छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नए साल की शुरुआत में ही सुरक्षाबलों ने नक्सलवाद के खिलाफ एक और बड़ी जीत दर्ज की है। सुकमा और बीजापुर जिले में शनिवार को हुई दो अलग-अलग मुठभेड़ों में कुल 14 नक्सली मारे गए हैं। इस कार्रवाई में एक महिला नक्सली भी शामिल है। यह ऑपरेशन डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की संयुक्त टीम द्वारा शनिवार तड़के करीब पांच बजे अंजाम दिया गया। यह घटना साफ तौर पर बताती है कि सुरक्षाबल नक्सलियों के खिलाफ लगातार सख्ती बरत रहे हैं और उनके ठिकानों पर लगातार हमले कर रहे हैं।
मुठभेड़ की पूरी जानकारी
तेलंगाना सीमा के करीब गोलापल्ली थाना क्षेत्र के घने जंगलों में हुई मुठभेड़ में 12 नक्सलियों को मार गिराया गया। सुकमा के पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण ने जानकारी देते हुए बताया कि अभी तक तीन शव बरामद किए जा चुके हैं और खोज अभियान जारी है। इसके साथ ही सुरक्षाबलों ने भारी मात्रा में हथियार और गोलाबारूद भी जब्त किया है। शुरुआती जांच से पता चला है कि मारे गए नक्सली किस्टाराम एरिया कमेटी के सक्रिय सदस्य थे। ये नक्सली लंबे समय से इस इलाके में सक्रिय थे और स्थानीय लोगों को डराने और सुरक्षाबलों पर हमले की योजना बना रहे थे।
सुकमा और बीजापुर के जंगलों में सीआरपीएफ और डीआरजी का साझा सर्च ऑपरेशन अभी भी जारी है। अधिकारियों का कहना है कि यह इस साल की पहली बड़ी सफलता है जो भविष्य के ऑपरेशनों के लिए सुरक्षाबलों का मनोबल बढ़ाएगी।
अमित शाह की समय सीमा और तेज हुए ऑपरेशन
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने के लिए मार्च 2026 की समय सीमा तय की है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सुरक्षाबलों ने अपने ऑपरेशनों में जबरदस्त तेजी ला दी है। नतीजा यह है कि पिछले दो सालों में छत्तीसगढ़ में कुल 503 नक्सली मारे जा चुके हैं।
साल 2025 में अब तक 284 नक्सली ढेर किए जा चुके हैं, जिनमें से 255 अकेले बस्तर क्षेत्र में मारे गए हैं। 2024 में राज्य में कुल 219 नक्सली मारे गए थे। यह आंकड़े साफ बताते हैं कि सुरक्षाबलों की रणनीति कामयाब हो रही है और नक्सली संगठन कमजोर होते जा रहे हैं।
माओवादी संगठन की टूटती रीढ़
सुरक्षाबलों की लगातार कार्रवाइयों ने प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) की रीढ़ तोड़ दी है। छत्तीसगढ़ में यह संगठन अब लगभग ‘बिना सिर’ का हो गया है। संगठन के महासचिव नंबला केशव राव उर्फ बसवाराजू और सैन्य नेता माड़वी हिड़मा समेत कुल नौ सेंट्रल कमेटी सदस्य मुठभेड़ों में मारे जा चुके हैं।
इस वजह से संगठन के पास अब केवल तीन सेंट्रल कमेटी सदस्य ही बचे हैं। गणेश उइके ओडिशा में सक्रिय हैं, अनलदा झारखंड में हैं, जबकि मल्लरजी रेड्डी राज्य से बाहर भाग गए हैं। संगठन के अन्य प्रमुख नेता देवजी और गणपति भी छत्तीसगढ़ छोड़ चुके हैं। वेणुगोपाल राव और पुल्लुरी प्रसाद राव जैसे नेताओं ने तो पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है।
स्थानीय लोगों को मिल रही राहत
नक्सली संगठनों के कमजोर होने से स्थानीय लोगों को काफी राहत मिल रही है। बस्तर के गांवों में अब पहले के मुकाबले सामान्य जीवन लौट रहा है। पहले जहां नक्सली लोगों को जबरन अपने साथ जोड़ते थे और उनसे पैसे वसूलते थे, वहीं अब ऐसी घटनाएं कम हो रही हैं।
विकास कार्य भी रफ्तार पकड़ रहे हैं। सड़कें बन रही हैं, स्कूल और अस्पताल खुल रहे हैं। लोगों को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। सरकार भी स्थानीय युवाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए कई योजनाएं चला रही है।
सुरक्षाबलों की बदली रणनीति
सुरक्षाबलों ने अपनी रणनीति में बड़े बदलाव किए हैं। अब खुफिया जानकारी पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। स्थानीय लोगों से संपर्क बढ़ाया जा रहा है ताकि नक्सलियों की गतिविधियों की सही जानकारी मिल सके। ड्रोन और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ाया गया है।
जंगलों में सुरक्षाबलों के कैंप बनाए गए हैं ताकि नक्सली आसानी से छिप न सकें। रात में भी ऑपरेशन किए जा रहे हैं, जिससे नक्सलियों को चौबीसों घंटे दबाव में रहना पड़ता है। सुरक्षाबलों की टीमों को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है जिससे वे जंगलों में बेहतर तरीके से काम कर सकें।
आत्मसमर्पण की बढ़ती संख्या
नक्सली संगठनों के कमजोर होने का एक और सबूत है नक्सलियों द्वारा आत्मसमर्पण करने की बढ़ती संख्या। जब नक्सली देखते हैं कि उनके बड़े नेता मारे जा रहे हैं या भाग रहे हैं, तो वे भी हिम्मत हार जाते हैं। सरकार ने आत्मसमर्पण करने वालों के लिए विशेष पैकेज भी बनाया है, जिसमें आर्थिक मदद और नौकरी का प्रावधान है।
पिछले कुछ महीनों में कई नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। वे बताते हैं कि अब संगठन के अंदर डर और अविश्वास का माहौल है। नेताओं पर भरोसा नहीं रह गया है और लोग सुरक्षित जीवन जीना चाहते हैं।
आगे की चुनौतियां
हालांकि सुरक्षाबलों को बड़ी सफलता मिल रही है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बाकी हैं। बस्तर के जंगल घने और दुर्गम हैं। नक्सली इन जंगलों को अच्छी तरह जानते हैं और छिपने के लिए कई ठिकाने बना चुके हैं। कुछ नक्सली पड़ोसी राज्यों में भी सक्रिय हैं, जिससे उन्हें पकड़ना मुश्किल हो जाता है।
इसके अलावा, नक्सली स्थानीय लोगों को ढाल बनाकर भी इस्तेमाल करते हैं। सुरक्षाबलों को यह ध्यान रखना पड़ता है कि मासूम लोगों को कोई नुकसान न हो। फिर भी सुरक्षाबलों का मनोबल ऊंचा है और वे मार्च 2026 की समय सीमा से पहले नक्सलवाद को खत्म करने के लिए कृतसंकल्प हैं।
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई एक निर्णायक मोड़ पर है। सुकमा और बीजापुर में हुई ताजा मुठभेड़ यह साबित करती है कि सुरक्षाबल पूरी तरह सक्रिय हैं और नक्सलियों को कोई राहत नहीं दे रहे। 500 से अधिक नक्सलियों को ढेर करना और बड़े नेताओं को मार गिराना सुरक्षाबलों की बड़ी उपलब्धि है। अगर यही रफ्तार जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ पूरी तरह नक्सलवाद से मुक्त हो जाएगा और यहां के लोग शांति और विकास का जीवन जी सकेंगे।