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राष्ट्रीय गीत को लेकर बड़ा फैसला: ध्वजारोहण से पद्म समारोह तक, ‘वंदे मातरम’ होगा अनिवार्य

राष्ट्रीय गीत को लेकर बड़ा फैसला: ध्वजारोहण से पद्म समारोह तक, 'वंदे मातरम' होगा अनिवार्य
राष्ट्रीय गीत को लेकर बड़ा फैसला: ध्वजारोहण से पद्म समारोह तक, 'वंदे मातरम' होगा अनिवार्य (Pic Credit- X @JaggiKumar11)

सरकार ने वंदे मातरम को लेकर नए नियम जारी किए हैं, जिनमें राष्ट्रगान के साथ इसके गायन और खड़ा होना अनिवार्य किया गया है। कई आधिकारिक कार्यक्रमों में इसे शामिल किया गया है। वंदे मातरम का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा है और इसे 1950 में राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला था।

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Vande Mataram New Rules: केंद्र सरकार ने वंदे मातरम को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनके तहत अब राष्ट्रगान के तुरंत बाद छह छंदों वाला वंदे मातरम गाया जाएगा और इस दौरान सभी का खड़ा होना अनिवार्य होगा। कुल अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड तय की गई है। यदि किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत दोनों गाए जाने हैं, तो पहले वंदे मातरम और उसके बाद राष्ट्रगान प्रस्तुत किया जाएगा।

आधिकारिक कार्यक्रमों में अनिवार्यता

जारी नियमों के अनुसार, वंदे मातरम को कई सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में गाना अनिवार्य किया गया है। ध्वजारोहण समारोह, राष्ट्रपति और राज्यपाल के आगमन व प्रस्थान के अवसर, पद्म पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित आयोजनों में इसे शामिल किया गया है। सरकार ने कार्यक्रमों की एक सूची भी जारी की है, जिनमें इस गीत का गायन आवश्यक होगा।

सरकार का तर्क है कि इससे राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ किया जा सकेगा और नई पीढ़ी को राष्ट्रगीत के महत्व से परिचित कराया जा सकेगा। हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि अनिवार्यता के बजाय स्वैच्छिक सहभागिता अधिक प्रभावी होती है।

वंदे मातरम का ऐतिहासिक महत्व

वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने स्वतंत्र रूप से की थी, जिसे बाद में उनके उपन्यास आनंदमठ (1882) में शामिल किया गया। 1896 में कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया था। 7 अगस्त 1905 को इसे पहली बार राजनीतिक नारे के रूप में प्रयोग किया गया, जब बंगाल विभाजन का विरोध हो रहा था।

1950 में संविधान सभा ने इसे भारत का राष्ट्रीय गीत स्वीकार किया। इस प्रकार वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों से जुड़ा प्रतीक है।

अंग्रेजी हुकूमत की रोक और संघर्ष

ब्रिटिश शासन के दौरान वंदे मातरम के प्रभाव से अंग्रेज सरकार असहज थी। पीआईबी के अनुसार, पूर्वी बंगाल की सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों में इसे गाने या बोलने पर प्रतिबंध लगाने वाले आदेश जारी किए थे। छात्रों को सरकारी नौकरी से वंचित करने और संस्थानों की मान्यता रद्द करने की धमकियां दी गईं।

1905 में रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों पर पांच-पांच रुपये का जुर्माना लगाया गया क्योंकि उन्होंने वंदे मातरम गाया था। 1908 में बेलगाम में लोकमान्य तिलक की गिरफ्तारी के दौरान भी इस गीत को लेकर पुलिस कार्रवाई हुई थी। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि यह गीत स्वतंत्रता की आवाज बन चुका था।

आज के संदर्भ में बहस और जिम्मेदारी

आज जब सरकार ने इसे लेकर स्पष्ट नियम बनाए हैं, तो समाज के विभिन्न वर्गों में चर्चा होना स्वाभाविक है। कुछ लोग इसे राष्ट्रीय गौरव से जोड़कर देख रहे हैं, तो कुछ इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नजरिए से परख रहे हैं।

किसी भी राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान का सम्मान नागरिक कर्तव्य है। लेकिन सम्मान का भाव भीतर से आना चाहिए। यदि नियम इस भावना को मजबूत करते हैं, तो यह स्वागत योग्य कदम हो सकता है। साथ ही यह भी जरूरी है कि इस विषय पर संवाद और संवेदनशीलता बनी रहे।

राष्ट्रभावना और नागरिक चेतना

वंदे मातरम ने स्वतंत्रता संग्राम में जो भूमिका निभाई, वह इतिहास में दर्ज है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इसे केवल औपचारिकता तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसके अर्थ और संदेश को भी समझा जाए। यह गीत मातृभूमि के प्रति समर्पण और सम्मान की भावना को व्यक्त करता है।

सरकार के नए नियमों से एक बार फिर यह विषय राष्ट्रीय चर्चा में है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन दिशा-निर्देशों का सामाजिक और शैक्षणिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हमें नियमों का पालन करते हुए संवाद की परंपरा को भी जीवित रखना चाहिए।

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Dipali Kumari

दीपाली कुमारी पिछले तीन वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में कार्यरत हैं। उन्होंने रांची के गोस्सनर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। सामाजिक सरोकारों, जन-जागरूकता और जमीनी मुद्दों पर लिखने में उनकी विशेष रुचि है। आम लोगों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाना और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को धारदार लेखन के माध्यम से सामने लाना उनका प्रमुख लक्ष्य है।