DA Arrears Protest: पश्चिम बंगाल में एक बार फिर महंगाई भत्ते यानी DA को लेकर सरकार और कर्मचारियों के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्पष्ट आदेश दिए जाने के बावजूद राज्य सरकार द्वारा 25 प्रतिशत बकाया डीए का भुगतान न किए जाने से कर्मचारियों में भारी नाराजगी है। इसी नाराजगी ने संघर्षशील संयुक्त मंच को एक बार फिर सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया।
संघर्षशील संयुक्त मंच के आह्वान पर हजारों कर्मचारी कोलकाता की सड़कों पर उतरे। यह सुबोध मल्लिक स्क्वायर से शुरू होकर धर्मतला के रानी रसमणि एवेन्यू तक पहुंचा। हाथों में तख्तियां, नारों की गूंज और चेहरों पर आक्रोश—पूरा माहौल सरकार के खिलाफ विरोध का प्रतीक बन गया।
बकाया डीए को लेकर बढ़ता टकराव
महंगाई भत्ता कर्मचारियों के लिए कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि जीवन यापन की जरूरत बन चुका है। बढ़ती महंगाई के दौर में डीए ही वह सहारा है, जो वेतन और वास्तविक खर्च के बीच की खाई को कुछ हद तक पाटता है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया था कि कर्मचारियों को 25 प्रतिशत बकाया डीए का भुगतान किया जाए। अदालत का यह आदेश कर्मचारियों के लिए उम्मीद की किरण था। लेकिन समय बीतने के बावजूद जब सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो कर्मचारियों का धैर्य जवाब देने लगा।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी का आरोप
संघर्षशील संयुक्त मंच का सीधा आरोप है कि राज्य सरकार जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी कर रही है। मंच के नेताओं का कहना है कि यह सिर्फ कर्मचारियों के अधिकारों का हनन नहीं, बल्कि न्यायपालिका की अवमानना जैसा भी है।
उनका तर्क है कि जब सर्वोच्च अदालत का आदेश साफ है, तो सरकार के पास टालमटोल का कोई बहाना नहीं होना चाहिए।
सरकार को चेतावनी
सुबोध मल्लिक स्क्वायर से शुरू हुआ धीरे-धीरे विशाल जनसमूह में बदल गया। शिक्षक, सरकारी कर्मचारी, पेंशनभोगी और विभिन्न विभागों से जुड़े लोग इसमें शामिल हुए।
नारों के जरिए सरकार को यह संदेश दिया गया कि कर्मचारी अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई चाहते हैं। मিছিল के दौरान यह भी साफ किया गया कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
कर्मचारियों की पीड़ा और ज़मीनी हकीकत
कई कर्मचारियों ने बताया कि बढ़ती महंगाई ने घर का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।
कर्मचारियों का कहना है कि वे सरकार से कोई अतिरिक्त मांग नहीं कर रहे, बल्कि वही मांग रहे हैं, जो कानून और अदालत ने उन्हें दिया है।
अब तक राज्य सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है। इसी चुप्पी ने कर्मचारियों के गुस्से को और बढ़ा दिया है।
संघर्षशील संयुक्त मंच का कहना है कि सरकार संवाद के बजाय समय खींचने की नीति अपना रही है, जो हालात को और बिगाड़ सकती है।