Seva Teerth PMO: नई दिल्ली में शुक्रवार को देश के प्रशासनिक ढांचे में एक अहम बदलाव देखने को मिला। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने ‘सेवा तीर्थ’ भवन परिसर का उद्घाटन किया। इसी के साथ प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय और कैबिनेट सचिवालय अब इसी नए परिसर से संचालित होंगे।
दोपहर करीब डेढ़ बजे प्रधानमंत्री ने ‘सेवा तीर्थ’ नाम का अनावरण किया। सरकार का कहना है कि यह नाम केवल एक इमारत का नहीं, बल्कि शासन की भावना का प्रतीक है। सेवा और कर्तव्य को केंद्र में रखकर प्रशासन चलाने का संदेश इस नाम के जरिए देने की कोशिश की गई है।
नए परिसर में शिफ्ट हुआ प्रधानमंत्री कार्यालय
‘सेवा तीर्थ’ परिसर में अब प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय और कैबिनेट सचिवालय भी काम करेंगे। इससे प्रशासनिक समन्वय को और मजबूत बनाने का दावा किया जा रहा है। एक ही परिसर में प्रमुख निर्णय लेने वाले विभागों का होना कार्यप्रणाली को तेज और प्रभावी बना सकता है।
औपनिवेशिक प्रतीकों से दूरी बनाने की कोशिश
2014 के बाद से केंद्र सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिनमें पुराने नामों और प्रतीकों को बदला गया है। साउथ ब्लॉक का नाम बदलकर ‘सेवा तीर्थ’ किया गया। सेंट्रल सचिवालय को ‘कर्तव्य भवन’ नाम दिया गया। राजपथ अब ‘कर्तव्य पथ’ के नाम से जाना जाता है। रेस कोर्स रोड को ‘लोक कल्याण मार्ग’ और राज भवन या राज निवास को ‘लोक भवन’ या ‘लोक निवास’ कहा जाने लगा है।
सरकार का तर्क है कि ये बदलाव केवल औपचारिक नहीं हैं, बल्कि यह जनता के साथ जुड़ाव और भारतीय पहचान को मजबूत करने की दिशा में कदम हैं। इन नामों में सेवा, कर्तव्य और लोक जैसे शब्दों का प्रयोग एक खास संदेश देता है।
प्रशासन और जनभावना के बीच संबंध
सरकार का कहना है कि ‘सेवा तीर्थ’ नाम इस बात को दर्शाता है कि शासन केवल शक्ति का केंद्र नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम है। इस तरह के प्रतीकात्मक बदलाव जनता को यह एहसास दिलाने की कोशिश करते हैं कि प्रशासन उनके लिए है।
हालांकि कुछ लोग इसे प्रतीकात्मक राजनीति भी मानते हैं। उनका कहना है कि नाम बदलने से ज्यादा जरूरी है कि व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़े। मेरे विचार से दोनों बातें साथ-साथ चलनी चाहिए। प्रतीक भी महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन असली परीक्षा कामकाज में सुधार से होती है।
नई इमारत, नई कार्यसंस्कृति की उम्मीद
‘सेवा तीर्थ’ परिसर को आधुनिक सुविधाओं से लैस बताया जा रहा है। डिजिटल ढांचे, बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और समन्वित कार्यालय प्रणाली के जरिए फैसलों की गति बढ़ाने का प्रयास किया गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय का यहां शिफ्ट होना रणनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है।
जब निर्णय लेने वाले शीर्ष अधिकारी एक ही परिसर में हों, तो समन्वय बेहतर हो सकता है। हालांकि प्रशासनिक सुधार केवल भवन से नहीं, बल्कि कार्यसंस्कृति से आते हैं। इस दिशा में आगे क्या बदलाव होते हैं, इस पर नजर रहेगी।
सत्ता के प्रतीकों में बदलाव का व्यापक संदर्भ
बीते कुछ वर्षों में देश के कई महत्वपूर्ण स्थलों के नाम बदले गए हैं। यह एक व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसमें औपनिवेशिक विरासत से अलग भारतीय पहचान को प्रमुखता देने की बात कही गई है। समर्थक इसे आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कदम मानते हैं, जबकि आलोचक इसे प्रतीकात्मक बदलाव तक सीमित बताते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे नए भारत की दिशा में एक और कदम बताया है। आने वाले समय में यही तय करेगा कि यह कदम केवल प्रतीकात्मक था या प्रशासनिक ढांचे में वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत। फिलहाल इतना जरूर है कि देश का सत्ता केंद्र अब नए नाम और नए परिसर के साथ एक नई पहचान में काम करेगा।