Tarique Rehman: बांग्लादेश में हुए आम चुनाव के नतीजों ने देश की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। वोटों की गिनती के साथ ही यह साफ हो गया है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी बहुमत के आंकड़े को पार कर चुकी है। 17 साल के लंबे अंतराल के बाद देश लौटे तारिक रहमान अब प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। यह केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता की वापसी है जिसने निर्वासन, मुकदमों और राजनीतिक संघर्ष के बीच अपना रास्ता बनाया।
चुनाव परिणामों ने साफ संकेत दिया है कि जनता बदलाव चाहती थी। 151 सीटों पर जीत और कई अन्य सीटों पर बढ़त के साथ बीएनपी ने 13वें संसदीय चुनाव में मजबूत स्थिति हासिल की है। ढाका-17 और बोगुरा-6 सीट से तारिक रहमान की जीत ने उनकी राजनीतिक पकड़ को और मजबूत कर दिया है।
पारिवारिक विरासत और प्रारंभिक जीवन
तारिक रहमान का जन्म 20 नवंबर 1965 को ढाका में हुआ। वे पूर्व राष्ट्रपति जिया-उर-रहमान और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे हैं। 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के समय वे केवल चार वर्ष के थे और उस दौर में उन्हें कुछ समय के लिए हिरासत में भी रखा गया। उनकी पार्टी उन्हें युद्ध के सबसे कम उम्र के बंदियों में शामिल बताकर सम्मान देती है।
राजनीतिक माहौल में पले-बढ़े तारिक को बचपन से ही सार्वजनिक जीवन में रुचि थी। 1991 में जब उनकी मां खालिदा जिया प्रधानमंत्री बनीं, तब संगठन को मजबूत करने में तारिक की अहम भूमिका मानी गई। यही वह समय था जब उन्होंने सक्रिय राजनीति की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए।
मुकदमे, गिरफ्तारी और 17 वर्ष का निर्वासन
तारिक रहमान का राजनीतिक जीवन आसान नहीं रहा। उन पर भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों सहित लगभग 84 मुकदमे दर्ज किए गए। वर्ष 2007 में सैन्य समर्थित अंतरिम सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जेल में उन्होंने कठिन परिस्थितियों का सामना किया।
सितंबर 2008 में जमानत मिलने के बाद वे चिकित्सा के बहाने लंदन चले गए और वहीं से राजनीतिक गतिविधियां जारी रखीं। 17 वर्षों तक वे स्वनिर्वासन में रहे, लेकिन वीडियो कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया और डिजिटल सभाओं के माध्यम से पार्टी को दिशा देते रहे।
यह दौर उनके लिए राजनीतिक परीक्षा का समय था। देश से दूर रहकर भी पार्टी को एकजुट रखना आसान नहीं होता, लेकिन उन्होंने संगठन को टूटने नहीं दिया।
कानूनी बदलाव और वापसी का मार्ग
2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश के राजनीतिक और कानूनी परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया। कई पुराने मामलों की पुनर्समीक्षा हुई और 2026 की शुरुआत तक अधिकांश मामलों में तारिक को राहत मिल गई।
2018 में जिस ग्रेनेड हमले के मामले में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, उसमें भी वे बरी हो गए। यह फैसला उनके लिए राजनीतिक पुनर्जन्म जैसा था। दिसंबर 2025 में वे ढाका लौटे। उनकी वापसी केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी थी कि अब वे खुलकर नेतृत्व करेंगे।
चुनावी जीत और नई जिम्मेदारी
इस चुनाव में बीएनपी ने 151 सीटों पर जीत दर्ज की है। ढाका-17, जो राजधानी का महत्वपूर्ण क्षेत्र है, और बोगुरा-6, जो उनका पारिवारिक गढ़ माना जाता है, दोनों जगह से उनकी जीत ने यह साबित किया कि वे केवल विरासत के भरोसे नहीं, बल्कि जनसमर्थन के आधार पर आगे बढ़े हैं।
अब जब प्रधानमंत्री बनने की संभावना लगभग तय मानी जा रही है, तब उनके सामने कई चुनौतियां भी होंगी। देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर करना, राजनीतिक ध्रुवीकरण को कम करना और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को संतुलित रखना बड़ी जिम्मेदारियां होंगी।
चुनौतियां और उम्मीदें
तारिक रहमान को एक ऐसे दौर में नेतृत्व संभालना होगा जब बांग्लादेश राजनीतिक रूप से विभाजित रहा है। विपक्ष और सत्ता के बीच वर्षों से चली आ रही कड़वाहट को कम करना आसान नहीं होगा।
इसके साथ ही युवा पीढ़ी रोजगार, शिक्षा और पारदर्शी शासन की मांग कर रही है। यदि वे इन मुद्दों पर ठोस कदम उठाते हैं तो उनकी छवि एक संघर्षशील नेता से आगे बढ़कर एक निर्णायक प्रशासक की बन सकती है।
बांग्लादेश की राजनीति में यह क्षण ऐतिहासिक है। एक ऐसे नेता की वापसी, जिसे कभी हाशिये पर धकेल दिया गया था, आज देश के सर्वोच्च पद की ओर बढ़ रही है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वे अपने संघर्ष को शासन की शक्ति में कैसे बदलते हैं।