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O Romeo Film Review: ‘ओ रोमियो’ में एक्शन और प्यार का जबरदस्त तड़का, शाहिद कपूर बने खतरनाक गैंगस्टर

O Romeo Film Review: ‘ओ रोमियो’ में एक्शन और प्यार का जबरदस्त तड़का
O Romeo Film Review: ‘ओ रोमियो’ में एक्शन और प्यार का जबरदस्त तड़का

विशाल भारद्वाज की ‘ओ रोमियो’ एक्शन, इश्क और 90 के दशक के संगीत का अनोखा मिश्रण है। शाहिद कपूर गैंगस्टर उस्तरा के रूप में प्रभावशाली हैं, जबकि नाना पाटेकर और तृप्ति डिमरी कहानी को गहराई देते हैं। फिल्म का पहला भाग रोमांच और भावनाओं से भरपूर है।

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O Romeo Film Review: बॉलीवुड में मसाले अक्सर वही रहते हैं—एक्शन, रोमांस, बदला और संगीत। फर्क बस इतना होता है कि इन्हें पकाने वाला कौन है। जब रसोई में विशाल भारद्वाज जैसे अनुभवी फिल्मकार उतरते हैं तो वही पुराने मसाले एक नया स्वाद देने लगते हैं। उनकी नई फिल्म ‘ओ रोमियो’ इसी उम्मीद के साथ परोसी गई है कि दर्शकों को कुछ अलग चखने को मिलेगा। इंटरवल तक की परोसी गई यह सिनेमाई थाली कम से कम स्वाद के मामले में निराश नहीं करती।

शाहिद कपूर का किरदार जबरदस्त

फिल्म की शुरुआत ही एक विस्फोटक अंदाज में होती है। शाहिद कपूर को उनके करियर का शायद सबसे दमदार परिचय दृश्य मिला है। वह ‘उस्तरा’ नाम के खूंखार गैंगस्टर की भूमिका में हैं, जो अपने नाम की तरह ही धारदार है। उसका हथियार सिर्फ शरीर को नहीं, बल्कि आत्मा तक को चीर देने की ताकत रखता है। विशाल भारद्वाज ने इस किरदार को केवल हिंसा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसकी आंतरिक बेचैनी और टूटन को भी परत-दर-परत उकेरा है।

उस्तरा का जीवन अपने नियमों से चलता है, लेकिन उसकी चाल पर नियंत्रण रखने वाला एक ही व्यक्ति है—खान साहब, जिनकी भूमिका नाना पाटेकर निभा रहे हैं। खान साहब खुफिया विभाग से जुड़े एक अधिकारी हैं, जो अपराध की दुनिया को उसी के हथियार से खत्म करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। उस्तरा उनके लिए एक मोहरा भी है और एक हथियार भी। यह रिश्ता दोस्ती, भरोसे और मजबूरी के बीच झूलता रहता है।

इश्क की दस्तक और बदले की आग

कहानी तब मोड़ लेती है जब अफशां की एंट्री होती है। तृप्ति डिमरी ने इस किरदार को मासूमियत और रहस्य के मिश्रण के साथ निभाया है। वह उस्तरा के पास एक सुपारी लेकर आती है। निशाने पर है जलाल, जो कभी उस्तरा का साथी हुआ करता था, और उसके तीन अन्य साथी। अफशां की आंखों में दर्द है और इरादों में आग। बदले की यह कहानी धीरे-धीरे खुलती है और दर्शकों को बांधे रखती है।

यहां विशाल भारद्वाज की खासियत दिखती है। वह बदले की कहानी को केवल हिंसा तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे भावनाओं और रिश्तों के साथ जोड़ देते हैं। अफशां और उस्तरा के बीच पनपता रिश्ता सिर्फ प्रेम कहानी नहीं, बल्कि दो टूटे हुए लोगों की साझा तलाश बन जाता है।

संगीत और 90 के दशक की महक

फिल्म का एक और मजबूत पक्ष उसका संगीत है। 90 के दशक की धुनों की छाया कहानी को एक अलग भावनात्मक रंग देती है। गानों का इस्तेमाल केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि कहानी को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है। जहां एक ओर खून-खराबे के दृश्य हैं, वहीं दूसरी ओर प्रेम और यादों की नरमी भी है। यह संतुलन फिल्म को एक अलग पहचान देता है।

विशाल भारद्वाज की फिल्मों में संगीत हमेशा एक किरदार की तरह मौजूद रहता है। यहां भी वही परंपरा कायम है। बैकग्राउंड स्कोर तनाव को गहराता है और रोमांटिक दृश्यों में संवेदनशीलता जोड़ता है।

अभिनय की धार

शाहिद कपूर ने उस्तरा के किरदार में खुद को पूरी तरह ढाल लिया है। उनकी आंखों में ठंडापन और भीतर की उथल-पुथल साफ दिखाई देती है। नाना पाटेकर अपने अनुभवी अंदाज में कहानी को मजबूती देते हैं। उनका संवाद अदायगी और स्क्रीन पर मौजूदगी अब भी उतनी ही प्रभावशाली है।

इंटरवल से ठीक पहले अविनाश तिवारी के रूप में जलाल की एंट्री होती है। उनकी उपस्थिति कहानी में एक नई ऊर्जा भर देती है। अक्सर कहा जाता है कि फिल्म की असली शुरुआत उसके खलनायक की एंट्री से होती है। जलाल का किरदार यही संकेत देता है कि दूसरे भाग में टकराव और भी तीखा होने वाला है।

पहले भाग का संतुलन

फिल्म का पहला हिस्सा संतुलित गति से आगे बढ़ता है। जहां तेज रफ्तार की जरूरत है, वहां कहानी दौड़ती है, और जहां ठहराव जरूरी है, वहां सांस लेने का मौका देती है। यह संतुलन ही इसे एक साधारण एक्शन ड्रामा से ऊपर उठाता है।

‘ओ रोमियो’ सिर्फ खून-खराबे की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की कहानी है जो अपने अतीत से भाग नहीं सकते। यह प्रेम और प्रतिशोध के बीच फंसे इंसान की दास्तान है। विशाल भारद्वाज ने एक बार फिर साबित किया है कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि अनुभव भी हो सकता है।

अब नजरें फिल्म के दूसरे हिस्से पर टिकी हैं। क्या उस्तरा अपनी धार खुद पर आजमाएगा या बदले की आग सब कुछ जला देगी? इसका जवाब पर्दे पर ही मिलेगा, लेकिन इंटरवल तक की यह यात्रा निश्चित रूप से रोचक और स्वाद से भरपूर है।

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Dipali Kumari

दीपाली कुमारी पिछले तीन वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में कार्यरत हैं। उन्होंने रांची के गोस्सनर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। सामाजिक सरोकारों, जन-जागरूकता और जमीनी मुद्दों पर लिखने में उनकी विशेष रुचि है। आम लोगों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाना और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को धारदार लेखन के माध्यम से सामने लाना उनका प्रमुख लक्ष्य है।