Makar Sankranti 2026: भारत में पर्व केवल तिथियों का मेल नहीं होते, बल्कि वे आस्था, परंपरा और जीवन-दृष्टि का संगम होते हैं। इस वर्ष 14 जनवरी को ऐसा ही एक दुर्लभ संयोग बन रहा है, जब मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी एक ही दिन पड़ रही हैं। यह संयोग बीते 126 वर्षों में केवल दूसरी बार बना है। इससे पहले वर्ष 2003 में ऐसा योग देखने को मिला था। ऐसे में आम श्रद्धालुओं से लेकर बड़े दानदाताओं तक के मन में एक स्वाभाविक प्रश्न उठ रहा है—क्या इस दिन खिचड़ी का दान किया जाए या एकादशी के नियमों के कारण इससे बचा जाए?
एकादशी पर चावल निषेध का पौराणिक आधार
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि मेधा ने एकादशी के दिन देह त्याग किया था और उनका अंश पृथ्वी में समा गया। माना जाता है कि वही अंश आगे चलकर चावल और जौ के रूप में उत्पन्न हुआ। इसी कारण एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया। यह निषेध केवल भोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि संयम और आत्मशुद्धि का प्रतीक भी है। एकादशी को उपवास, साधना और आत्मसंयम का दिन माना जाता है।
मकर संक्रांति: दान और सामाजिक समरसता का पर्व
वहीं मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व है, जो भारतीय संस्कृति में दान-पुण्य का विशेष अवसर माना गया है। खिचड़ी दान, तिल-गुड़, वस्त्र और अन्न दान की परंपरा इसी दिन से जुड़ी है। उत्तर भारत में विशेष रूप से खिचड़ी दान को पुण्यदायी माना जाता है, क्योंकि यह अन्न, दाल और ऊर्जा—तीनों का प्रतीक है।
तो क्या खिचड़ी दान करना उचित है?
यहीं पर दोनों पर्वों का संगम लोगों को असमंजस में डाल देता है। एक ओर मकर संक्रांति पर खिचड़ी दान का महत्व, दूसरी ओर एकादशी पर चावल निषेध। शास्त्रों के अनुसार इसमें कोई विरोध नहीं है, यदि दान की विधि को सही तरीके से अपनाया जाए।
एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित है, लेकिन दान पर रोक नहीं है। अंतर केवल इतना है कि खिचड़ी को इस दिन पकाकर बांटना या खिलाना उचित नहीं माना गया है। दान की भावना अक्षुण्ण रखते हुए श्रद्धालु खिचड़ी दान का संकल्प ले सकते हैं, लेकिन उसका वितरण द्वादशी तिथि को करना शास्त्रसम्मत माना गया है।
दान का फल क्यों माना जाता है अक्षयकारी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब दो पुण्य पर्व एक साथ आते हैं, तो उस दिन किया गया दान कई गुना फल देता है। मकर संक्रांति और एकादशी दोनों ही दान और त्याग से जुड़े पर्व हैं। ऐसे में इस दिन लिया गया दान-संकल्प अक्षय फल देने वाला माना गया है। यह केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी है—जरूरतमंदों की सहायता किसी भी परिस्थिति में नहीं रुकनी चाहिए।
श्रद्धालुओं के लिए व्यावहारिक समाधान
इस दुर्लभ संयोग में सबसे संतुलित मार्ग यही है कि श्रद्धालु मकर संक्रांति के दिन दान का संकल्प लें। खिचड़ी या अन्न दान का निर्धारण करें, लेकिन उसका वास्तविक वितरण द्वादशी को करें। इससे एकादशी के नियमों का भी पालन होगा और मकर संक्रांति की दान परंपरा भी अक्षुण्ण रहेगी।