हाल ही में संसद के बजट सत्र के दौरान सिनेमा टिकट पर लगने वाले कर को लेकर जोरदार बहस देखने को मिली। यह बहस तब शुरू हुई जब फिल्म उद्योग की स्थिति पर चर्चा करते हुए सांसद जया बच्चन ने टिकट पर लगने वाले ज्यादा कर को दर्शकों की कम संख्या का एक बड़ा कारण बताया। उन्होंने सरकार से इस क्षेत्र को राहत देने की मांग की। इस पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जवाब देते हुए कहा कि मनोरंजन कर तय करना केंद्र सरकार का नहीं बल्कि राज्यों का अधिकार है।
यह बहस राज्यसभा में बजट 2026-27 पर चर्चा के दौरान सामने आई और कुछ समय के लिए सदन का माहौल भी गरम हो गया। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया कि फिल्मों पर लगने वाले कर को लेकर असली जिम्मेदारी किसकी है और फिल्म उद्योग की समस्याओं का समाधान कैसे निकाला जा सकता है।
HUGE 🚨 FM Nirmala Sitharaman lost her cool on Jaya Bachchan.
FM : “Vocal cords are not just with you. Vocal cords are with everybody” 🔥🔥
JAYA : My question is about Entertainment Tax
FM : Entertainment tax falls under the State’s jurisdiction. No point of asking me 🔥 pic.twitter.com/YOgxILWEVR
— News Algebra (@NewsAlgebraIND) February 14, 2026
कर व्यवस्था और जिम्मेदारी का सवाल
भारत में वस्तु एवं सेवा कर लागू होने के बाद कई तरह के करों को एक साथ जोड़ा गया, लेकिन मनोरंजन कर का अंतिम फैसला अब भी राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है। यही कारण है कि अलग-अलग राज्यों में सिनेमा टिकट के दाम अलग-अलग दिखाई देते हैं। कुछ राज्यों में कर अधिक होने से टिकट महंगे हो जाते हैं, जिससे दर्शकों की संख्या पर असर पड़ता है।
वित्त मंत्री ने संसद में साफ कहा कि केंद्र सरकार सीधे तौर पर टिकट कर कम या ज्यादा नहीं कर सकती। यह फैसला राज्यों को करना होता है और यदि फिल्म उद्योग को राहत देनी है तो राज्यों को अपनी कर नीति पर विचार करना होगा। उनके इस बयान से यह स्पष्ट हुआ कि केंद्र और राज्य के बीच जिम्मेदारी का बंटवारा संविधान के नियमों के अनुसार तय है।
फिल्म उद्योग की आर्थिक चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में फिल्म उद्योग कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते असर, टिकट की बढ़ती कीमतें और दर्शकों की बदलती पसंद के कारण सिनेमाघरों की आय पर दबाव पड़ा है। कई निर्माता और सिनेमाघर मालिक लंबे समय से कर में राहत की मांग करते रहे हैं ताकि टिकट सस्ते हों और दर्शकों की संख्या बढ़े।
जया बच्चन ने इसी संदर्भ में कहा कि यदि टिकट की कीमतें कम होंगी तो आम लोग ज्यादा संख्या में सिनेमा देखने जाएंगे और इससे उद्योग को फायदा होगा। उनका मानना है कि फिल्म उद्योग केवल मनोरंजन ही नहीं बल्कि रोजगार और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा हुआ क्षेत्र है, इसलिए इसे राहत मिलनी चाहिए।
संसद में बयान पर प्रतिक्रिया
वित्त मंत्री के जवाब के दौरान सदन में कुछ देर के लिए शोर-शराबा भी हुआ। उन्होंने कहा कि अपनी बात रखने का अधिकार सभी सदस्यों को है और सभी को नियमों के अनुसार बोलने का मौका मिलता है। उनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी इस बहस की चर्चा शुरू हो गई। कुछ लोगों ने उनके जवाब को तथ्य आधारित बताया, जबकि कुछ ने उनके बोलने के तरीके पर सवाल उठाए।
यह घटना बताती है कि संसद में बजट चर्चा के दौरान केवल आर्थिक आंकड़ों की ही नहीं बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों की समस्याओं पर भी गंभीर बहस होती है। फिल्म उद्योग की स्थिति पर चर्चा ने यह भी दिखाया कि सांस्कृतिक और मनोरंजन क्षेत्र से जुड़े मुद्दे भी राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
आगे क्या हो सकता है
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फिल्म उद्योग को वास्तविक राहत देनी है तो केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर समाधान तलाशना होगा। राज्यों के पास कर दरों में बदलाव करने का अधिकार है और वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फैसला ले सकते हैं। साथ ही, उद्योग को भी नई तकनीक और दर्शकों की बदलती पसंद के अनुसार खुद को ढालना होगा।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या राज्य सरकारें टिकट कर में कोई बदलाव करती हैं या फिल्म उद्योग को अन्य प्रकार की सहायता दी जाती है। संसद में हुई यह बहस इस बात का संकेत है कि मनोरंजन क्षेत्र की आर्थिक स्थिति अब नीति चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है और आने वाले बजटों में भी यह मुद्दा उठता रह सकता है।