केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही में एक स्पष्टीकरण जारी कर विदर्भ साहित्य संघ के चुनाव प्रक्रिया में अपने हस्तक्षेप या भागीदारी की खबरों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। पिछले कुछ दिनों से विभिन्न समाचार माध्यमों में यह खबरें प्रकाशित हो रही थीं कि गडकरी इस प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था के चुनावी मामलों में शामिल हैं। अपने बयान में गडकरी ने साफ़ किया कि ऐसी किसी भी खबर में कोई सच्चाई नहीं है।
विदर्भ साहित्य संघ महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र की एक सौ साल पुरानी प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था है। इस संस्था ने विदर्भ क्षेत्र में साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लेकिन इस संस्था के अध्यक्ष पद के लिए होने वाले चुनाव को लेकर हाल के दिनों में कुछ विवाद सामने आए थे।
राजनेताओं को साहित्यिक संस्थाओं में नहीं करना चाहिए दखल
नितिन गडकरी ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि वे हमेशा से यह मानते आए हैं कि राजनेताओं, व्यापारियों या साहित्य क्षेत्र से बाहर के लोगों को कभी भी साहित्यिक संस्थाओं के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह उनका हमेशा से स्पष्ट विचार रहा है और इसलिए उनके द्वारा किसी प्रकार के हस्तक्षेप का सवाल ही पैदा नहीं होता।
गडकरी ने बताया कि वे खुद को विदर्भ साहित्य संघ का एक हितचिंतक मानते हैं। सौ वर्षों की समृद्ध परंपरा वाली इस संस्था के कल्याण और विकास के बारे में वे हमेशा सोचते रहे हैं। लेकिन यह चिंता करना और चुनावी प्रक्रिया में दखल देना दो अलग-अलग बातें हैं।
संस्था के भवन और भविष्य को लेकर विचार
केंद्रीय मंत्री ने अपने व्यक्तिगत विचार साझा करते हुए कहा कि विदर्भ साहित्य संघ के वर्तमान भवन को हटाकर उसकी जगह पर एक नया, आधुनिक और सुविधाजनक भवन बनाया जाना चाहिए। यह भवन साहित्यिक और नाट्य गतिविधियों के लिए उत्कृष्ट सुविधाओं से लैस होना चाहिए।
गडकरी का मानना है कि इस संस्था में केवल साहित्य और रंगमंच से जुड़े कार्यक्रम ही आयोजित होने चाहिए। यहां नए और उभरते हुए साहित्यकारों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए और वरिष्ठ विद्वानों तथा साहित्यकारों का उचित सम्मान होना चाहिए। यही उनकी संस्था से अपेक्षा है और यही उनका विचार रहा है।
चुनाव संस्था का आंतरिक मामला
नितिन गडकरी ने स्पष्ट किया कि विदर्भ साहित्य संघ के अध्यक्ष पद और कार्यकारिणी का चुनाव संस्था की पूरी तरह से आंतरिक प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि अब तक इस चुनाव से उनका न तो प्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध रहा है और न ही अप्रत्यक्ष रूप से। आज भी स्थिति यही है। इस प्रक्रिया में उनकी किसी प्रकार की भागीदारी का कोई कारण नहीं है।
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि अध्यक्ष पद के लिए जितने भी उम्मीदवारों ने नामांकन किया है, उन सभी से उनके व्यक्तिगत संबंध अच्छे हैं। वे किसी एक उम्मीदवार का समर्थन नहीं कर रहे हैं और न ही किसी के खिलाफ हैं।
सर्वसम्मति से चुनाव की अपील
गडकरी ने सभी उम्मीदवारों से अपील की है कि वे आपस में बैठकर चर्चा करें और चुनाव को टालते हुए सर्वसम्मति से अध्यक्ष और कार्यकारिणी का चयन करें। उन्होंने कहा कि ऐसा नेतृत्व चुना जाए जो विदर्भ के साहित्य क्षेत्र को नई ऊर्जा और दिशा दे सके।
उन्होंने कहा कि विदर्भ साहित्य संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। ऐसे में अगर सभी उम्मीदवार मिलकर सर्वसम्मति से नेतृत्व का चयन करते हैं तो यह एक आदर्श उदाहरण होगा। यह संस्था की गरिमा और परंपरा के अनुकूल भी होगा।
साहित्यिक संस्थाओं की स्वायत्तता जरूरी
नितिन गडकरी के इस स्पष्टीकरण से यह संदेश जाता है कि साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को अपने आंतरिक मामलों में स्वायत्तता मिलनी चाहिए। राजनीतिक या व्यावसायिक हस्तक्षेप से ऐसी संस्थाएं अपना मूल उद्देश्य खो सकती हैं।
विदर्भ जैसे क्षेत्र में जहां साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियां समृद्ध रही हैं, वहां इस तरह की संस्थाओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में यह जरूरी है कि ये संस्थाएं बाहरी दबावों से मुक्त रहकर काम करें।
समाज में साहित्य का महत्व
साहित्यिक संस्थाएं समाज में साहित्य और संस्कृति को जीवित रखने का काम करती हैं। ये नए लेखकों को मंच देती हैं और पुराने साहित्यकारों की विरासत को संभालती हैं। विदर्भ साहित्य संघ भी पिछले सौ वर्षों से यह काम कर रहा है।
नितिन गडकरी ने अपने बयान में संस्था की इस भूमिका को स्वीकार करते हुए कहा कि उनकी यही कामना है कि यह संस्था अपने मूल उद्देश्यों पर केंद्रित रहे। यहां केवल साहित्य और कला से जुड़े कार्यक्रम हों, न कि अन्य गतिविधियां।
आगे की राह
नितिन गडकरी ने अपने संदेश के अंत में विदर्भ साहित्य संघ को उसकी आगामी यात्रा के लिए हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की है कि संस्था अगले सौ वर्षों में भी उसी तरह विदर्भ के साहित्य और संस्कृति को समृद्ध करती रहेगी।
इस स्पष्टीकरण से यह साफ हो गया है कि नितिन गडकरी चाहे विदर्भ साहित्य संघ के हितचिंतक हों, लेकिन वे संस्था के चुनावी मामलों में किसी प्रकार की भूमिका नहीं निभा रहे हैं। उनका यह रुख साहित्यिक संस्थाओं की स्वायत्तता के प्रति सम्मान दर्शाता है।