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Bengal SIR: पश्चिम बंगाल के प्रवासी श्रमिकों की दुविधा, मतदाता सूची में नाम जोड़ने को लेकर काम या घर लौटने का संकट

Bengal SIR: पश्चिम बंगाल के प्रवासी श्रमिकों की दुविधा, मतदाता सूची में नाम जोड़ने को लेकर काम या घर लौटने का संकट
West Bengal SIR: मतदाता सूची में नाम जुड़वाने को लेकर प्रवासी श्रमिकों में चिंता, घर लौटें या काम बचाएं? (File Photo)

पश्चिम बंगाल में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) के चलते देशभर के प्रवासी मजदूर दुविधा में हैं। वे या तो घर लौटकर मतदाता सूची में नाम जोड़ें या रोज़गार बचाएं। आर्थिक संकट, ऑनलाइन प्रक्रिया की जटिलता और सूचना की कमी ने इस लोकतांत्रिक अधिकार को कठिन बना दिया है।

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Aryan Ambastha
Aryan Ambastha
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पश्चिम बंगाल के प्रवासी श्रमिकों की दुविधा

West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल में इस महीने शुरू हुई विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) ने प्रवासी श्रमिकों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या वे अपने रोजगार को छोड़कर घर लौटें या फिर काम करते हुए नाम मतदाता सूची से छूटने का जोखिम उठाएँ?

वोट के अधिकार और रोज़गार के बीच फंसे प्रवासी

केरल के एर्नाकुलम जिले के अंगमाली में काम करने वाले 28 वर्षीय जयरूल मंडल के लिए यह निर्णय बेहद कठिन है। उनका कहना है, “फॉर्म आ चुके हैं, अगर हम भाग नहीं लेते तो नाम छूट सकता है। लेकिन यात्रा के लिए पैसे नहीं हैं।”

ऐसा ही हाल मुर्शिदाबाद, हुगली, उलूबेरिया और उत्तर 24 परगना के हजारों प्रवासी श्रमिकों का है, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में निर्माण, ज्वेलरी और मैन्युफैक्चरिंग के काम में लगे हैं।

निर्वाचन आयोग की समयसीमा और बढ़ती चिंता

West Bengal SIR: 27 अक्टूबर को निर्वाचन आयोग ने 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष पुनरीक्षण की घोषणा की थी। इसके अनुसार 4 नवंबर से 4 दिसंबर तक नामांकन फॉर्म जमा किए जा सकते हैं। 9 दिसंबर को प्रारंभिक सूची प्रकाशित होगी, 8 जनवरी 2026 तक आपत्तियाँ दर्ज होंगी, और अंतिम मतदाता सूची 7 फरवरी 2026 को जारी होगी।

इस बीच, प्रवासी मजदूरों के सामने दुविधा है — क्या वे अपने राज्यों में लौटकर दस्तावेज़ों की पुष्टि कराएं या यहीं रहकर रोज़गार बनाए रखें।

आर्थिक मजबूरी और सीमित साधन

22 वर्षीय हबीबुल्ला बिस्वास, जो कोच्चि में निर्माण कार्य में लगे हैं, बताते हैं, “मैं दुर्गा पूजा पर ही घर गया था। अब फिर लौटना मुश्किल है। बारिश के कारण यहां का काम रुका था, अब शुरू हुआ है। पैसे नहीं हैं कि बार-बार यात्रा कर सकूं।”

मुंबई के मलाड में रहने वाले मसीबुर मल्लिक की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। वे कहते हैं, “अगर अभी घर गया तो मज़दूरी कटेगी। मेरी सबसे बड़ी बेटी विशेष रूप से सक्षम है। इतने कम समय में जाना मुश्किल है।”

West Bengal SIR: परिवारों में घबराहट और असमंजस

मलाड की तरीफा बताती हैं, “अगर हमें बुलाया गया तो जाना ही पड़ेगा, लेकिन किराया कहां से लाएं? पति अकेले कमाने वाले हैं, परिवार पांच लोगों का है।”

कई परिवारों ने अपने रिश्तेदारों को दस्तावेज़ भेज दिए हैं ताकि वे घर से ही प्रक्रिया पूरी कर सकें।

गुजरात और महाराष्ट्र में बनी सहायक समितियाँ

राजकोट में ज्वेलरी यूनिट चलाने वाले आलोकनाथ शॉ बताते हैं कि उन्होंने बंगाली प्रवासी मजदूरों की सहायता के लिए बैठकें की हैं। “ब्लॉक लेवल ऑफिसर्स को हमने बताया है कि मजदूरों को घर लौटने की ज़रूरत नहीं। दस्तावेज़ और फोटो उनके परिजन दे सकते हैं।”

इसी तरह, अहमदाबाद में अब्दुल रऊफ याकूब शेख, ‘समस्त बंगाली समाज एसोसिएशन’ के अध्यक्ष, कहते हैं कि जिन लोगों ने गुजरात में स्थायी रूप से बसने का निर्णय लिया है, वे यहां नया मतदाता कार्ड बनवा सकते हैं।

भ्रम और प्रशासनिक अस्पष्टता

मुंबई के अंबुजवाड़ी के अमल बिस्वास का कहना है, “हम 2002 से मुंबई में रह रहे हैं। सभी दस्तावेज़ मुंबई के पते पर हैं। फिर भी मेरी पत्नी को पश्चिम बंगाल से कॉल आया है कि दस्तावेज़ जमा करें। यह समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों।”

इस तरह की उलझनों ने प्रवासियों में भ्रम बढ़ा दिया है। बहुतों को यह भी नहीं पता कि ऑनलाइन फॉर्म कैसे भरे जाएं, जबकि सरकार ने यह सुविधा उपलब्ध कराई है।

West Bengal SIR:  विशेषज्ञों की राय

चुनाव विशेषज्ञों का मानना है कि प्रवासी श्रमिकों की स्थिति के मद्देनज़र निर्वाचन आयोग को जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। डिजिटल प्रक्रिया की सुलभता पर बल देते हुए प्रवासियों को यह भरोसा दिलाया जाना चाहिए कि उनका मताधिकार सुरक्षित रहेगा।

पश्चिम बंगाल के लाखों प्रवासी श्रमिक आज एक कठिन मोड़ पर हैं। उनके लिए मतदान का अधिकार केवल लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। लेकिन रोज़गार की मजबूरी, आर्थिक कठिनाई और प्रशासनिक अस्पष्टता ने इस अधिकार को जटिल बना दिया है।

देश के विभिन्न हिस्सों में बसे इन श्रमिकों के लिए आवश्यक है कि राज्य सरकारें और निर्वाचन अधिकारी समन्वय स्थापित कर उन्हें व्यावहारिक समाधान प्रदान करें — ताकि न उनका काम छूटे और न ही लोकतंत्र में उनकी आवाज़।


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