Ajit Pawar Political Career: महाराष्ट्र के बारामती के पास हुए एक विमान हादसे में उपमुख्यमंत्री और एनसीपी के वरिष्ठ नेता अजित पवार का निधन हो गया। इस दुखद घटना के साथ ही महाराष्ट्र की राजनीति का एक ऐसा अध्याय समाप्त हो गया, जिसने बीते चार दशकों तक सत्ता, संगठन और रणनीति—तीनों को गहराई से प्रभावित किया।
अजित पवार का जाना सिर्फ एक नेता का जाना नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक शैली का अंत है, जो फैसले लेने में संकोच नहीं करती थी और सत्ता के समीकरणों को बदलने की क्षमता रखती थी।
चाचा शरद पवार की उंगली पकड़कर सियासत में पहला कदम
अजित पवार ने साल 1982 में राजनीति में कदम रखा। उनके चाचा शरद पवार उस समय तक महाराष्ट्र की राजनीति में एक मजबूत चेहरा बन चुके थे। अजित पवार ने राजनीति की बारीकियां सहकार आंदोलन से सीखीं। उन्होंने सबसे पहले एक सहकारी चीनी मिल के बोर्ड का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
इसके बाद वे पुणे जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। करीब 16 वर्षों तक इस पद पर रहकर उन्होंने प्रशासन, वित्त और संगठन को नजदीक से समझा। यहीं से उन्हें एक सख्त लेकिन प्रभावी प्रशासक के रूप में पहचान मिली।
पहली बार सांसद बने
साल 1991 में अजित पवार पहली बार बारामती लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। हालांकि बाद में उन्होंने यह सीट अपने चाचा शरद पवार के लिए खाली कर दी। इसी फैसले के बाद उन्होंने पूरी तरह महाराष्ट्र की राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया।
बरामती विधानसभा से अटूट रिश्ता
1995 में वे पहली बार बारामती विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। इसके बाद यह सीट उनकी राजनीतिक पहचान बन गई। वे लगातार कई चुनावों में यहां से जीतते रहे और बरामती को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला की तरह विकसित किया।
शरद पवार के सियासी वारिस के रूप में उभार
अजित पवार को लंबे समय तक शरद पवार का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता रहा। संगठन चलाने की उनकी क्षमता और सत्ता के भीतर उनकी पकड़ ने उन्हें पार्टी का सबसे मजबूत स्तंभ बना दिया।
उनकी राजनीति की सबसे बड़ी पहचान रही—तेज फैसले और बेबाक बयान। वे विरोध झेलने से नहीं डरते थे और यही बात उन्हें समर्थकों और आलोचकों—दोनों के बीच चर्चा में रखती थी।
मंत्री से उपमुख्यमंत्री तक का सफर
अजित पवार ने कृषि, सिंचाई, ऊर्जा और ग्रामीण विकास जैसे अहम विभागों की जिम्मेदारी संभाली। खासतौर पर सिंचाई विभाग में उनके फैसलों ने उन्हें एक ताकतवर नेता के रूप में स्थापित किया।
छह बार उपमुख्यमंत्री बने
वे महाराष्ट्र के इतिहास में उन गिने-चुने नेताओं में शामिल रहे, जो छह बार उपमुख्यमंत्री बने। अलग-अलग मुख्यमंत्रियों के साथ काम करते हुए उन्होंने हर सरकार में खुद को जरूरी बनाए रखा।
2019 के बाद बदली राजनीति की दिशा
2019 में अजित पवार की राजनीति ने नया मोड़ लिया। वे पहले देवेंद्र फडणवीस के साथ उपमुख्यमंत्री बने और फिर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार में भी वही पद संभाला। इस दौर ने उन्हें सत्ता की राजनीति का सबसे चतुर खिलाड़ी साबित किया।
2022 में अलग सियासी राह
जब शरद पवार ने पार्टी में अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने के संकेत दिए, तो अजित पवार ने अपनी अलग राह चुनी। उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई और एनसीपी के भीतर बड़ा विभाजन किया।
फिल्मी पृष्ठभूमि से सियासत तक
22 जुलाई 1959 को अहमदनगर जिले के देवलाली प्रवरा में जन्मे अजित पवार के पिता अनंतराव पवार फिल्म जगत से जुड़े थे। पिता के निधन के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और पूरी तरह राजनीति में सक्रिय हो गए।
उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार और बेटे पार्थ पवार व जय पवार हैं। पार्थ पवार के जरिए राजनीति की अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने की कोशिश भी उनके जीवन का अहम हिस्सा रही।
महाराष्ट्र की राजनीति में खालीपन
अजित पवार का राजनीतिक जीवन साहस, विवाद और प्रभाव—तीनों का मिश्रण था। उनके जाने से महाराष्ट्र की राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा हुआ है, जिसे भरने में वक्त लगेगा।