आईडीबीआई बैंक के निजीकरण में बड़ा उलटफेर
IDBI Bank Privatization: देश के बैंकिंग सेक्टर में एक बड़ी खबर सामने आई है। प्राइवेट सेक्टर के जाने-माने कोटक महिंद्रा बैंक ने आईडीबीआई बैंक को खरीदने में अपनी दिलचस्पी नहीं दिखाई है। शनिवार को स्टॉक एक्सचेंज में दी गई जानकारी के मुताबिक, कोटक महिंद्रा बैंक ने आईडीबीआई बैंक के लिए कोई वित्तीय बोली जमा नहीं की है। यह खबर उस समय आई है जब मीडिया में लगातार यह चर्चा हो रही थी कि कोटक बैंक आईडीबीआई की खरीदारी के लिए आगे बढ़ रहा है।
पिछले कुछ हफ्तों से बाजार में यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि कोटक महिंद्रा बैंक आईडीबीआई बैंक के अधिग्रहण में गंभीर रुचि दिखा रहा है। लेकिन अब बैंक ने खुद इन खबरों को खारिज करते हुए साफ कर दिया है कि उसने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। इस फैसले से आईडीबीआई बैंक के निजीकरण की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं।
सरकार को मिली हैं वित्तीय बोलियां
निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग यानी दीपम के सचिव अरुणीश चावला ने शुक्रवार को जानकारी दी थी कि सरकार को आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश के लिए वित्तीय बोलियां मिल चुकी हैं। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि कितनी बोलियां आई हैं और किन कंपनियों ने बोलियां लगाई हैं। दीपम सचिव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए कहा कि आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश के लिए वित्तीय बोलियां प्राप्त हो गई हैं और अब इनका मूल्यांकन निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा।
यह जानकारी बैंकिंग सेक्टर और निवेशकों के लिए काफी अहम है। सरकार इस निजीकरण से अच्छी खासी रकम जुटाने की उम्मीद कर रही है। लेकिन कोटक महिंद्रा जैसे बड़े बैंक के पीछे हटने से यह साफ हो गया है कि सभी बड़े खिलाड़ी इस सौदे में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं।
तीन साल से अटकी है निजीकरण की प्रक्रिया
आईडीबीआई बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया पिछले तीन सालों से अधिक समय से लटकी हुई है। यह प्रक्रिया अक्टूबर 2022 में शुरू हुई थी जब केंद्र सरकार ने भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी के साथ मिलकर आईडीबीआई बैंक में अपनी कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी को बेचने का फैसला किया था। इसमें केंद्र सरकार की 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी और एलआईसी की 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी शामिल है।
सरकार ने इसके लिए अभिरुचि पत्र यानी ईओआई आमंत्रित किए थे। जनवरी 2023 में दीपम ने बताया था कि उसे आईडीबीआई बैंक के लिए कई अभिरुचि पत्र मिले हैं। इसके बाद प्रक्रिया धीमी गति से आगे बढ़ी है। लंबे समय से इस सौदे का इंतजार कर रहे निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों के लिए यह चिंता का विषय बन गया है।
मंजूरी की प्रक्रिया पूरी
आईडीबीआई बैंक के संभावित खरीदार को गृह मंत्रालय की तरफ से पहले ही सुरक्षा मंजूरी मिल चुकी है। इसके अलावा भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई ने भी अपनी मंजूरी दे दी है। यह दोनों मंजूरियां किसी भी बैंक के अधिग्रहण के लिए बेहद जरूरी होती हैं। सुरक्षा मंजूरी इसलिए अहम है क्योंकि बैंकिंग सेक्टर देश की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा होता है।
आरबीआई की मंजूरी भी जरूरी है क्योंकि केंद्रीय बैंक यह सुनिश्चित करता है कि खरीदार के पास पर्याप्त वित्तीय ताकत है और वह बैंकिंग नियमों का पालन कर सकता है। इन सभी मंजूरियों के बावजूद प्रक्रिया में देरी हो रही है, जो चिंता का विषय है।
आगे की प्रक्रिया क्या होगी
रणनीतिक विनिवेश प्रक्रिया के अगले चरण में लेनदेन सलाहकार और संपत्ति मूल्यांकनकर्ता की मदद से एक आरक्षित मूल्य तय किया जाएगा। यह आरक्षित मूल्य वह न्यूनतम कीमत होगी जिससे कम पर सरकार बैंक को नहीं बेचेगी। इसके बाद पहले से प्राप्त सीलबंद वित्तीय बोलियों को बोलीदाताओं की उपस्थिति में खोला जाएगा।
सफल बोलीदाता वही होगा जिसकी बोली सभी वैध बोलियों में सबसे अधिक होगी और साथ ही आरक्षित मूल्य से भी ज्यादा होगी। यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से की जाएगी ताकि किसी तरह का विवाद न हो। लेकिन अब सवाल यह है कि कोटक महिंद्रा के पीछे हटने के बाद किन खिलाड़ियों ने बोलियां लगाई हैं।
निजीकरण क्यों जरूरी है
आईडीबीआई बैंक का निजीकरण सरकार की विनिवेश योजना का एक अहम हिस्सा है। सरकार का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण करने से उनका प्रबंधन बेहतर होगा और वे ज्यादा मुनाफा कमा सकेंगे। साथ ही इससे सरकार को अच्छी खासी रकम भी मिलेगी जिसे दूसरे विकास कार्यों में लगाया जा सकता है।
आईडीबीआई बैंक पहले एक मजबूत बैंक था, लेकिन बाद में इसे कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। बैड लोन यानी खराब कर्ज की समस्या से यह बैंक जूझता रहा है। सरकार और एलआईसी ने मिलकर इस बैंक को संभाला है, लेकिन अब इसे निजी हाथों में देने का फैसला किया गया है ताकि यह और बेहतर तरीके से काम कर सके।
बाजार में क्या असर होगा
कोटक महिंद्रा बैंक के इस फैसले से बाजार में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला दिखाता है कि बड़े बैंक इस सौदे में जोखिम देख रहे हैं। दूसरी ओर, कुछ का कहना है कि हो सकता है कोटक को मूल्यांकन सही नहीं लगा हो या फिर उनकी अपनी रणनीति अलग हो।
आईडीबीआई बैंक के शेयरों पर भी इस खबर का असर देखा गया है। निवेशक अब यह देखने के लिए उत्सुक हैं कि आखिर कौन से बोलीदाता सामने आते हैं और सौदा किस कीमत पर होता है। अगर सौदा सफल हो जाता है तो यह भारतीय बैंकिंग सेक्टर के निजीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।
चुनौतियां और संभावनाएं
IDBI Bank Privatization: इस पूरी प्रक्रिया में कई चुनौतियां भी हैं। पहली चुनौती यह है कि बैंक का सही मूल्यांकन करना। आईडीबीआई बैंक के पास बड़ी शाखा नेटवर्क है और लाखों ग्राहक हैं, लेकिन साथ ही कुछ खराब संपत्तियां भी हैं। खरीदार को यह तय करना होगा कि क्या वह इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार है।
दूसरी चुनौती कर्मचारियों से जुड़ी है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के कर्मचारियों को निजीकरण से कई बार डर लगता है क्योंकि उन्हें अपनी नौकरी की सुरक्षा को लेकर चिंता होती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कर्मचारियों के हितों की रक्षा हो।
लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद निजीकरण से कई संभावनाएं भी हैं। एक मजबूत निजी खिलाड़ी के हाथों में आने पर आईडीबीआई बैंक अपनी सेवाओं को बेहतर कर सकता है, नई तकनीक अपना सकता है और ग्राहकों को बेहतर सुविधाएं दे सकता है। इससे पूरे बैंकिंग सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी जो अंततः ग्राहकों के लिए फायदेमंद होगा।
आगे क्या होगा
अब देखना यह है कि सरकार आगे क्या कदम उठाती है। वित्तीय बोलियों का मूल्यांकन किया जाएगा और फिर आरक्षित मूल्य तय किया जाएगा। इसके बाद ही पता चलेगा कि कौन से बोलीदाता हैं और उन्होंने कितनी बोली लगाई है। कोटक महिंद्रा के बाहर होने से यह रहस्य और गहरा गया है कि आखिर कौन हैं वे खिलाड़ी जो इस बैंक को खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
यह पूरी प्रक्रिया भारत की विनिवेश नीति के लिए एक परीक्षा भी है। अगर यह सौदा सफल होता है तो भविष्य में दूसरे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण का रास्ता आसान हो जाएगा। लेकिन अगर कोई समस्या आती है तो इससे पूरी नीति पर सवाल उठ सकते हैं। बैंकिंग सेक्टर और निवेशक अब अगले कदम का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।