बंगाल में SIR दस्तावेज को लेकर विवाद
पश्चिम बंगाल में SIR यानी State Inclusive Register को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। राज्य में अब माता-पिता के साथ रिश्ता साबित करने के लिए बिना सिर-पैर के ब्लड रिलेशन सर्टिफिकेट जमा किए जा रहे हैं। कहीं जन्म से पहले ही बर्थ सर्टिफिकेट तो कहीं गलत ब्लाड रिलेशन सर्टिफिकेट जमा हो रहे हैं। यह सवाल उठता है कि आखिर किसी भी तरह से सूची में नाम दर्ज कराने के लिए ऐसे अजीब दस्तावेज का उपाय कौन दे रहा है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी धमकी का माहौल
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद माइक्रो ऑब्जर्वर को धमकी दी जा रही है। खुद BDO भांगड़, SDO बारुईपुर जैसे सरकारी अधिकारी धमकी दे रहे हैं। इसमें तृणमूल के पूर्व कार्यकर्ता शाजहान मोल्ला भी शामिल हैं। क्या सरकार के लिए विवादास्पद माइक्रो ऑब्जर्वर को सबक सिखाने के लिए अब धमकी की संस्कृति वापस आ गई है?
काकुलिया की घटना के बाद भी अपराधी फरार
काकुलिया में हुई गुंडागर्दी की घटना के 12 दिन बाद भी सोनापप्पू पकड़ में नहीं आया है। इस बीच 17 लोगों को रिहा भी कर दिया गया। दूसरी ओर नदिया के आमिर ने कानूनी तरीके से मृत मां की आंखें दान करने के बाद तीन दिन तक जेल में बिताए। राज्य में एक ही पुलिस के दो रूप क्यों हैं? आम लोगों के लिए हथकड़ी और सरकार के संरक्षण में रहने वाले अपराधियों के लिए सारी छूट?
8505 अधिकारियों की नियुक्ति में देरी
8505 अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर राज्य सरकार अभी भी टालमटोल कर रही है। निर्देश के अनुसार आयोग को पूरी जानकारी वाली सूची नहीं भेजी जा रही है। आयोग द्वारा नियुक्त किए गए लोगों को लेकर भी समस्या है और आयोग को लोग देने में भी दिक्कत! राज्य सरकार SIR को लेकर इतनी उदासीन क्यों है?
बंगाली भाषियों की समस्या और केंद्रीय योजनाएं
बंगाली भाषी लोग दूसरे राज्यों में जाकर समस्या में पड़ते हैं तो इस पर बड़ा मुद्दा बनाया जाता है। लेकिन अगर आयुष्मान भारत सहित केंद्रीय योजनाएं बंगाल में शुरू होतीं तो लोगों को राज्य छोड़कर नहीं जाना पड़ता। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने फिर से केंद्रीय योजनाओं को लेकर राज्य सरकार पर हमला किया। क्या दूसरे राज्यों में बंगाली भाषियों की परेशानी केंद्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन से हल हो सकती है?
पुणे में पुरुलिया के सुखेन महतो की हत्या
पुणे में पुरुलिया के सुखेन महतो की हत्या हो गई। तृणमूल का दावा है कि बंगाली भाषा में बात करने के कारण हत्या हुई और अभिषेक बनर्जी मैदान में उतर गए हैं। दूसरी ओर पुणे पुलिस का कहना है कि हत्या का कारण कोई सांप्रदायिक मुद्दा नहीं है। अगर राज्य में भत्ते की जगह काम होता तो क्या यह समस्या आसानी से हल नहीं हो जाती? या फिर सिर्फ राजनीतिक कारणों से प्रवासी मुद्दे को बचाए रखना चाहती है सत्ताधारी पार्टी?
गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर अटकाव
गठबंधन की बातचीत सीट बंटवारे पर अटक गई है। पूर्व साझेदार ISF ज्यादा सीटों पर लड़ाई की मांग कर रहा है लेकिन वामदल उन्हें इतनी सीटें नहीं देना चाहते। इतने लंबे समय तक चलने वाली गठबंधन प्रक्रिया का अगर सचमुच कोई नतीजा आता भी है तो क्या उससे कोई फायदा होगा?
दस्तावेज धोखाधड़ी का गंभीर मामला
SIR के लिए जमा किए जा रहे दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ब्लड रिलेशन सर्टिफिकेट में बुनियादी जानकारी तक नहीं होना चिंता की बात है। यह स्पष्ट करता है कि किस तरह से लोग गलत तरीके से अपना नाम सूची में दर्ज करा रहे हैं। इस पर सरकार को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए और जांच करनी चाहिए कि आखिर कौन लोगों को ऐसे गलत दस्तावेज बनाने की सलाह दे रहा है।
माइक्रो ऑब्जर्वर की भूमिका और धमकी
सुप्रीम कोर्ट ने माइक्रो ऑब्जर्वर की नियुक्ति का आदेश दिया था ताकि चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी हो सके। लेकिन राज्य में सरकारी अधिकारी खुद ही उन्हें धमकी दे रहे हैं। BDO और SDO जैसे अधिकारियों का ऐसा व्यवहार सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना है। शाजहान मोल्ला जैसे राजनीतिक कार्यकर्ताओं का इसमें शामिल होना यह दिखाता है कि सरकार चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं चाहती।
पुलिस का दोहरा चरित्र
काकुलिया की घटना में शामिल अपराधी अभी भी फरार हैं और कुछ को तो रिहा भी कर दिया गया। वहीं नदिया में एक व्यक्ति ने अपनी मां की आंखें कानूनी तरीके से दान कीं फिर भी उसे तीन दिन जेल में रहना पड़ा। यह पुलिस का दोहरा चरित्र दिखाता है। एक ओर जहां आम लोगों के साथ सख्ती बरती जाती है वहीं सरकार के करीबी अपराधियों को छूट दी जाती है। यह न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
नियुक्ति प्रक्रिया में अड़चनें
8505 अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर राज्य सरकार लगातार टालमटोल कर रही है। आयोग को समय पर पूरी जानकारी नहीं दी जा रही है। राज्य सरकार आयोग द्वारा नियुक्त लोगों को लेकर भी आपत्ति जता रही है और खुद लोग देने में भी आनाकानी कर रही है। यह स्पष्ट करता है कि राज्य सरकार SIR की प्रक्रिया में सहयोग नहीं करना चाहती। सवाल यह है कि आखिर राज्य सरकार इस प्रक्रिया में इतनी देरी क्यों कर रही है?
केंद्रीय योजनाओं का विरोध
राज्य सरकार लगातार केंद्रीय योजनाओं का विरोध करती रही है। आयुष्मान भारत जैसी योजना को राज्य में लागू नहीं किया गया। अगर यह योजना लागू होती तो राज्य के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलतीं और उन्हें इलाज के लिए दूसरे राज्यों में नहीं जाना पड़ता। निर्मला सीतारमण ने सही सवाल उठाया है कि जब बंगाली भाषियों की समस्या की बात होती है तो बड़ा मुद्दा बनाया जाता है लेकिन केंद्रीय योजनाओं को लागू नहीं किया जाता।
पुणे हत्याकांड का राजनीतिकरण
पुणे में हुई हत्या को तृणमूल सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रही है। पार्टी का दावा है कि बंगाली भाषा में बात करने के कारण हत्या हुई। लेकिन पुणे पुलिस का कहना है कि यह सांप्रदायिक मामला नहीं है। सवाल यह है कि अगर राज्य में रोजगार के पर्याप्त अवसर होते तो क्या लोगों को काम की तलाश में दूसरे राज्यों में जाना पड़ता? राज्य सरकार रोजगार देने की बजाय सिर्फ भत्ते बांट रही है जो स्थायी समाधान नहीं है।
गठबंधन की समस्याएं
विपक्षी गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर विवाद है। ISF ज्यादा सीटों पर लड़ना चाहता है लेकिन वाम दल उन्हें कम सीटें देना चाहते हैं। इतने लंबे समय से गठबंधन की बातचीत चल रही है लेकिन अभी तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है। अगर गठबंधन बन भी जाता है तो सवाल यह है कि क्या यह तृणमूल के खिलाफ प्रभावी साबित हो पाएगा। अतीत में भी ऐसे गठबंधन बने हैं लेकिन चुनाव में सफलता नहीं मिली है।
राज्य में कई मुद्दे एक साथ सामने आए हैं जो सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते हैं। SIR में गलत दस्तावेज जमा होना, माइक्रो ऑब्जर्वर को धमकी देना, अपराधियों को संरक्षण देना और केंद्रीय योजनाओं का विरोध करना – ये सभी मुद्दे यह दिखाते हैं कि राज्य सरकार जनता के हित में काम नहीं कर रही है। जरूरत इस बात की है कि इन सभी मुद्दों पर गंभीरता से विचार किया जाए और जनता के हित में फैसले लिए जाएं।