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ईरान पर हमले से पीछे क्यों हटे ट्रंप, इजरायल और सऊदी की चेतावनी का असर

ईरान पर हमले से पीछे क्यों हटे ट्रंप, इजरायल और सऊदी की चेतावनी का असर
Trump Iran Attack: ईरान पर हमले से पीछे क्यों हटे ट्रंप, जानें पूरी अंदरूनी कहानी (File Photo)

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले की योजना को आखिरी समय में रद्द कर दिया। इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने ट्रंप से अपील की थी कि इजरायल ईरान की जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार नहीं है। सऊदी अरब के राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान ने भी क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए हमला न करने की सलाह दी।

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Asfi Shadab
Asfi Shadab
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मध्य पूर्व में तनाव की स्थिति पिछले कुछ हफ्तों से बेहद गंभीर बनी हुई थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की तैयारी में थे, लेकिन आखिरी समय में उन्होंने अपना फैसला बदल दिया। इस बदलाव की कहानी बेहद दिलचस्प है और इसमें कई देशों की भूमिका शामिल है।

ईरान पर हमले की तैयारी और अचानक रुकावट

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वरिष्ठ सलाहकारों को पूरा यकीन था कि ईरान पर हमला होने वाला है। सभी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं और सैन्य योजना भी तैयार थी। लेकिन अचानक स्थिति में बदलाव आया जब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी राष्ट्रपति के मध्य पूर्व मामलों के सलाहकार स्टीव विटकॉफ को एक महत्वपूर्ण संदेश भेजा। इस संदेश ने पूरी स्थिति को शांत करने में अहम भूमिका निभाई।

द वाशिंगटन पोस्ट अखबार ने व्हाइट हाउस के करीबी सूत्रों के हवाले से इस पूरी घटना का खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, यह फैसला एक दिन में नहीं लिया गया बल्कि कई देशों के दबाव और सलाह के बाद लिया गया।

इजरायल की चिंता और नेतन्याहू की अपील

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से संपर्क किया। पिछले हफ्ते हुई इस बातचीत में नेतन्याहू ने ट्रंप से साफ शब्दों में कहा कि वे ईरान पर हमला न करें। यह बात सुनने में थोड़ी अजीब लगती है क्योंकि इजरायल और ईरान के बीच लंबे समय से तनाव चल रहा है।

नेतन्याहू ने ट्रंप को बताया कि इजरायल इस समय ईरान की संभावित जवाबी कार्रवाई का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। उनका कहना था कि अगर अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तो ईरान जवाब में इजरायल पर हमला कर सकता है। ऐसी स्थिति में इजरायल खुद को बचाने में सक्षम नहीं होगा, खासकर तब जब अमेरिकी सेना की पर्याप्त मौजूदगी क्षेत्र में नहीं है।

अमेरिकी सैन्य तैयारी की कमी

इजरायली प्रधानमंत्री की चिंता का एक मुख्य कारण यह था कि अमेरिकी सेना की क्षेत्र में पर्याप्त उपस्थिति नहीं थी। नेतन्याहू ने स्पष्ट किया कि ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों को रोकने के लिए इजरायल को अमेरिकी सहायता की जरूरत होगी। लेकिन उस समय क्षेत्र में अमेरिकी बल पर्याप्त नहीं थे।

नेतन्याहू के एक सलाहकार ने बताया कि प्रधानमंत्री को लगता है कि वर्तमान अमेरिकी योजना काफी प्रभावी नहीं है और यह वांछित परिणाम नहीं दे सकती। एक अमेरिकी अधिकारी ने भी माना कि 12 दिवसीय युद्ध के दौरान क्षेत्र में पर्याप्त अमेरिकी सैन्य उपस्थिति न होना एक बड़ी कमी थी। उस समय इजरायल को बैलेस्टिक मिसाइलों से बचाव के लिए पूरी तरह अमेरिकी सेना पर निर्भर रहना पड़ता।

सऊदी अरब की भूमिका

इस पूरे मामले में सऊदी अरब की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण रही। सूत्रों के अनुसार, सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भी राष्ट्रपति ट्रंप से फोन पर बात की। इस बातचीत में उन्होंने क्षेत्रीय सुरक्षा की चिंताओं का हवाला देते हुए ट्रंप को ईरान पर हमला न करने की सलाह दी।

सऊदी अरब की यह चिंता जायज भी थी क्योंकि किसी भी सैन्य कार्रवाई का असर पूरे खाड़ी क्षेत्र पर पड़ सकता था। तेल की कीमतें बढ़ सकती थीं और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल सकती थी।

14 जनवरी की महत्वपूर्ण बातचीत

द वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप और नेतन्याहू के बीच 14 जनवरी को फोन पर लंबी बातचीत हुई थी। यह वही समय था जब सभी को उम्मीद थी कि ट्रंप ईरान के खिलाफ हवाई हमले का आदेश दे देंगे। लेकिन इस बातचीत के बाद स्थिति बदल गई।

इस बातचीत में नेतन्याहू ने अपनी सभी चिंताएं और आशंकाएं ट्रंप के सामने रखीं। उन्होंने साफ किया कि इस समय सैन्य कार्रवाई करना खतरनाक हो सकता है और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

ईरानी विदेश मंत्री का संदेश

तनाव कम करने में ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के संदेश ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अमेरिकी सलाहकार स्टीव विटकॉफ को भेजे गए संदेश में स्थिति को शांत करने की बात कही। इस संदेश ने दोनों पक्षों के बीच संवाद का रास्ता खोला और तनाव कम करने में मदद की।

ट्रंप के वरिष्ठ सलाहकार भी इस संदेश से प्रभावित हुए और उन्होंने राष्ट्रपति को सैन्य कार्रवाई से बचने की सलाह दी। यह कूटनीति की जीत थी जिसने एक बड़े युद्ध को टाल दिया।

ट्रंप के फैसले के पीछे के कारण

अखबार की रिपोर्ट में कई कारणों का जिक्र किया गया है जिनकी वजह से ट्रंप ने अपना फैसला बदला। पहला कारण था क्षेत्र में अमेरिकी सेना की अपर्याप्त उपस्थिति। दूसरा कारण था इजरायल और सऊदी अरब जैसे महत्वपूर्ण सहयोगियों की चेतावनी। तीसरा कारण था उनके अपने वरिष्ठ सलाहकारों की चिंताएं।

इन सभी कारणों को मिलाकर ट्रंप ने यह फैसला लिया कि इस समय सैन्य कार्रवाई करना सही नहीं होगा। यह एक परिपक्व और सोच-समझकर लिया गया फैसला था।

अयातुल्ला खामेनेई के शासन पर टिप्पणी

दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने शनिवार को ही ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के 37 साल के शासन को समाप्त करने की घोषणा की थी। यह बयान काफी कड़ा था और इससे तनाव बढ़ने की आशंका थी। लेकिन जल्द ही ट्रंप ने अपने रुख में बदलाव किया।

ईरान में विरोध प्रदर्शन और ट्रंप की प्रतिक्रिया

हाल के हफ्तों में ईरान में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। कथित तौर पर हजारों प्रदर्शनकारी मारे गए हैं। ऐसे समय में ट्रंप ने ईरानी नागरिकों को विरोध प्रदर्शन जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि जल्द ही बाहरी सहायता मिल सकती है।

लेकिन अगले ही दिन ट्रंप ने अपना रुख बदल दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें सूचित किया गया है कि ईरान में हिंसा कम हो गई है। उन्होंने खामेनेई के संयम की तारीफ भी की और कहा कि सामूहिक फांसी रोकना उनका अब तक का सबसे अच्छा निर्णय था।

ईरान की प्रतिक्रिया

ईरान की ओर से अमेरिका पर लगातार यह आरोप लगाया जा रहा है कि वह ईरान में अस्थिरता फैलाने की कोशिश कर रहा है। अयातुल्ला खामेनेई के आधिकारिक एक्स अकाउंट से बार-बार ऐसे बयान जारी किए गए हैं। ईरानी नेतृत्व का मानना है कि अमेरिका विरोध प्रदर्शनों को बढ़ावा दे रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ है कि मध्य पूर्व में स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। एक छोटी सी गलती पूरे क्षेत्र को युद्ध में धकेल सकती है। ऐसे में कूटनीति और संयम ही एकमात्र रास्ता है।

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Asfi Shadab

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असफ़ी शादाब वरिष्ठ पत्रकार और संवाददाता हैं, जो राष्ट्र भारत में महाराष्ट्र और कोलकाता से क्राइम, राजनीति, खेल और सरकारी नीतियों से जुड़े विषयों की ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हैं। उन्हें जमीनी पत्रकारिता, प्रशासनिक मामलों और समसामयिक घटनाक्रमों की गहरी समझ है। उनकी रिपोर्टिंग तथ्यपरक, शोध आधारित और आधिकारिक स्रोतों पर आधारित होती है, जिससे पाठकों को विश्वसनीय और स्पष्ट जानकारी प्राप्त होती है। अनुभव : पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करते हुए उन्होंने महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों से ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है। प्रशासनिक कार्यवाहियों, सरकारी नीतियों, राजनीतिक घटनाक्रम और अपराध से जुड़े मामलों की फील्ड कवरेज उनकी प्रमुख पहचान रही है। वर्तमान भूमिका : राष्ट्र भारत में वरिष्ठ संवाददाता के रूप में वे क्राइम, राजनीति, खेल और सरकारी नीतियों से संबंधित खबरों की रिपोर्टिंग करते हैं। वे जमीनी सच्चाई को सरल और आम पाठक की भाषा में प्रस्तुत करने को प्राथमिकता देते हैं। भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस महाराष्ट्र और कोलकाता रहा है, जहां वे स्थानीय प्रशासन, राजनीतिक गतिविधियों, अपराध और खेल जगत से जुड़े विषयों को करीब से कवर करते हैं। उनकी क्षेत्रीय समझ और फील्ड अनुभव उनकी रिपोर्टिंग को अधिक प्रामाणिक बनाते हैं। मुख्य विशेषज्ञता (Core Expertise) : • क्राइम रिपोर्टिंग : अपराध, पुलिस जांच, प्रशासनिक कार्रवाई और कानून व्यवस्था से जुड़े मामलों की तथ्यपरक कवरेज। • राजनीति और शासन : सरकारी नीतियों, प्रशासनिक फैसलों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग। • खेल पत्रकारिता : खेल जगत की प्रमुख घटनाओं, खिलाड़ियों और प्रतियोगिताओं से जुड़े विषयों की रिपोर्टिंग। • ग्राउंड रिपोर्टिंग : फील्ड विजिट, स्थानीय स्रोतों और आधिकारिक जानकारी के आधार पर जमीनी सच्चाई सामने लाना। • जनहित पत्रकारिता : आम लोगों से जुड़े मुद्दों और प्रशासनिक प्रभावों को सरल एवं स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत करना। विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तथ्यों की सटीकता, आधिकारिक स्रोतों पर आधारित रिपोर्टिंग और जमीनी अनुभव ने असफ़ी शादाब को एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है। क्राइम, राजनीति और प्रशासनिक विषयों पर उनकी निरंतर फील्ड रिपोर्टिंग पाठकों के बीच उनकी विश्वसनीयता को मजबूत बनाती है।