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Maharashtra: गड़चिरौली में माओवादी आतंक के सभी स्मारक ध्वस्त, सुरक्षा बलों ने मिटाया भय का निशान

Gadchiroli Maoist Memorials Demolished: गड़चिरौली में माओवादी स्मारकों को किया ध्वस्त, सुरक्षा बलों की बड़ी कार्रवाई
Gadchiroli Maoist Memorials Demolished: गड़चिरौली में माओवादी स्मारकों को किया ध्वस्त, सुरक्षा बलों की बड़ी कार्रवाई (IG Photo)

Gadchiroli Maoist Memorials Demolished: महाराष्ट्र के गड़चिरौली में सुरक्षा बलों ने माओवादियों के 44 स्मारक ध्वस्त किए। 800 जवानों के संयुक्त अभियान में गड़चिरौली पुलिस, सी-60 कमांडो और सीआरपीएफ शामिल रहे। यह कार्रवाई भय से विश्वास की ओर बढ़ते गड़चिरौली का प्रतीक है।

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गड़चिरौली में आतंक की निशानियां मिटीं

Gadchiroli Maoist Memorials Demolished: महाराष्ट्र के गड़चिरौली जिले में सुरक्षा बलों ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए माओवादियों द्वारा बनाए गए सभी 44 स्मारकों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। यह स्मारक वर्षों से आतंक और भय के प्रतीक के रूप में जंगलों में खड़े थे। इन्हें तोड़ने का काम सिर्फ पत्थर और कंक्रीट को हटाना नहीं था, बल्कि लोगों के दिलों में बैठे डर को खत्म करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। गड़चिरौली पुलिस और सुरक्षा बलों की यह कार्रवाई लोकतंत्र की जीत और माओवादी विचारधारा की हार का संकेत है।

माओवादियों का डर फैलाने का हथियार थे स्मारक

माओवादी संगठनों ने गड़चिरौली के दूरदराज इलाकों में अपनी उपस्थिति दिखाने और स्थानीय लोगों को डराने के लिए इन स्मारकों का निर्माण किया था। ये संरचनाएं जंगल के अंदरूनी और दुर्गम क्षेत्रों में बनाई गई थीं, जहां पहुंचना आसान नहीं था। इन स्मारकों का मकसद सिर्फ मृत माओवादियों की याद में श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि आम नागरिकों के मन में खौफ बैठाना था। ये संरचनाएं माओवादियों के प्रभाव क्षेत्र को दर्शाती थीं और उनकी ताकत का प्रदर्शन करती थीं। लेकिन अब सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति और सुरक्षा बलों की दृढ़ता ने इन निशानों को पूरी तरह मिटा दिया है।

800 जवानों का संयुक्त अभियान

इस विशाल कार्रवाई में लगभग 800 सुरक्षाकर्मियों ने हिस्सा लिया। इस टीम में गड़चिरौली पुलिस, सी-60 कमांडो दस्ते, सीआरपीएफ के जवान और विशेष सुरक्षा दल शामिल थे। अभियान को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया। सबसे पहले बीडीडीएस यानी बम डिस्पोजल डिटेक्शन स्क्वाड ने पूरे इलाके की जांच की ताकि किसी तरह की विस्फोटक सामग्री या बूबी ट्रैप का खतरा न रहे। इसके बाद एटापल्ली, हेडरी, भामरागढ़, जिमलगट्टा, धानोरा और पेंढरी उपविभागों के जंगली इलाकों में फैले सभी 44 स्मारकों को एक-एक करके तोड़ा गया। यह अभियान कई दिनों तक चला और सुरक्षा बलों की सतर्कता और साहस का जीता जागता सबूत बना।

राज्य सरकार की कड़ी नीति का नतीजा

गड़चिरौली में माओवादी गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों से लगातार सख्त रवैया अपनाया है। माओवाद विरोधी अभियानों को तेज किया गया है और साथ ही आत्मसमर्पण करने वालों के लिए पुनर्वास नीति भी लाई गई है। इससे कई माओवादियों ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने का फैसला किया। सरकार ने सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ विकास कार्यों पर भी जोर दिया है। सड़कें, स्कूल, अस्पताल और रोजगार के अवसर बढ़ाए गए हैं। इससे स्थानीय लोगों में सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा है और माओवादियों का प्रभाव घटा है।

स्थानीय लोगों में बढ़ा विश्वास

पहले गड़चिरौली के ग्रामीण इलाकों में लोग माओवादियों से डरते थे और उनकी बात मानने को मजबूर थे। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। सुरक्षा बलों की मजबूत मौजूदगी और सरकार की विकासात्मक पहलों ने लोगों को हिम्मत दी है। अब लोग खुलकर पुलिस और प्रशासन को सहयोग दे रहे हैं। इससे माओवादियों के लिए जंगलों में छिपना और सक्रिय रहना मुश्किल हो गया है। यह बदलाव एक दिन में नहीं आया, बल्कि लगातार मेहनत और रणनीति का परिणाम है।

विकास और शांति का नया दौर

Gadchiroli Maoist Memorials Demolished: स्मारकों को तोड़ना केवल एक प्रतीकात्मक कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह गड़चिरौली में नए युग की शुरुआत है। अब इस जिले में विकास और शांति का माहौल बन रहा है। युवाओं को रोजगार के अवसर मिल रहे हैं, बच्चे स्कूल जा रहे हैं और किसान अपनी फसल सुरक्षित तरीके से बेच पा रहे हैं। सरकार ने यह साबित कर दिया है कि माओवादी विचारधारा से ज्यादा ताकतवर लोकतंत्र और विकास की शक्ति है। यह कार्रवाई देश के अन्य नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए भी एक मिसाल बनेगी।

गड़चिरौली पुलिस और सुरक्षा बलों की इस ऐतिहासिक कार्रवाई ने साबित कर दिया है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सही रणनीति से किसी भी चुनौती से पार पाया जा सकता है। अब गड़चिरौली के लोग भय से मुक्त होकर विकास की नई राह पर आगे बढ़ रहे हैं।

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Asfi Shadab

एक लेखक, चिंतक और जागरूक सामाजिक कार्यकर्ता, जो खेल, राजनीति और वित्त की जटिलता को समझते हुए उनके बीच के रिश्तों पर निरंतर शोध और विश्लेषण करते हैं। जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को सरल, तर्कपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध।