अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक नई अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की स्थापना की है। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य दुनिया के संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापित करना और स्थिरता लाना है। लेकिन इस बोर्ड में पाकिस्तान को शामिल करने के फैसले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा कर दिया है। खासकर इजरायल ने इस फैसले पर सख्त आपत्ति जताई है।
गुरुवार को पाकिस्तान को आधिकारिक तौर पर इस बोर्ड का सदस्य बना दिया गया। मूल रूप से यह संस्था गाजा की पुनर्निर्माण योजना के लिए बनाई गई थी। लेकिन अब इसका दायरा बढ़ाकर दुनिया के अन्य संघर्ष क्षेत्रों तक ले जाने की योजना है।
भारत को भी मिला निमंत्रण
इस बोर्ड में शामिल होने के लिए भारत को भी निमंत्रण दिया गया था। भारत उन कई देशों की सूची में शामिल है जिन्हें इस संस्था का हिस्सा बनने के लिए बुलाया गया है। हालांकि अब तक भारत ने इस निमंत्रण पर कोई जवाब नहीं दिया है। भारत की तरफ से चुप्पी काफी मायने रखती है।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और अन्य सदस्य देशों के साथ खड़े देखना भारत के लिए निश्चित रूप से खटकने वाला है। भारत ने बार-बार पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगाए हैं। हाल ही में 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भयानक आतंकी हमले की याद अभी ताजा है।
इजरायल की सख्त आपत्ति
इजरायल ने पाकिस्तान को इस बोर्ड में शामिल करने पर साफ शब्दों में नाराजगी जताई है। इजरायल के भारत में राजदूत रूवेन अजार ने इस महीने की शुरुआत में एनडीटीवी से बातचीत में कहा था कि गाजा में किसी भी तरह की जमीनी योजना में पाकिस्तानी सेना को शामिल करने का प्रस्ताव स्वीकार नहीं है।
अजार ने कहा कि इजरायल पाकिस्तान की भागीदारी को लेकर सहज नहीं है। उनकी चिंता का मुख्य कारण हमास और पाकिस्तान की धरती से संचालित होने वाले आतंकी संगठनों के बीच बढ़ते संबंध हैं। लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों का नाम इस संदर्भ में खास तौर पर लिया गया।
इजरायली राजदूत ने स्पष्ट किया कि देश आमतौर पर उन्हीं राष्ट्रों के साथ सहयोग करते हैं जिन पर वे भरोसा करते हैं और जिनके साथ उनके उचित राजनयिक संबंध हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। इजरायल पाकिस्तान को गाजा में किसी भी तरह की स्थिरीकरण योजना में विश्वसनीय या स्वीकार्य साझेदार नहीं मानता।
इजरायल के मंत्री का बयान
इजरायल के अर्थव्यवस्था और उद्योग मंत्री निर बरकत ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि गाजा में किसी भी तरह के संक्रमण बल या पुनर्निर्माण मिशन में पाकिस्तानी सैनिकों की उपस्थिति बिल्कुल अस्वीकार्य है। यह बयान साफ तौर पर दर्शाता है कि इजरायल इस मामले पर कितना संवेदनशील है।
बोर्ड में कौन-कौन शामिल
अमेरिका, पाकिस्तान और सऊदी अरब के अलावा इस बोर्ड के पहले संस्करण में कई अन्य देश भी शामिल हैं। इनमें अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, पैराग्वे, उजबेकिस्तान, आर्मेनिया और अजरबैजान शामिल हैं।
हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन भी इस बोर्ड का हिस्सा हैं। ऑर्बन एक राष्ट्रवादी नेता हैं और यूरोपीय संघ में ट्रंप के सबसे मजबूत समर्थकों में से एक माने जाते हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी इस बोर्ड में शामिल हैं, जो ट्रंप के करीबी सहयोगी हैं।
ट्रंप का दावा
अपने शुरुआती भाषण में ट्रंप ने दावा किया कि हर कोई इस ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का हिस्सा बनना चाहता है। उन्होंने कहा कि वे संयुक्त राष्ट्र सहित कई अन्य संगठनों के साथ मिलकर काम करते रहेंगे।
ट्रंप ने बताया कि बोर्ड शुरुआत में गाजा पर ध्यान केंद्रित करेगा, लेकिन फिर वैश्विक स्तर पर काम करेगा। उन्होंने कहा कि गाजा में सफलता के बाद इस पहल को अन्य क्षेत्रों में भी ले जाया जाएगा। ट्रंप ने विश्वास जताया कि गाजा में वे बहुत सफल होंगे।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने आगे कहा कि जब यह बोर्ड पूरी तरह से बन जाएगा, तो यह काफी हद तक वह सब कुछ कर सकेगा जो वे चाहते हैं। यह बयान इस संस्था की व्यापक संभावनाओं को दर्शाता है।
किसकी अनुपस्थिति खटकी
इस बोर्ड में कुछ प्रमुख देशों की अनुपस्थिति भी ध्यान खींचती है। पश्चिमी यूरोपीय ताकतों जैसे फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी इस बोर्ड का हिस्सा नहीं हैं। रूस भी इससे दूर है। एक और बड़ी अनुपस्थिति चीन की है।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने पुष्टि की कि उन्हें निमंत्रण मिला था, लेकिन बीजिंग ने कहा कि वह संयुक्त राष्ट्र को केंद्र में रखकर बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का बचाव करेगा। यह बयान चीन के इस बोर्ड से दूरी बनाए रखने के फैसले को स्पष्ट करता है।
बोर्ड का संचालन कौन करेगा
ट्रंप इस बोर्ड के अध्यक्ष होंगे और साथ ही अमेरिका के प्रतिनिधि के रूप में भी अलग से काम करेंगे। बोर्ड के चार्टर के अनुसार, अध्यक्ष को बोर्ड के मिशन को पूरा करने के लिए आवश्यक सहायक संस्थाओं को बनाने, संशोधित करने या भंग करने का विशेष अधिकार होगा।
ट्रंप एक कार्यकारी बोर्ड के सदस्यों को चुनेंगे, जो वैश्विक स्तर के नेता होंगे। ये सदस्य दो साल के कार्यकाल के लिए काम करेंगे, लेकिन अध्यक्ष उन्हें हटा भी सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि अध्यक्ष को केवल स्वैच्छिक इस्तीफे या अक्षमता की स्थिति में ही हटाया जा सकता है।
एक अमेरिकी अधिकारी ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि ट्रंप व्हाइट हाउस छोड़ने के बाद भी अध्यक्ष पद पर बने रह सकते हैं, जब तक कि वे इस्तीफा नहीं देते। हालांकि भविष्य का कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति एक अलग अमेरिकी प्रतिनिधि नियुक्त कर सकता है।
भारत की स्थिति
भारत के लिए यह स्थिति काफी नाजुक है। एक तरफ अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान की मौजूदगी वाले किसी भी मंच पर भारत की सहभागिता सवालों के घेरे में है।
पहलगाम हमले के बाद भारत-पाकिस्तान संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण हो गए हैं। ऐसे में किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान के साथ बैठना भारत के लिए मुश्किल होगा। भारत सरकार की चुप्पी इसी दुविधा को दर्शाती है।
भारत पारंपरिक रूप से बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। लेकिन जब बात आतंकवाद से जुड़ी हो और पाकिस्तान भी उसी मंच पर मौजूद हो, तो भारत की स्थिति स्पष्ट रूप से सतर्क हो जाती है।
आगे की राह
यह बोर्ड अभी शुरुआती दौर में है। गाजा में शांति स्थापित करना इसका पहला लक्ष्य है, जो अपने आप में बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। गाजा में दशकों से जारी संघर्ष को सुलझाना आसान नहीं होगा।
पाकिस्तान की भागीदारी को लेकर इजरायल की आपत्ति इस बोर्ड की कार्यप्रणाली में दिक्कतें पैदा कर सकती है। अगर प्रमुख सदस्य देश एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करेंगे, तो शांति स्थापना का काम कैसे होगा, यह देखना दिलचस्प होगा।
भारत के लिए फैसला करना मुश्किल है। अगर भारत इस बोर्ड में शामिल होता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयासों में अपनी भूमिका को मजबूत करेगा। लेकिन पाकिस्तान के साथ एक मंच पर आना राजनीतिक रूप से मुश्किल होगा, खासकर जब आतंकवाद का मुद्दा इतना संवेदनशील है।