पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ आया है। तृणमूल कांग्रेस से निकाले गए नेता हुमायूँ कबीर ने अपनी राजनीतिक रणनीति को नया रूप देते हुए नदिया जिले के पलाशी से बाबरी यात्रा शुरू की है। यह यात्रा मुर्शिदाबाद के बाद अब नदिया में पहुंच गई है। बुधवार को पलाशी स्मारक से शुरू हुई यह बाइक रैली करीब 22 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए मुर्शिदाबाद के बेलडांगा तक जाएगी। अपने समर्थकों के साथ बाइक पर सवार होकर हुमायूँ कबीर ने इस रैली में हिस्सा लिया और रास्ते भर अपने राजनीतिक संदेश देते रहे।
राजनीतिक रणनीति का नया दांव
हुमायूँ कबीर का यह कदम 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ी राजनीतिक चाल माना जा रहा है। उनका दावा है कि यह कार्यक्रम राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी से लेकर विपक्षी दलों को भी हिलाकर रख देगा। हुमायूँ कबीर के समर्थकों का कहना है कि 2026 में वे ही असली बदलाव दिखाएंगे। यह यात्रा सिर्फ एक रैली नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश है जो पूरे राज्य में गूंज रहा है। पलाशी जैसी ऐतिहासिक जगह से इस यात्रा को शुरू करना भी एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगता है।
बाबरी मसजिद का मुद्दा फिर से उठा
कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बाबरी मसजिद को लेकर अपना बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि इतिहास में अब कभी बाबरी मसजिद नहीं बनेगी। लेकिन तृणमूल से निकाले जाने के बाद हुमायूँ कबीर ने नई पार्टी बनाई और बाबरी मसजिद को लेकर एक नया मुद्दा उठाया है। पूरे राज्य में उन्होंने इस मुद्दे पर जोरदार बहस छेड़ दी है। विपक्ष का कहना है कि हुमायूँ कबीर की यह पहल पूरी तरह से हवाई है और कभी भी बाबरी मसजिद का निर्माण संभव नहीं होगा।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों ने हुमायूँ कबीर की इस यात्रा को लेकर अलग-अलग बयान दिए हैं। कुछ नेताओं का मानना है कि यह सिर्फ एक राजनीतिक नाटक है जिसका कोई ठोस आधार नहीं है। विपक्ष का सवाल है कि आखिर हुमायूँ कबीर की राजनीतिक रणनीति क्या है और उनका असली उद्देश्य क्या है। क्या वे सांप्रदायिक ताकतों को इस्तेमाल करके राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी को चुनौती दे रहे हैं। यह सवाल इस समय पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गया है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुप्पी
हुमायूँ कबीर ने कई मंचों पर खड़े होकर राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और विपक्षी दलों को चुनौती दी है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सत्तारूढ़ दल की तरफ से उनकी इस चुनौती पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं आई है। ममता बनर्जी ने अभी तक हुमायूँ कबीर की बाबरी यात्रा पर कोई सीधी टिप्पणी नहीं की है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सत्तारूढ़ दल शायद इस मुद्दे को ज्यादा तवज्जो नहीं देना चाहता क्योंकि यह उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
यात्रा का मार्ग और योजना
पलाशी स्मारक से शुरू हुई यह बाइक रैली करीब 22 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में समाप्त होगी। बेलडांगा पहुंचने के बाद हुमायूँ कबीर एक जनसभा को संबोधित करेंगे। इस यात्रा में उनके साथ सैकड़ों समर्थक बाइक पर सवार होकर चल रहे हैं। रास्ते भर नारे लगाए जा रहे हैं और लोगों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है। यह यात्रा केवल नदिया और मुर्शिदाबाद तक ही सीमित नहीं रहने वाली बल्कि आगे और भी विस्तार लेगी ऐसा माना जा रहा है।
2026 चुनाव की तैयारी
2026 के विधानसभा चुनाव से पहले हुमायूँ कबीर की यह रणनीति कितनी कारगर साबित होगी यह तो समय ही बताएगा। लेकिन उनके समर्थकों में जोश और उत्साह साफ देखा जा सकता है। वे मानते हैं कि बाबरी यात्रा से एक नई राजनीतिक लहर पैदा होगी जो चुनाव के नतीजों को प्रभावित कर सकती है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतने बड़े मुद्दे को उठाना आसान है लेकिन उसे जमीन पर उतारना बहुत मुश्किल काम है।
समर्थकों का उत्साह
हुमायूँ कबीर के समर्थक इस यात्रा को लेकर काफी उत्साहित हैं। उनका कहना है कि यह यात्रा सिर्फ एक रैली नहीं बल्कि एक आंदोलन की शुरुआत है। समर्थकों का दावा है कि 2026 में वे बदलाव की नई इबारत लिखेंगे। पलाशी से लेकर बेलडांगा तक के रास्ते में लोगों ने उनका स्वागत किया और कई जगहों पर छोटी-छोटी सभाएं भी की गईं। यह यात्रा केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं बल्कि आने वाले समय में और भी बड़े पैमाने पर आयोजित होने वाली है।
सांप्रदायिक राजनीति का आरोप
विपक्षी दलों ने हुमायूँ कबीर पर सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि बाबरी मसजिद जैसे संवेदनशील मुद्दे को उठाकर वे समाज में विभाजन पैदा कर रहे हैं। लेकिन हुमायूँ कबीर और उनके समर्थकों का तर्क है कि वे केवल अपने समुदाय के अधिकारों की बात कर रहे हैं और यह उनका लोकतांत्रिक हक है। राजनीतिक माहौल इस बहस से और भी गर्म हो गया है।
आगे की राह
अब सवाल यह है कि विधानसभा चुनाव से पहले और बाद में हुमायूँ कबीर की क्या स्थिति बनती है। उनकी बाबरी यात्रा और उद्देश्य कितना हकीकत में बदल पाता है यह देखना दिलचस्प होगा। क्या वे सच में एक मजबूत राजनीतिक विकल्प बन पाएंगे या फिर यह सिर्फ एक अस्थायी उछाल साबित होगा। पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह एक नया अध्याय शुरू हो गया है और आने वाले महीनों में इसके कई मोड़ देखने को मिलेंगे।
हुमायूँ कबीर की यह यात्रा न केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम है बल्कि राज्य की सामाजिक और राजनीतिक बुनावट में एक नई चर्चा का विषय बन गई है। समय ही बताएगा कि यह पहल कितनी सफल होती है और 2026 के चुनावों में इसका कितना असर पड़ता है।