देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को एक अहम मामले की सुनवाई टल गई। मेटा प्लेटफॉर्म्स और व्हाट्सएप ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग यानी कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया के उस आदेश के खिलाफ याचिका दायर की थी, जिसमें उन पर प्राइवेसी पॉलिसी के मामले में 213.14 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना लगाया गया था। इस मामले की सुनवाई अब 23 फरवरी को होगी।
यह मामला सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं है, बल्कि यह डिजिटल दुनिया में लोगों की निजता और बड़ी तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी से जुड़ा एक गंभीर सवाल है। करोड़ों भारतीय व्हाट्सएप का इस्तेमाल करते हैं और उनकी निजी जानकारी की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची तथा न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ के सामने यह मामला पेश हुआ। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए सुनवाई को आगे बढ़ा दिया जाए। यह जानकारी मिलने के बाद पीठ ने मामले को स्थगित करते हुए 23 फरवरी को दोबारा सुनवाई की तारीख तय कर दी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 23 फरवरी को वह इस मामले में अंतरिम आदेश पारित करने पर विचार करेगी। यह अंतरिम आदेश मेटा और व्हाट्सएप के लिए राहत हो सकता है या फिर मौजूदा स्थिति को बनाए रख सकता है। अब सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
कंपटीशन कमीशन का आदेश क्या था?
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने मेटा प्लेटफॉर्म्स और व्हाट्सएप पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। यह जुर्माना व्हाट्सएप की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर लगाया गया था। आयोग ने पाया कि व्हाट्सएप ने अपनी प्राइवेसी पॉलिसी में बदलाव करते हुए यूजर्स को डेटा शेयरिंग के लिए मजबूर किया।
कंपटीशन कमीशन का कहना था कि व्हाट्सएप ने अपनी बाजार में मजबूत स्थिति का गलत इस्तेमाल किया और यूजर्स को उनकी निजी जानकारी शेयर करने के लिए बाध्य किया। यह प्रतिस्पर्धा कानून के खिलाफ था। इसी आधार पर कंपनी पर यह भारी जुर्माना लगाया गया।
प्राइवेसी पॉलिसी विवाद क्या है?
साल 2021 में व्हाट्सएप ने अपनी प्राइवेसी पॉलिसी में बदलाव की घोषणा की थी। इस नई पॉलिसी के मुताबिक, यूजर्स का डेटा व्हाट्सएप से मेटा की दूसरी कंपनियों जैसे फेसबुक और इंस्टाग्राम के साथ शेयर किया जा सकता था। इस बदलाव से देश भर में बवाल मच गया था। लाखों लोगों ने इसका विरोध किया और कई लोगों ने व्हाट्सएप छोड़कर दूसरे मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
विरोध के बाद व्हाट्सएप ने इस पॉलिसी को लागू करने की तारीख कई बार बढ़ाई। लेकिन सवाल बने रहे कि क्या कोई कंपनी अपने यूजर्स को ऐसे बदलाव के लिए मजबूर कर सकती है? क्या इससे लोगों की निजता पर असर नहीं पड़ता?
भारत में डेटा प्राइवेसी की चिंता
भारत में करोड़ों लोग सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल करते हैं। डिजिटल इंडिया के दौर में लोगों की निजी जानकारी की सुरक्षा एक बड़ा सवाल बन गई है। सरकार भी इस मामले में सख्त हो रही है और डेटा प्राइवेसी के लिए नए कानून बना रही है।
व्हाट्सएप जैसे ऐप्स पर लोग अपने निजी मैसेज, फोटो, वीडियो और दूसरी जानकारी शेयर करते हैं। अगर यह डेटा गलत हाथों में पहुंच जाए तो इसका दुरुपयोग हो सकता है। इसलिए यह मामला सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ा हुआ है।
मेटा और व्हाट्सएप का पक्ष
मेटा और व्हाट्सएप का कहना है कि उन्होंने किसी भी तरह का गलत काम नहीं किया है। उनका तर्क है कि प्राइवेसी पॉलिसी में बदलाव यूजर्स को बेहतर सुविधा देने के लिए किया गया था। कंपनी का कहना है कि यूजर्स की निजी बातचीत एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड रहती है और उसे कोई नहीं पढ़ सकता।
कंपनी ने कंपटीशन कमीशन के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उनका मानना है कि जुर्माना अनुचित और अत्यधिक है। अब अदालत को यह तय करना होगा कि कंपनी ने वास्तव में कोई गलती की है या नहीं।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मामला कई कारणों से महत्वपूर्ण है। पहला, यह तय करेगा कि बड़ी तकनीकी कंपनियां भारत में अपनी मनमर्जी से पॉलिसी बदल सकती हैं या नहीं। दूसरा, यह लोगों की निजता के अधिकार को मजबूत करेगा। तीसरा, यह प्रतिस्पर्धा कानून की व्याख्या को स्पष्ट करेगा।
अगर सुप्रीम कोर्ट कंपटीशन कमीशन के आदेश को बरकरार रखता है तो यह दूसरी तकनीकी कंपनियों के लिए एक संदेश होगा कि वे भारत के कानूनों का सम्मान करें। और अगर अदालत कंपनी के पक्ष में फैसला देती है तो इससे डेटा प्राइवेसी के मामले में कानूनी स्थिति पर सवाल उठेंगे।
आगे क्या होगा?
अब सभी की नजरें 23 फरवरी पर टिकी हैं जब सुप्रीम कोर्ट फिर से इस मामले की सुनवाई करेगा। उम्मीद है कि अदालत उस दिन कोई अंतरिम आदेश पारित कर सकती है। अंतरिम आदेश से यह तय हो सकता है कि जुर्माने की वसूली रोकी जाए या नहीं।
इस मामले का अंतिम फैसला भारत में डिजिटल अधिकारों और प्राइवेसी के भविष्य को आकार देगा। यह न सिर्फ मेटा और व्हाट्सएप के लिए बल्कि सभी सोशल मीडिया और तकनीकी कंपनियों के लिए एक मिसाल बनेगा। करोड़ों भारतीयों की निजता और उनके डिजिटल अधिकारों की सुरक्षा इस फैसले पर निर्भर करेगी।
तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी
बड़ी तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी सिर्फ मुनाफा कमाना नहीं है। उन्हें यूजर्स की निजता का सम्मान करना चाहिए और कानूनों का पालन करना चाहिए। भारत जैसे बड़े बाजार में ये कंपनियां अरबों डॉलर का व्यापार करती हैं। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है कि वे भारत के कानून और यूजर्स के अधिकारों का ध्यान रखें। सुप्रीम कोर्ट का यह मामला इसी जिम्मेदारी को परिभाषित करेगा।