक्षी दलों का कहना है कि राहुल गांधी और अन्य नेताओं को सदन में बोलने से रोका गया, जिससे संसदीय परंपराओं का उल्लंघन हुआ। नोटिस में यह भी कहा गया है कि अध्यक्ष की कुछ टिप्पणियों से कांग्रेस सांसदों पर परोक्ष रूप से झूठे आरोप लगे, जिससे विपक्ष खुद को अपमानित महसूस कर रहा है।
विपक्ष के नेताओं का मानना है कि लोकसभा अध्यक्ष का पद किसी दल विशेष से ऊपर होता है और उनसे तटस्थ व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। जब अध्यक्ष पर ही पक्षपात का आरोप लगे, तो यह सवाल केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी संसदीय व्यवस्था की साख से जुड़ जाता है।
120 सांसदों के हस्ताक्षर
इस अविश्वास प्रस्ताव की सबसे बड़ी खासियत विपक्ष की संख्या और एकजुटता है। अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों का एक मंच पर आना यह दिखाता है कि असंतोष केवल एक पार्टी का नहीं है। कांग्रेस, डीएमके, समाजवादी पार्टी और अन्य दलों के सांसदों ने मिलकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि सदन के भीतर उनकी आवाज दबाई जा रही है।
हालांकि, इस प्रस्ताव पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हस्ताक्षर नहीं किए। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को देखते हुए विपक्ष के नेता का स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करना उचित नहीं माना गया। यह फैसला बताता है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर आक्रामक होने के साथ-साथ एक संतुलन भी बनाए रखना चाहती है।
अध्यक्ष का खुद को कार्यवाही से अलग करना
नोटिस सौंपे जाने के बाद अध्यक्ष ओम बिरला का सदन की कार्यवाही से खुद को अलग कर लेना एक अहम संकेत माना जा रहा है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब लोकसभा में लगातार हंगामे और स्थगन की स्थिति बनी हुई है। अध्यक्ष का आसन पर न बैठना यह दिखाता है कि मामला कितना संवेदनशील हो चुका है।
राजनीतिक गलियारों में इसे अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है। कुछ लोग इसे नैतिक जिम्मेदारी का उदाहरण मान रहे हैं, तो कुछ इसे संसदीय दबाव का नतीजा बता रहे हैं।
सदन का गतिरोध और सियासी संदेश
लोकसभा में मंगलवार को कार्यवाही शुरू होते ही हंगामा हुआ और सदन को बार-बार स्थगित करना पड़ा। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू की ओर से फ्लोर लीडर्स की बैठक बुलाई गई थी, जिसमें गतिरोध खत्म करने की कोशिश हुई। खबरें हैं कि विपक्ष निलंबित सांसदों की वापसी की शर्त पर सदन चलाने को तैयार है।
यह पूरा घटनाक्रम यह दिखाता है कि संसद केवल कानून बनाने की जगह नहीं रह गई है, बल्कि वह राजनीतिक संदेश देने का मंच भी बन चुकी है। अविश्वास प्रस्ताव के जरिए विपक्ष सरकार और सत्ता पक्ष पर यह दबाव बनाना चाहता है कि सदन को केवल बहुमत के आधार पर नहीं, बल्कि सहमति और संवाद से चलाया जाए।
लोकतंत्र और मर्यादा पर बड़ा सवाल
लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव अपने आप में एक गंभीर और दुर्लभ कदम होता है। यह सवाल उठाता है कि क्या संसद में भरोसे की कमी इतनी बढ़ गई है कि अब अध्यक्ष की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं मानी जाती, क्योंकि अध्यक्ष का पद ही वह धुरी है, जिस पर पूरी संसदीय प्रक्रिया घूमती है।