रघुनाथपुर में सियासत की नई पटकथा — विकास बनाम विरासत की लड़ाई
बिहार की राजनीति में सिवान की रघुनाथपुर विधानसभा सीट इस बार फिर सुर्खियों में है। यह सीट हमेशा से सत्ता समीकरणों की दिशा तय करती आई है। लेकिन 2025 का चुनावी माहौल कुछ अलग है — यहां मुकाबला केवल दलों का नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं का बन गया है — “विकास बनाम विरासत”।
एक ओर NDA अपने स्थानीय कनेक्शन और संगठन की मज़बूती पर भरोसा जता रहा है, तो दूसरी तरफ़ RJD “विरासत” और भावनात्मक जुड़ाव के सहारे मैदान में है। तीसरे मोर्चे के रूप में जनसुराज पार्टी ने भी समीकरणों में नया मोड़ ला दिया है।
NDA की रणनीति — जमीनी नेटवर्क और स्थानीय जुड़ाव का दांव
NDA खेमे में सबसे चर्चित नाम है विकास कुमार सिंह उर्फ़ जिशु सिंह।
राजनीति में उनका चेहरा भले ज्यादा प्रचार में न रहा हो, लेकिन पार्टी के अंदर वे मेहनती और जमीनी कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते हैं।
पिछले कई वर्षों से संगठन में सक्रिय रहने के कारण उनकी पकड़ हर तबके में मजबूत है।
स्थानीय लोग उन्हें “काम करने वाला कार्यकर्ता” मानते हैं, और यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है।
अगर NDA ने उन्हें टिकट दिया, तो यह चुनाव संगठनात्मक रूप से उनके लिए बड़ा मौका होगा।
बूथ-स्तर की पकड़ और जनता के बीच सीधे जुड़ाव से वे NDA के लिए सबसे मजबूत उम्मीदवार साबित हो सकते हैं।
जनसुराज की चाल — बाहरी उम्मीदवार पर भरोसा या जोखिम?
तीसरे मोर्चे की बात करें तो जनसुराज पार्टी ने इस क्षेत्र को राजपूत बहुल मानते हुए राहुल कीर्ति सिंह को मैदान में उतारा है।
राहुल कीर्ति सिंह भले ही शिक्षित और युवा चेहरा हैं, पर स्थानीय जनता का एक बड़ा वर्ग उन्हें “बाहरी नेता” के रूप में देखता है।
उनकी यह छवि चुनावी माहौल में बड़ी चुनौती बन सकती है।
अगर जनता उन्हें बाहरी मानकर दूरी बनाए रखती है, तो इसका सीधा नुकसान जनसुराज को और फायदा NDA को हो सकता है।
क्योंकि राजपूत वोटों के बंटवारे का बड़ा हिस्सा NDA की झोली में जा सकता है।
महागठबंधन की रणनीति — विरासत और भावनाओं का सहारा
महागठबंधन (RJD) की ओर से लगभग तय उम्मीदवार हैं ओसामा शहाबुद्दीन,
जो अपने पिता स्वर्गीय मोहम्मद शहाबुद्दीन की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
उनके समर्थन में मौजूदा विधायक हरिशंकर यादव भी खुलकर मैदान में हैं।
उन्होंने ओसामा के पक्ष में पगड़ी पहनाकर समर्थन जताया है और लगातार प्रचार अभियान में जुटे हैं।
महागठबंधन की कोशिश है कि मुस्लिम-यादव (MY) वोट बैंक को एकजुट कर भावनात्मक लहर पैदा की जाए।
लेकिन अब यह सवाल अहम है — क्या विरासत के नाम पर जनता विकास के मुद्दे को पीछे छोड़ देगी?
चुनावी समीकरण — कौन किस पर भारी?
NDA की बढ़त:
विकास सिंह की स्थानीय पकड़, संगठन में उनकी लंबी भूमिका, और जनता के साथ सीधा संवाद उन्हें मजबूत स्थिति में खड़ा करता है।
जनसुराज का प्रभाव:
राहुल कीर्ति सिंह अगर वोटों में सेंध लगा पाए तो यह RJD को नुकसान पहुंचा सकता है,
पर यदि उन्हें “बाहरी” माना गया तो इसका फायदा NDA को होगा।
RJD की ताकत:
ओसामा की विरासत और हरिशंकर यादव का संगठनात्मक समर्थन RJD को भावनात्मक फायदा जरूर दे सकता है,
पर आज का मतदाता केवल भावनाओं से नहीं, विकास और स्थानीय उपस्थिति से भी प्रभावित होता है।
जनता की पसंद तय करेगी — विकास या विरासत?
रघुनाथपुर में इस बार मुकाबला त्रिकोणीय है।
पर मैदान में जीत उसी की होगी जो बूथ स्तर तक मेहनत करेगा और जनता से सीधा जुड़ाव बनाए रखेगा।
विकास कुमार सिंह (जिशु) का अनुभव और संगठनात्मक मजबूती उन्हें एक कदम आगे रखती है,
लेकिन RJD की भावनात्मक अपील और ओसामा की विरासत इस जंग को और दिलचस्प बना देती है।
रघुनाथपुर की जनता अब विकास की राह चुनेगी या विरासत की छाया में लौटेगी — यह 2025 के चुनाव परिणाम ही बताएगा।