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ममता बाला हमारे लोगों को गिरफ्तार करवा रही हैं, क्या ऐसे बागदा जीता जा सकता है? शांतनु का सवाल

ममता बाला हमारे लोगों को गिरफ्तार करवा रही हैं, क्या ऐसे बागदा जीता जा सकता है? शांतनु का सवाल
Shantanu Thakur: ममता बाला हमारे लोगों को गिरफ्तार करवा रही हैं, बागदा में जीत का सवाल उठाया (FB Photo)

बीजेपी सांसद शांतनु ठाकुर ने शुक्रवार को बागदा में आरोप लगाया कि ममता बनर्जी मतुआ समुदाय के लोगों को गिरफ्तार करवा रही हैं। उन्होंने ठाकुरबाड़ी घटना में निर्दोषों की गिरफ्तारी का आरोप लगाया और पासपोर्ट सत्यापन में 1971 के दस्तावेज मांगने पर सवाल उठाए। ममता ठाकुर ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

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Asfi Shadab
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर मतुआ समुदाय के मुद्दे पर बीजेपी सांसद शांतनु ठाकुर और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। शुक्रवार को बागदा के हेलेंचा इलाके में ऑल इंडिया मतुआ महासंघ के एक कार्यक्रम में पहुंचे शांतनु ठाकुर ने ममता बनर्जी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि मतुआ समुदाय के लोगों को बिना किसी कारण गिरफ्तार किया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस तरह के डर और दबाव से बागदा में चुनाव जीता जा सकता है।

ठाकुरबाड़ी घटना पर शांतनु का बड़ा आरोप

शांतनु ठाकुर ने अपने भाषण में कहा कि ठाकुरबाड़ी की घटना में जो लोग मौजूद भी नहीं थे, उन्हें भी गिरफ्तार किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस प्रशासन लोगों को गिरफ्तारी की धमकी देकर डरा रहा है। यह पूरी कार्रवाई राजनीतिक रूप से प्रेरित है और मतुआ समुदाय को चुप कराने की कोशिश की जा रही है।

कार्यक्रम के बाद जब पत्रकारों ने शांतनु ठाकुर से सवाल किए, तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह सब ममता ठाकुर करवा रही हैं। उन्हें बागदा क्षेत्र से डर लग रहा है। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा कि क्या इस तरह की गिरफ्तारियों और डर के माहौल से बागदा में जीत हासिल की जा सकती है।

पासपोर्ट सत्यापन में 1971 के दस्तावेज की मांग पर सवाल

शांतनु ठाकुर ने एक और गंभीर मुद्दा उठाया जो मतुआ समुदाय के लिए बेहद संवेदनशील है। हाल ही में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक एसआईआर (स्पेशल इंटेलिजेंस रिपोर्ट) के जवाब में कहा था कि मतुआ समुदाय को झूठे वादे किए जा रहे हैं। इस बयान का जवाब देते हुए शांतनु ठाकुर ने सवाल उठाया कि अगर सचमुच मतुआ समुदाय के प्रति सरकार संवेदनशील है, तो पासपोर्ट के सत्यापन में 1971 के दस्तावेज क्यों मांगे जा रहे हैं।

यह मुद्दा मतुआ समुदाय के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इस समुदाय के अधिकांश लोग विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए थे। 1971 के दस्तावेज की मांग उनके लिए नागरिकता के सवाल खड़े करती है, जो उन्हें असुरक्षित महसूस कराती है।

मतुआ समुदाय की राजनीति पर शांतनु का जवाब

अक्सर शांतनु ठाकुर पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह मतुआ समुदाय को लेकर राजनीति कर रहे हैं। इस सवाल का जवाब देते हुए शांतनु ठाकुर ने कहा कि अगर मैं मतुआ समुदाय के लिए राजनीति कर रहा हूं, तो इसमें गलत क्या है। उन्होंने सवाल किया कि फिर क्यों मतुआ समुदाय के खिलाफ तरह-तरह की टिप्पणियां की जाती हैं। क्यों उन्हें लेकर ‘क्या क्या’, ‘छी छी’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं।

शांतनु ठाकुर ने मुख्यमंत्री से सीधे सवाल किया कि अगर सचमुच उनकी सरकार मतुआ समुदाय के प्रति संवेदनशील है, तो पहले वह 1971 के दस्तावेज मांगने का जवाब दें। उन्होंने कहा कि जब तक इन सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं मिलते, मतुआ समुदाय को यह समझना होगा कि उनके साथ क्या हो रहा है।

ममता ठाकुर की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं

दिलचस्प बात यह है कि शांतनु ठाकुर के इन गंभीर आरोपों पर अभी तक ममता ठाकुर की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। ममता ठाकुर भी मतुआ समुदाय की एक प्रमुख नेता हैं और तृणमूल कांग्रेस से जुड़ी हुई हैं। वह बागदा क्षेत्र से विधायक भी रही हैं। उनकी चुप्पी को राजनीतिक विश्लेषक अलग-अलग तरीके से देख रहे हैं।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ममता ठाकुर इस मुद्दे पर सीधे जवाब देने से बच रही हैं क्योंकि यह मामला बेहद संवेदनशील है और इससे मतुआ समुदाय के भीतर विभाजन की स्थिति बन सकती है।

बागदा क्षेत्र की राजनीतिक अहमियत

बागदा और उसके आसपास का इलाका पश्चिम बंगाल की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां मतुआ समुदाय की बड़ी आबादी रहती है, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की ताकत रखती है। पिछले कुछ सालों में बीजेपी ने इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की है, जिसका एक बड़ा कारण शांतनु ठाकुर और उनके परिवार का प्रभाव है।

ठाकुर परिवार मतुआ समुदाय के बीच धार्मिक और सामाजिक रूप से बेहद सम्मानित है। हरिचांद ठाकुर और गुरुचांद ठाकुर की विरासत को आगे बढ़ाते हुए यह परिवार समुदाय का नेतृत्व करता आया है। इसलिए शांतनु ठाकुर के बयान और आरोप केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक महत्व भी रखते हैं।

तृणमूल कांग्रेस की चुनौती

तृणमूल कांग्रेस के लिए बागदा क्षेत्र में मतुआ समुदाय को साधना एक बड़ी चुनौती है। पार्टी ने ममता ठाकुर को आगे करके इस समुदाय में अपनी जगह बनाने की कोशिश की है, लेकिन शांतनु ठाकुर और उनके परिवार का प्रभाव अभी भी काफी मजबूत है।

पासपोर्ट सत्यापन और नागरिकता से जुड़े मुद्दे मतुआ समुदाय के लिए बेहद संवेदनशील हैं। इस समुदाय के लोगों को लगता है कि उनकी नागरिकता पर सवाल उठाना उनके अस्तित्व पर हमला है। इसलिए जब शांतनु ठाकुर 1971 के दस्तावेज का मुद्दा उठाते हैं, तो यह सीधे समुदाय की भावनाओं से जुड़ जाता है।

आगे की राजनीति

शांतनु ठाकुर के ताजा बयान से साफ है कि आने वाले समय में बागदा क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने वाली हैं। मतुआ समुदाय के मुद्दे पर बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच टकराव बढ़ेगा।

यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन आरोपों का जवाब कैसे देती हैं। अगर वह 1971 के दस्तावेज के मुद्दे को गंभीरता से नहीं लेतीं, तो मतुआ समुदाय में असंतोष बढ़ सकता है। वहीं, अगर वह इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश करती हैं, तो उन्हें राजनीतिक फायदा मिल सकता है।

शांतनु ठाकुर ने अपनी बात रखी है और अब गेंद ममता बनर्जी के पाले में है। आने वाले दिनों में बागदा की राजनीति और मतुआ समुदाय के मुद्दों पर सभी की नजर टिकी रहेगी।

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असफ़ी शादाब राष्ट्र भारत में कंटेंट एडिटर और न्यूज़ राइटर हैं। वे क्राइम, राजनीति, सरकारी योजनाओं, खेल, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय घटनाओं से संबंधित समाचारों का संपादन, तथ्य सत्यापन और प्रकाशन कार्य संभालते हैं। उनकी जिम्मेदारी विभिन्न राज्यों से प्राप्त समाचारों को आधिकारिक स्रोतों, उपलब्ध दस्तावेजों और विश्वसनीय जानकारी के आधार पर व्यवस्थित एवं स्पष्ट रूप में पाठकों तक पहुंचाना है। राष्ट्र भारत में वे महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार और अन्य राज्यों से प्राप्त समाचारों का संपादन करते हैं तथा उन्हें सरल, सटीक और पाठक-केंद्रित भाषा में प्रस्तुत करने का कार्य करते हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रकाशित सामग्री संपादकीय मानकों, तथ्यात्मक शुद्धता और विश्वसनीय स्रोतों के अनुरूप हो। मुख्य कार्यक्षेत्र (Core Responsibilities): क्राइम, राजनीति, सरकारी योजनाओं और समसामयिक समाचारों का संपादन। विभिन्न संवाददाताओं और विश्वसनीय समाचार स्रोतों से प्राप्त सामग्री का तथ्य सत्यापन। आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों, सरकारी दस्तावेजों एवं विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर समाचारों का संपादन। स्पष्ट, संतुलित और पाठक-अनुकूल भाषा में समाचार प्रस्तुत करना। राष्ट्र भारत की संपादकीय नीतियों और पत्रकारिता मानकों के अनुरूप सामग्री प्रकाशित करना। संपादकीय दृष्टिकोण (Editorial Approach): असफ़ी शादाब का उद्देश्य पाठकों तक तथ्यात्मक, संतुलित और स्पष्ट समाचार पहुंचाना है। वे प्रकाशित होने वाली प्रत्येक सामग्री की भाषा, संदर्भ और उपलब्ध स्रोतों की समीक्षा करते हैं ताकि समाचार संपादकीय गुणवत्ता और विश्वसनीयता के मानकों पर खरा उतर सके।