वंदे मातरम् भारत की आजादी की लड़ाई का वह नारा है जिसने करोड़ों देशवासियों में देशभक्ति की अलख जगाई थी। आज भी जब यह गीत गाया जाता है तो हर भारतीय के मन में राष्ट्रप्रेम की भावना उमड़ पड़ती है। लेकिन दुर्भाग्य से कुछ लोग इस राष्ट्रगीत का विरोध करते रहे हैं। विश्व हिंदू परिषद ने इस विरोध को देश-विरोधी मानसिकता का प्रतीक बताते हुए सभी नागरिकों से राष्ट्रगीत का सम्मान करने की अपील की है।
नई दिल्ली में विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेंद्र जैन ने कहा कि मजहब के नाम पर वंदे मातरम् का विरोध करना देश के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि यह संकीर्ण सोच ही देश के विभाजन का कारण बनी थी और आज इसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
वंदे मातरम् का गौरवशाली इतिहास
वंदे मातरम् गीत की रचना महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चटर्जी ने की थी। यह गीत उनके उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा है। डेढ़ सौ साल से यह गीत भारत की राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना हुआ है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस गीत ने लाखों देशभक्तों को प्रेरणा दी। जब भी क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर चढ़ते थे तो उनके होंठों पर वंदे मातरम् का नारा होता था।
डॉ. जैन ने कहा कि बंकिमचंद्र चटर्जी के प्रति पूरा देश कृतज्ञ है। उनकी रचना ने भारतीयों को एक सूत्र में बांधने का काम किया। यह गीत सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि राष्ट्रभक्ति का मंत्र है। छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी इस गीत को गाते हुए गर्व महसूस करते हैं।
बंग-भंग आंदोलन और वंदे मातरम्
बंग-भंग आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक अहम पड़ाव था। 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल को दो हिस्सों में बांटने का फैसला किया था। इस फैसले के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन शुरू हो गया। इस आंदोलन में वंदे मातरम् का नारा हर जगह गूंजने लगा।
डॉ. जैन ने बताया कि बंग-भंग आंदोलन में सिर्फ बंगाल ही नहीं बल्कि पूरे देश ने भाग लिया। इस आंदोलन की सबसे खास बात यह थी कि हिंदू और मुसलमान दोनों समुदाय एक साथ खड़े थे। 1907 तक दोनों समुदाय के लोग मिलकर वंदे मातरम् गाते थे। उस समय किसी को इस गीत से कोई आपत्ति नहीं थी।
अंग्रेजों की फूट डालो राज करो की नीति
बंग-भंग आंदोलन की बढ़ती सफलता से अंग्रेज परेशान हो गए। उन्हें समझ आ गया कि अगर हिंदू और मुसलमान एक साथ रहे तो उनकी हुकूमत खतरे में पड़ सकती है। इसलिए उन्होंने अपनी पुरानी नीति फूट डालो और राज करो का इस्तेमाल किया।
डॉ. जैन ने कहा कि अंग्रेजों ने जानबूझकर मुस्लिम नेताओं के एक वर्ग को आगे किया जो उनकी बात मानता था। 1907 में अंग्रेजों ने वंदे मातरम् पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद 1908 में कांग्रेस के कुछ मुस्लिम नेताओं ने इस गीत का विरोध शुरू कर दिया। जो नेता पहले इस गीत को खुशी से गाते थे वे अचानक इसका विरोध करने लगे।
तुष्टीकरण की राजनीति का शिकार
उस दौर के कांग्रेसी नेतृत्व ने मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनाई। उन्होंने मुस्लिम नेताओं के दबाव में राष्ट्रगीत को बांटने का फैसला लिया। यह देश के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। जो गीत पूरे देश को एक करता था उसे राजनीतिक कारणों से विभाजित कर दिया गया।
डॉ. जैन ने कहा कि यह तुष्टीकरण की राजनीति का नतीजा था। अगर उस समय कांग्रेस के नेता दृढ़ता से खड़े होते तो शायद यह स्थिति नहीं बनती। लेकिन वोट बैंक की राजनीति ने राष्ट्रहित को नुकसान पहुंचाया।
आज भी जारी है विरोध
दुर्भाग्य से आज भी कुछ लोग वंदे मातरम् का विरोध करते हैं। कुछ लोग धार्मिक कारणों से तो कुछ लोग राजनीतिक कारणों से इस राष्ट्रगीत को चुनौती देते हैं। कुछ राजनीतिक दल भी वोट बैंक की खातिर इस विरोध को समर्थन देते हैं।
डॉ. जैन ने कहा कि यह औपनिवेशिक सोच है जो अभी भी कुछ लोगों के दिमाग में बैठी हुई है। अंग्रेज तो चले गए लेकिन उनकी फूट डालो की नीति आज भी कुछ लोग अपनाए हुए हैं। यह देश के लिए खतरनाक है।
राष्ट्रगीत का विरोध राष्ट्रहित के खिलाफ
विश्व हिंदू परिषद का स्पष्ट मानना है कि वंदे मातरम् का विरोध राष्ट्रहित के खिलाफ है। यह गीत किसी एक धर्म या समुदाय का नहीं बल्कि पूरे देश का है। जो लोग इसका विरोध करते हैं वे देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाते हैं।
डॉ. जैन ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है लेकिन धर्मनिरपेक्षता का मतलब राष्ट्रगीत का अपमान नहीं है। हर नागरिक को राष्ट्रगीत का सम्मान करना चाहिए। यह देशभक्ति की पहली शर्त है।
सभी नागरिकों से अपील
विश्व हिंदू परिषद ने सभी नागरिकों से अपील की है कि वे संकीर्ण सोच को छोड़कर राष्ट्रगीत का सम्मान करें। हर भारतीय को गर्व से वंदे मातरम् बोलना चाहिए। यह सिर्फ एक नारा नहीं बल्कि हमारी पहचान है।
डॉ. जैन ने कहा कि देश की एकता और अखंडता के लिए जरूरी है कि हम सब मिलकर राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करें। वंदे मातरम् वह मंत्र है जो हमें एक सूत्र में बांधता है। इसे अपनाकर ही हम एक सशक्त भारत का निर्माण कर सकते हैं।
राष्ट्रीय एकता का प्रतीक
वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं है। यह भारत की विविधता में एकता का प्रतीक है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक हर भारतीय इस गीत को समान भाव से गाता है। यह हमारी साझी विरासत है जिसे हमें संभालकर रखना है।
परिषद ने कहा कि जो लोग इस गीत का विरोध करते हैं उन्हें अपनी सोच बदलनी चाहिए। देश की एकता से बड़ा कोई धर्म नहीं है। राष्ट्रप्रेम हर धर्म से ऊपर है। वंदे मातरम् का नारा लगाना हर भारतीय का कर्तव्य है।
विश्व हिंदू परिषद का यह बयान आज के समय में बहुत महत्वपूर्ण है। जब देश में कुछ लोग धर्म और जाति के नाम पर विभाजन की राजनीति कर रहे हैं तब राष्ट्रीय एकता की जरूरत और भी बढ़ जाती है। वंदे मातरम् वह धागा है जो सभी भारतीयों को एक माला में पिरोता है। इसका सम्मान करना और इसे गर्व से गाना हर देशवासी का फर्ज है। आइए हम सब मिलकर संकल्प लें कि हम वंदे मातरम् के इस पावन मंत्र को हमेशा जीवित रखेंगे और आने वाली पीढ़ियों को भी यह संदेश देंगे कि राष्ट्रप्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है।