Mamata Banerjee Jyoti Basu Nagar Name Change Controversy: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक बार फिर विवादों में घिर गई हैं। इस बार मामला नए शहर के नामकरण को लेकर है। राज्य में नए विकसित हो रहे शहर का नाम “ज्योति बसु नगर” रखा गया था, लेकिन अब इसे बदल दिया गया है। यह कदम राजनीतिक गलियारों में गर्मागर्म बहस का विषय बन गया है। विरोधियों का आरोप है कि ममता बनर्जी जो ज्योति बसु की तारीफ करती दिखती हैं, वही उनके नाम को मिटाने में भी पीछे नहीं हैं।
ज्योति बसु का नाम हटाना क्यों?
ज्योति बसु पश्चिम बंगाल के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने राज्य को विकास के नए रास्ते दिखाए। सॉल्ट लेक का नाम बदलकर “बिधाननगर” करने का श्रेय भी ज्योति बसु को ही जाता है। उन्होंने बिधान चंद्र रॉय के सम्मान में यह नाम दिया था। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर ममता बनर्जी वाकई ज्योति बसु का सम्मान करती हैं, तो नए शहर से उनका नाम क्यों हटाया गया?
आलोचकों का कहना है कि यह महज दिखावा है। ममता बनर्जी सार्वजनिक मंचों पर ज्योति बसु की तारीफ करती हैं, लेकिन जब असल में उनके नाम को स्थायी बनाने का मौका आता है, तो पीछे हट जाती हैं। यह दोहरा रवैया उनकी राजनीतिक छवि पर सवाल खड़े करता है।
वोट बैंक की राजनीति का खेल?
पश्चिम बंगाल में चुनाव नजदीक आते ही नामकरण और प्रतीकों की राजनीति तेज हो जाती है। विश्लेषकों का मानना है कि ज्योति बसु नगर का नाम बदलना भी इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। ममता बनर्जी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को वामपंथी छवि से अलग दिखाना चाहती हैं। वामपंथी दलों का प्रभाव घटने के बाद भी बंगाल में उनका एक वोट बैंक है।
नाम बदलने से ममता यह संदेश देना चाहती हैं कि वह पूरी तरह से वाम विचारधारा से अलग हैं। हालांकि, दूसरी तरफ वह ज्योति बसु की तारीफ करके वाम समर्थकों को भी साधने की कोशिश करती रहती हैं। यह दोहरी चाल उन्हें “गुलबाज” और “ठगबाज” जैसी उपाधियां दिला रही है।
बिधाननगर का उदाहरण क्यों मायने रखता है?
ज्योति बसु ने सॉल्ट लेक का नाम “बिधाननगर” रखकर एक परंपरा स्थापित की थी। उन्होंने पुराने नेताओं के योगदान को सम्मान देने का एक तरीका दिखाया था। बिधान चंद्र रॉय पश्चिम बंगाल के एक महान मुख्यमंत्री थे, जिनके नाम पर शहर का नामकरण किया गया। यह राजनीति में उदारता और सम्मान की मिसाल बना।
लेकिन ममता बनर्जी का कदम इसके उलट दिखता है। जिस ज्योति बसु ने दूसरों को सम्मान दिया, उनके नाम को खुद ही हटा देना विरोधाभासी लगता है। यह सवाल उठाता है कि क्या राजनीति में सिर्फ सत्ता और वोट ही मायने रखते हैं, सम्मान और परंपरा नहीं?
विरोधियों के तीखे आरोप
विपक्षी दलों ने इस फैसले को लेकर ममता बनर्जी पर जमकर हमला बोला है। वामपंथी नेताओं का कहना है कि यह ज्योति बसु की विरासत के साथ खिलवाड़ है। भाजपा ने इसे तृणमूल की दोमुंही नीति बताया है।
सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर बहस छिड़ी हुई है। लोग ममता बनर्जी को “मिथ्याचारी” और “दिखावा करने वाली” नेता के रूप में देख रहे हैं। कई लोगों ने यह भी कहा कि अगर वह सचमुच ज्योति बसु का सम्मान करती हैं, तो उनके नाम पर बने शहर को वैसे ही रहने देना चाहिए था।
राजनीतिक छवि पर असर
Mamata Banerjee Jyoti Basu Nagar Name Change Controversy: ममता बनर्जी अक्सर खुद को गरीबों और आम लोगों की नेता बताती हैं। वह सादगी और ईमानदारी की छवि बनाए रखने की कोशिश करती हैं। लेकिन ऐसे फैसले उनकी इस छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। लोगों को लगता है कि यह सब सिर्फ वोट पाने के लिए किया जा रहा है।
पश्चिम बंगाल में राजनीति हमेशा से भावनाओं और प्रतीकों से जुड़ी रही है। नामकरण जैसे मुद्दे यहां बहुत संवेदनशील होते हैं। ज्योति बसु जैसे दिग्गज नेता का नाम हटाना कई लोगों को अपमानजनक लग सकता है।
आगे क्या होगा?
यह विवाद आने वाले चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। विपक्ष इसे ममता बनर्जी के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस को यह समझाना होगा कि यह फैसला क्यों लिया गया।
ममता बनर्जी को अब यह साबित करना होगा कि उनके इरादे साफ हैं और यह कोई राजनीतिक चाल नहीं है। लेकिन जिस तरह से यह मामला उछला है, उससे लगता है कि जनता का भरोसा जीतना आसान नहीं होगा। राजनीति में कहा जाता है कि विश्वास बनाने में सालों लग जाते हैं, लेकिन टूटने में पल भर की देर होती है। ममता बनर्जी के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी है।