Supreme Court Missing Children Case: देश में बच्चों के लापता होने के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। हर रोज अखबारों और न्यूज चैनलों पर ऐसी खबरें देखने को मिलती हैं जहां माता-पिता अपने बच्चों को ढूंढते हुए परेशान नजर आते हैं। इस गंभीर मुद्दे को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने केंद्र सरकार को साफ निर्देश दिए हैं कि वह पता लगाए कि क्या इन घटनाओं के पीछे कोई बड़ा राष्ट्रव्यापी नेटवर्क काम कर रहा है या फिर यह अलग-अलग घटनाएं हैं।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से कई सवाल पूछे। अदालत ने कहा कि यह जानना बेहद जरूरी है कि क्या इन सभी घटनाओं में कोई एक जैसा पैटर्न है। क्या ये सभी मामले आपस में जुड़े हुए हैं या फिर अलग-अलग हैं। बेंच ने साफ कहा कि केंद्र सरकार को इस बात की पूरी जांच करनी होगी कि क्या पूरे देश में कोई संगठित गिरोह इस तरह की वारदातों को अंजाम दे रहा है या फिर सिर्फ राज्य स्तर पर ऐसा हो रहा है।
अदालत ने यह भी कहा कि सभी राज्यों से पूरा डेटा जुटाया जाना चाहिए। इससे एक साफ तस्वीर सामने आएगी कि देश में बच्चों की किडनैपिंग का असली स्वरूप क्या है। अदालत का मानना है कि जब तक सही डेटा नहीं मिलेगा, तब तक इस समस्या का सही समाधान नहीं निकाला जा सकता।
राज्यों से डेटा मांगा गया
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कुछ राज्यों ने बच्चों के लापता होने का डेटा दे दिया है। इसके साथ ही चल रहे मुकदमों की स्थिति की भी जानकारी मिली है। लेकिन अभी भी करीब एक दर्जन ऐसे राज्य हैं जिन्होंने अपना डेटा नहीं भेजा है। ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि जब सभी राज्यों से पूरा डेटा मिल जाएगा तभी उसका सही विश्लेषण किया जा सकेगा।
इस पर बेंच ने नाराजगी जताते हुए कहा कि हम यह जानना चाहते हैं कि क्या इसके पीछे कोई राष्ट्रव्यापी नेटवर्क है या सिर्फ राज्य स्तर पर ही ऐसा हो रहा है। क्या इन घटनाओं में कोई पैटर्न है या फिर ये सभी घटनाएं अलग-अलग हैं और इनमें कोई आपसी ताल्लुक नहीं है।
बचाए गए बच्चों के इंटरव्यू लेने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण सुझाव दिया। बेंच ने कहा कि जिन बच्चों को किडनैपिंग से बचाया गया है, उनके इंटरव्यू लिए जाने चाहिए। इन बच्चों से बात करके यह पता लगाया जा सकता है कि आखिर उनके साथ क्या हुआ था। किसने उन्हें उठाया था और कहां ले जाया गया था। इन सवालों के जवाब से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसी घटनाओं को कौन लोग अंजाम दे रहे हैं और उनका मकसद क्या है।
अदालत ने यह भी कहा कि इन इंटरव्यू से पता चल सकेगा कि क्या सभी मामलों में एक ही तरीका अपनाया जाता है या अलग-अलग तरीके हैं। अगर एक जैसा पैटर्न मिलता है तो यह साफ हो जाएगा कि किसी संगठित गिरोह का हाथ है।
राज्यों के रवैये पर नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों के रवैये पर भी सख्त आपत्ति जताई जिन्होंने अभी तक डेटा नहीं दिया है। बेंच ने कहा कि यह बहुत गंभीर मामला है और इसमें किसी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर राज्यों ने समय पर डेटा नहीं दिया तो अदालत को सख्त आदेश जारी करने पड़ेंगे।
इस पर केंद्र सरकार की ओर से आश्वासन दिया गया कि सभी राज्यों से डेटा मांगा जा चुका है और जल्द ही पूरी जानकारी उपलब्ध करा दी जाएगी। सरकार ने कहा कि वह इस मामले को बहुत गंभीरता से ले रही है।
एनजीओ की याचिका पर सुनवाई
दरअसल यह मामला एक गैर सरकारी संगठन की ओर से दायर की गई याचिका पर आधारित है। इस संगठन ने अदालत का ध्यान बच्चों के लापता होने की बढ़ती घटनाओं की ओर खींचा था। संगठन ने अपनी याचिका में कहा था कि यह मामला बेहद गंभीर है और इस पर तुरंत कार्रवाई की जरूरत है। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह आदेश दिए हैं।
हर 8 मिनट में एक बच्चा लापता
सुप्रीम कोर्ट ने 9 दिसंबर को ही केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि वह पिछले 6 सालों का पूरा डेटा जुटाए। अदालत चाहती थी कि यह पता चले कि कितने बच्चे कहां से और कब किडनैप हुए। गृह मंत्रालय को आदेश दिया गया था कि देश भर का डेटा इकट्ठा किया जाए। इसके अलावा यह भी कहा गया था कि पूरा डेटा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाए ताकि लोगों को पता चल सके कि स्थिति कितनी गंभीर है।
दरअसल पिछले साल 18 नवंबर को एक रिपोर्ट सामने आई थी। इस रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े थे। रिपोर्ट में कहा गया था कि देश में हर 8 मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है। यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। इस रिपोर्ट ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इसी रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लिया और केंद्र सरकार से पूरा डेटा मांगा।
सही तंत्र बनाने की जरूरत
Supreme Court Missing Children Case: अदालत ने यह भी कहा था कि इस मामले की जटिलता को देखते हुए सरकार को एक सही तंत्र तैयार करना चाहिए। जब तक सही मेकेनिज्म नहीं होगा, तब तक ऐसे मामलों से ठीक से निपटा नहीं जा सकता। अदालत का मानना है कि सिर्फ डेटा जुटाना काफी नहीं है, बल्कि उस डेटा का विश्लेषण करके एक मजबूत योजना बनानी होगी। इस योजना में यह होना चाहिए कि बच्चों को कैसे सुरक्षित रखा जाए, लापता होने के मामलों में तुरंत कैसे कार्रवाई हो और किडनैपिंग के गिरोहों को कैसे पकड़ा जाए।
सरकार की जिम्मेदारी
यह मामला सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। बच्चों की सुरक्षा किसी भी देश की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर बच्चे सुरक्षित नहीं हैं तो यह पूरे समाज के लिए शर्म की बात है। सरकार को इस मामले में तेजी से काम करना होगा। सभी राज्यों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और तुरंत पूरा डेटा देना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से उम्मीद की जा रही है कि अब इस मामले में गंभीर कार्रवाई होगी। जल्द ही यह पता चल जाएगा कि क्या वाकई में कोई बड़ा गिरोह इस काम में लगा है या नहीं। और अगर ऐसा है तो उन पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी। बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा यह मामला अब पूरे देश की निगाहों में है।