Bullet Train Bihar: बिहार के लिए यह सिर्फ एक नई ट्रेन परियोजना नहीं, बल्कि विकास की दिशा में बड़ा मोड़ माना जा रहा है। वाराणसी से सिलीगुड़ी के बीच प्रस्तावित बुलेट ट्रेन परियोजना ने राज्य की तस्वीर बदलने की उम्मीद जगा दी है। खासकर पटना जिले में बनने वाला लगभग 65 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड कॉरिडोर इस पूरे प्रोजेक्ट का सबसे अहम हिस्सा माना जा रहा है।
लंबे समय से बिहार को तेज और आधुनिक रेल कनेक्टिविटी की जरूरत महसूस की जा रही थी। अब बुलेट ट्रेन की योजना से यह सपना साकार होता नजर आ रहा है। यह परियोजना न केवल यात्रा के समय को कम करेगी, बल्कि राज्य के आर्थिक, औद्योगिक और पर्यटन विकास को भी नई रफ्तार देगी।
बिहार में बुलेट ट्रेन परियोजना से बदलने वाली तस्वीर
पटना जिले में एलिवेटेड कॉरिडोर पर जोर
अधिकारियों के मुताबिक, वाराणसी-सिलीगुड़ी बुलेट ट्रेन परियोजना के तहत पटना जिले में करीब 65 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड ट्रैक बनाया जाएगा। इसके लिए 60 से अधिक गांवों को चिह्नित किया गया है, जहां जरूरत के अनुसार जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
एलिवेटेड कॉरिडोर को प्राथमिकता इसलिए दी जा रही है ताकि घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में जमीन अधिग्रहण कम से कम हो और ट्रैफिक पर ज्यादा दबाव न पड़े। यह सोच बताती है कि योजना बनाते समय शहरी ढांचे और आम लोगों की परेशानी को ध्यान में रखा गया है।
फुलवारीशरीफ के पास बनेगा प्रमुख स्टेशन
पटना में बुलेट ट्रेन का मुख्य स्टेशन फुलवारीशरीफ में एम्स के पास प्रस्तावित है। यह इलाका पहले से ही स्वास्थ्य और परिवहन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। बुलेट ट्रेन स्टेशन बनने से इस क्षेत्र का महत्व और बढ़ जाएगा।
इसके अलावा एम्स, फुलवारीशरीफ और पाटलिपुत्र स्टेशन के आसपास भी एलिवेटेड ट्रैक बनाने पर गंभीर मंथन चल रहा है। उद्देश्य यही है कि शहर के भीतर यातायात बाधित न हो और भविष्य में बढ़ते दबाव को पहले से संभाला जा सके।
जमीन अधिग्रहण और गांवों की भूमिका
पूरे प्रोजेक्ट के लिए केवल पटना जिले में लगभग 138 हेक्टेयर जमीन की जरूरत बताई जा रही है। इसके अलावा बक्सर, भोजपुर, मोकामा, क्यूल, जमालपुर और सुल्तानगंज जैसे इलाकों में भी ट्रैक निर्माण के लिए गांवों का चयन किया जा रहा है।
यह प्रक्रिया आसान नहीं है, लेकिन प्रशासन का दावा है कि स्थानीय लोगों के हितों का ध्यान रखते हुए ही आगे बढ़ा जाएगा। अगर यह संतुलन बना रहा, तो यह परियोजना विकास और सहमति का अच्छा उदाहरण बन सकती है।
पेड़ों को काटने के बजाय ट्रांसप्लांट करने की पहल
विकास के नाम पर पर्यावरण की अनदेखी अक्सर सवालों के घेरे में रहती है, लेकिन इस परियोजना में एक सकारात्मक पहल देखने को मिल रही है। पटना जिले में एलिवेटेड ट्रैक के निर्माण में करीब 3,885 पेड़ बाधा बन सकते हैं। इन्हें काटने के बजाय ट्रांसप्लांट करने की तैयारी की जा रही है।
इसके लिए वन विभाग से एनओसी लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। अगर यह योजना जमीन पर सही ढंग से लागू होती है, तो यह विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की मिसाल बन सकती है।
बिहार में कहां-कहां होगा बुलेट ट्रेन का ठहराव
केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव पहले ही वाराणसी-सिलीगुड़ी बुलेट ट्रेन की घोषणा कर चुके हैं। प्रस्तावित योजना के अनुसार बिहार में इस हाई-स्पीड ट्रेन का स्टॉपेज पटना और कटिहार में होगा।
350 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली यह बुलेट ट्रेन वाराणसी से पटना होते हुए सिलीगुड़ी की दूरी महज 2 घंटे 55 मिनट में तय करेगी। यह समय मौजूदा रेल यात्रा के मुकाबले बेहद कम है।
उत्तर बिहार और सीमांचल को मिलेगा सीधा लाभ
दानापुर मंडल में हुई प्रेस वार्ता के अनुसार, यह कॉरिडोर उत्तर बिहार और सीमांचल के इलाकों को तेज और आधुनिक कनेक्टिविटी से जोड़ेगा। इससे व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के नए अवसर खुलने की उम्मीद है।
मेरे नजरिए से देखें तो यह परियोजना सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका असर छोटे कस्बों और गांवों तक पहुंचेगा। जब कनेक्टिविटी बढ़ती है, तो विकास अपने आप रास्ता खोज लेता है।
बिहार के इंफ्रास्ट्रक्चर में ऐतिहासिक बदलाव
अगर यह परियोजना तय समय और योजना के अनुसार पूरी होती है, तो बिहार के इंफ्रास्ट्रक्चर में इसे एक ऐतिहासिक कदम माना जाएगा। सड़क, रेल और हवाई कनेक्टिविटी के बाद अब हाई-स्पीड रेल का जुड़ना राज्य को देश के विकास मानचित्र में नई पहचान देगा।
यह बुलेट ट्रेन बिहार की रफ्तार ही नहीं, बल्कि लोगों की सोच और संभावनाओं को भी तेज करने वाली साबित हो सकती है।