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आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, मौत या चोट पर राज्य सरकार को देना होगा मुआवजा

आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के हमलों पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि मौत या चोट की स्थिति में राज्य सरकार जिम्मेदार होगी और मुआवजा तय किया जाएगा। कोर्ट ने मानवीय लेकिन प्रभावी समाधान पर जोर दिया है।
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Stray Dogs Supreme Court: देश में आवारा कुत्तों का मुद्दा लंबे समय से बहस का विषय रहा है, लेकिन अब यह केवल प्रशासनिक या भावनात्मक चर्चा तक सीमित नहीं रहा। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने इस मुद्दे को एक नए और गंभीर मोड़ पर ला खड़ा किया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर किसी आवारा कुत्ते के काटने से किसी की मौत होती है या बच्चे और बुजुर्ग घायल होते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी और हर ऐसे मामले में मुआवजा तय किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख उन लाखों नागरिकों की आवाज बनकर सामने आया है, जो रोजमर्रा की जिंदगी में सड़कों पर घूमते आवारा कुत्तों से भय और असुरक्षा महसूस करते हैं। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि अब लापरवाही और टालमटोल को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

आवारा कुत्तों पर अदालत की सख्ती

सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने स्पष्ट किया कि अगर किसी कुत्ते के हमले से जान जाती है या गंभीर चोट लगती है, तो यह माना जाएगा कि राज्य सरकार ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। अदालत का मानना है कि स्थानीय निकायों और सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। यह टिप्पणी उन मामलों की पृष्ठभूमि में आई है, जहां कुत्तों के हमले से मासूम बच्चों और बुजुर्गों की जान जा चुकी है।

कुत्तों को खाना खिलाने वालों पर भी सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने केवल सरकारों को ही नहीं, बल्कि उन लोगों को भी कठघरे में खड़ा किया जो सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाते हैं। जस्टिस विक्रम नाथ ने तीखे शब्दों में पूछा कि अगर किसी को कुत्तों से इतना ही लगाव है, तो वे उन्हें अपने घर क्यों नहीं ले जाते। अदालत ने यह भी कहा कि सड़कों पर कुत्तों का घूमना, लोगों को डराना और काटना किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है।

इस मामले में दलील देते हुए वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि आवारा कुत्तों का मुद्दा भावनात्मक है। इस पर अदालत की प्रतिक्रिया काफी सख्त रही। बेंच ने कहा कि भावनाएं अब तक केवल कुत्तों के लिए दिखाई दे रही हैं, इंसानों के लिए नहीं। यह टिप्पणी इस बात को रेखांकित करती है कि मानवीय सुरक्षा को किसी भी भावनात्मक तर्क से ऊपर रखा जाना चाहिए।

पीड़िता की पीड़ा और सवाल

कुत्ते के काटने से पीड़ित एक महिला ने अदालत में जो बयान दिया, उसने पूरे मुद्दे को मानवीय दृष्टि से और गहरा बना दिया। महिला ने कहा कि वह पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम के पक्ष में हैं, लेकिन उन्हें बिना किसी उकसावे के कुत्ते ने काट लिया। उनका सवाल यह था कि आखिर उस कुत्ते ने ऐसा क्यों किया। उन्होंने बताया कि वह कुत्ता लंबे समय से क्रूरता का शिकार रहा था और संभवतः डर के कारण उसने हमला किया। यह बयान बताता है कि समस्या केवल कुत्तों की नहीं, बल्कि समाज के व्यवहार और व्यवस्था की भी है।

हर कुत्ते को हटाने का आदेश नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य सड़कों से हर कुत्ते को हटाना नहीं है। अदालत ने कहा कि उसके निर्देश पशु जन्म नियंत्रण नियमों के तहत ही हैं। यानी समाधान हिंसक या जल्दबाजी में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और मानवीय तरीके से निकाला जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि कुत्ते डर या पुराने अनुभवों के आधार पर आक्रामक हो सकते हैं।

संतुलन की जरूरत और पर्यावरणीय पहलू

सुनवाई के दौरान यह तर्क भी सामने आया कि कुत्तों को अचानक हटाने से चूहों की संख्या बढ़ सकती है, जिससे नई समस्याएं खड़ी होंगी। यह टिप्पणी दिखाती है कि आवारा कुत्तों का मुद्दा केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शहरी पारिस्थितिकी से भी जुड़ा है। अदालत ने हल्के अंदाज में यह भी कहा कि बिल्लियां चूहों को नियंत्रित करती हैं, जिससे संतुलन का सवाल और जटिल हो जाता है।

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Dipali Kumari

दीपाली कुमारी पिछले तीन वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में कार्यरत हैं। उन्होंने रांची के गोस्सनर कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। सामाजिक सरोकारों, जन-जागरूकता और जमीनी मुद्दों पर लिखने में उनकी विशेष रुचि है। आम लोगों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाना और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को धारदार लेखन के माध्यम से सामने लाना उनका प्रमुख लक्ष्य है।