BMC Election Result 2026: महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से जिस चुनाव का इंतजार था, वह अब अपने नतीजों के साथ साफ तस्वीर पेश कर रहा है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बाद बीएमसी चुनाव को सत्ता की अंतिम परीक्षा माना जा रहा था। बीएमसी के साथ राज्य के 29 नगर निगमों के चुनावी रुझान बता रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी और उसका गठबंधन तेजी से आगे बढ़ रहा है।
हालांकि बीएमसी का पहला नतीजा कांग्रेस के पक्ष में गया, लेकिन कुल रुझानों में बीजेपी गठबंधन ने मजबूत बढ़त बना ली है। बीएमसी में बहुमत के लिए 114 सीटों की जरूरत होती है और चुनाव से पहले आए एग्जिट पोल भी बीजेपी को बहुमत मिलने का संकेत दे चुके थे। यही वजह है कि शुरुआती रुझानों को बीजेपी के लिए मनोबल बढ़ाने वाला माना जा रहा है।
क्यों खास है इस बार का बीएमसी चुनाव
बीएमसी चुनाव इस बार इसलिए भी खास है क्योंकि यह चुनाव 2022 में होना था, लेकिन कई कानूनी और प्रशासनिक कारणों से टलता चला गया। आखिरी बार बीएमसी चुनाव 2017 में हुए थे। 227 सीटों वाली इस महानगरपालिका में उस समय बीजेपी और शिवसेना साथ थीं। तब बीजेपी ने 137 सीटों पर और शिवसेना ने 90 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे।
इस बार वोटिंग प्रतिशत थोड़ा कम रहा। 2026 के चुनाव में बीएमसी में करीब 52.94 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि 2017 में यह आंकड़ा 55.53 प्रतिशत था। इसके बावजूद बीजेपी गठबंधन का प्रदर्शन मजबूत नजर आ रहा है।
लोकसभा की हार से विधानसभा और नगर निगम तक वापसी
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना को महाराष्ट्र में अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। कांग्रेस ने उस समय बाजी मार ली थी और उद्धव ठाकरे तथा शरद पवार गुट का प्रदर्शन भी संतोषजनक रहा था।
लेकिन विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में बीजेपी ने जोरदार वापसी की और विरोधियों के कई राजनीतिक समीकरण बिगाड़ दिए। अब वही रफ्तार बीएमसी और नगर निगम चुनावों में भी दिख रही है।
आंकड़े क्या कह रहे हैं
अब तक महाराष्ट्र के 2869 वार्डों में से 1553 के रुझान सामने आ चुके हैं। इन आंकड़ों में बीजेपी और महायुति को स्पष्ट बढ़त मिलती दिख रही है। खासतौर पर उन इलाकों में एकनाथ शिंदे की शिवसेना का प्रदर्शन मजबूत है, जहां उसका पारंपरिक आधार रहा है। कुल मिलाकर महायुति दो-तिहाई से ज्यादा वार्डों में आगे चलती नजर आ रही है।
मराठी मुद्दे को बीजेपी ने कैसे संभाला
बीजेपी के लिए मराठी भाषा और अस्मिता का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर पार्टी को विरोध का सामना करना पड़ा। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भारी विरोध के चलते अपना फैसला वापस लेना पड़ा।
मराठी मुद्दे पर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का साथ आना बीजेपी के लिए चुनौती बन सकता था। दोनों ठाकरे बंधु लंबे समय बाद एक मंच पर आए और बीएमसी चुनाव साथ लड़ने की घोषणा की। यह मराठी मानुष के नाम पर बड़ा राजनीतिक दांव था।
बयानबाजी से बिगड़ते हालात और संभलती रणनीति
इसी बीच तमिलनाडु बीजेपी नेता के. अन्नामलाई के एक बयान ने विवाद खड़ा कर दिया। उन्होंने मुंबई को बॉम्बे कह दिया, जिसे लेकर ठाकरे बंधुओं ने बीजेपी पर हमला बोल दिया। उद्धव ठाकरे ने आरोप लगाया कि बीजेपी मुंबई का नाम बदलना चाहती है, वहीं राज ठाकरे ने तीखी भाषा का इस्तेमाल किया।
बीजेपी ने इस मुद्दे पर सीधे टकराव से बचते हुए एकनाथ शिंदे को आगे किया। शिंदे ने साफ कहा कि ऐसा बयान नहीं आना चाहिए था। इस संतुलित प्रतिक्रिया से बीजेपी गठबंधन ने मामले को ज्यादा तूल नहीं लेने दिया।
मराठी मानुष और बीजेपी का रिश्ता
2019 में शिवसेना के गठबंधन तोड़ने के बाद बीजेपी के लिए मराठी वोटर को साधना मुश्किल हो गया था। बाल ठाकरे की शिवसेना के साथ गठबंधन इसी वजह से अहम था। उद्धव ठाकरे के अलग होने के बाद बीजेपी को एकनाथ शिंदे के रूप में नया सहारा मिला।
देवेंद्र फडणवीस को उपमुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने यह संदेश दिया कि मराठी नेतृत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा रहा है। यह रणनीति धीरे-धीरे असर दिखाती नजर आ रही है।
मेयर पद को लेकर बयानबाजी जरूर हुई, लेकिन बीजेपी नेताओं ने साफ कर दिया है कि गठबंधन के भीतर फैसला होगा, और उनकी प्राथमिकता बीजेपी का मेयर बनाना है। रुझान भी इसी दिशा में जाते दिख रहे हैं।