नागपुर के राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज विश्वविद्यालय में छात्राओं के मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाने और उन्हें तनावमुक्त जीवन जीने के लिए तैयार करने के उद्देश्य से एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला 10 जनवरी 2026 को शनिवार के दिन पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होळकर परिसर स्थित छात्रा छात्रावास में संपन्न हुई। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य छात्राओं में बढ़ते मानसिक दबाव, भावनात्मक उतार-चढ़ाव और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं का समाधान खोजना था।
आज के समय में शिक्षा के बढ़ते दबाव, प्रतियोगिता और सामाजिक अपेक्षाओं के कारण युवा छात्राओं में तनाव की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। इस गंभीर मुद्दे को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्राओं के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए इस कार्यशाला का आयोजन किया।
कार्यशाला का उद्देश्य और महत्व
इस कार्यशाला का मुख्य लक्ष्य छात्राओं को मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूक करना और उन्हें तनाव से निपटने के व्यावहारिक तरीके सिखाना था। आधुनिक जीवनशैली में युवाओं पर पढ़ाई, करियर, परिवार और समाज की अपेक्षाओं का भारी दबाव रहता है। इस दबाव के कारण कई बार छात्राएं मानसिक रूप से थक जाती हैं और उनका आत्मविश्वास कम हो जाता है।
विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. मनाली क्षीरसागर के मार्गदर्शन में यह पहल छात्राओं के समग्र विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उनका मानना है कि केवल किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत व्यक्तित्व का निर्माण भी शिक्षा का अहम हिस्सा है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता और विशिष्ट उपस्थिति
कार्यशाला की अध्यक्षता छात्रावास की वरिष्ठ अधीक्षिका डॉ. विजयता उईके ने की। प्रमुख अतिथि के रूप में ललित कला विभाग की प्रमुख डॉ. संयुक्ता थोरात ने कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम की शुरुआत अधीक्षिका सौ. सरोज लांजेवार ने की और मानसिक स्वास्थ्य के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
सौ. सरोज लांजेवार ने अपने संबोधन में कहा कि मानसिक स्वास्थ्य शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने छात्राओं से आग्रह किया कि वे अपनी भावनाओं को दबाने की बजाय उन्हें सही तरीके से व्यक्त करना सीखें। उन्होंने यह भी बताया कि तनाव को नजरअंदाज करने से कई गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं इसलिए समय रहते इसका समाधान जरूरी है।

तनाव के कारण और समाधान पर विशेष सत्र
डॉ. संयुक्ता थोरात ने अपने सत्र में तनाव के मुख्य कारणों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि परीक्षा का डर, भविष्य की चिंता, सामाजिक दबाव, परिवार की अपेक्षाएं और स्वयं से बहुत अधिक अपेक्षा रखना तनाव के प्रमुख कारण हैं। उन्होंने छात्राओं को समझाया कि असफलता जीवन का अंत नहीं बल्कि एक नया अवसर है।
डॉ. थोरात ने मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए कुछ सरल उपाय भी सुझाए। उन्होंने कहा कि नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, अपने शौक के लिए समय निकालना, परिवार और दोस्तों से बातचीत करना और सकारात्मक सोच रखना मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है।
उन्होंने यह भी बताया कि भावनात्मक संतुलन बनाए रखने के लिए अपनी भावनाओं को पहचानना और स्वीकार करना बहुत जरूरी है। छात्राओं को गुस्से, उदासी या चिंता को दबाने की बजाय उसे सही तरीके से व्यक्त करना चाहिए।

रोचक गतिविधियों से सीखा व्यावहारिक समाधान
कार्यशाला को रोचक और प्रभावी बनाने के लिए कई गतिविधियों का आयोजन किया गया। इनमें बलून एक्टिविटी, ड्रीम एक्टिविटी, गीत, हास्य और समाचार पत्र पठन जैसी गतिविधियां शामिल थीं। इन गतिविधियों का उद्देश्य छात्राओं को मनोरंजन के साथ-साथ तनाव मुक्ति के तरीके सिखाना था।
बलून एक्टिविटी में छात्राओं ने अपने तनाव और डर को गुब्बारों पर लिखकर उन्हें फोड़ा। इस गतिविधि ने उन्हें यह समझाया कि तनाव को मन में दबाने की बजाय उसे बाहर निकालना चाहिए। ड्रीम एक्टिविटी में छात्राओं ने अपने सपनों और लक्ष्यों को साझा किया जिससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ा।
गीत और हास्य गतिविधियों ने छात्राओं को हंसने और खुलकर अपनी भावनाएं व्यक्त करने का मौका दिया। समाचार पत्र पठन गतिविधि में छात्राओं ने सकारात्मक और प्रेरक समाचारों को पढ़ा जिससे उनकी सोच में सकारात्मकता आई।

छात्राओं को मिली प्रेरणा और जागरूकता
इस कार्यशाला का छात्राओं पर गहरा प्रभाव पड़ा। कई छात्राओं ने बताया कि इस कार्यशाला से पहले वे अपने तनाव और भावनाओं को व्यक्त करने में झिझकती थीं लेकिन अब उन्हें सही तरीके समझ आ गए हैं। छात्राओं ने यह भी कहा कि उन्हें मानसिक स्वास्थ्य के महत्व के बारे में पहली बार इतनी गहराई से जानकारी मिली।
कई छात्राओं ने यह स्वीकार किया कि पढ़ाई के दबाव और भविष्य की चिंता से वे अक्सर तनाव में रहती हैं। इस कार्यशाला ने उन्हें यह सिखाया कि तनाव से बचने के लिए केवल समस्या से भागना नहीं बल्कि उसका सामना करना जरूरी है।
मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता
आज के समय में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में जागरूकता बढ़ रही है। पहले लोग मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को छुपाते थे लेकिन अब इस बारे में खुलकर बात की जा रही है। विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में इस तरह की कार्यशालाओं का आयोजन एक सकारात्मक कदम है।
विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को रोकने के लिए शुरुआती स्तर पर ही जागरूकता और परामर्श जरूरी है। यदि समय रहते छात्राओं को सही मार्गदर्शन मिले तो वे न केवल अपने करियर में बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो सकती हैं।
कार्यक्रम का समापन और आभार
कार्यशाला के समापन पर सभी अतिथियों और प्रतिभागियों ने इस पहल की सराहना की। छात्राओं ने विश्वविद्यालय प्रशासन का आभार व्यक्त किया और कहा कि ऐसे कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित होने चाहिए।
डॉ. विजयता उईके ने अपने समापन भाषण में कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। उन्होंने छात्राओं से आग्रह किया कि वे अपनी भावनाओं को समझें, उन्हें व्यक्त करें और जरूरत पड़ने पर मदद लें।
इस कार्यशाला से छात्राओं में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी और उन्हें संतुलित, आत्मविश्वासी और तनावमुक्त जीवन जीने की प्रेरणा मिली। यह पहल न केवल छात्राओं के लिए बल्कि संपूर्ण समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लेना जरूरी है।