Maharashtra Municipal Elections 2026: नागपुर की राजनीति में इस बार जो नाम सबसे ज़्यादा चर्चा में है, वह किसी बड़े राजनीतिक घराने से नहीं, बल्कि गलियों, बस्तियों और सुबह-सुबह अख़बार की आवाज़ से निकला है। उत्तर नागपुर का यह नाम है गौतम—एक ऐसा युवा, जिसने अपनी ज़िंदगी की शुरुआत दूसरों के दरवाज़े खटखटाते हुए की और आज वही जनता ने उसे अपने क्षेत्र का नगरसेवक बना दिया।
यह कहानी सिर्फ़ चुनाव जीतने की नहीं है, बल्कि उस भरोसे की है जो वर्षों की निस्वार्थ सेवा से पैदा हुआ।
संघर्ष से सेवा तक का सफर
उत्तर नागपुर की बस्ती में गौतम को हर कोई जानता था। सुबह होते ही हाथ में अख़बार और चेहरे पर मुस्कान लिए वह घर-घर पहुँच जाता था। लेकिन गौतम सिर्फ़ अख़बार बाँटने तक सीमित नहीं रहा। जिस घर में दुख होता, वहाँ सबसे पहले वही पहुँचता। किसी के यहाँ शादी-ब्याह हो या कोई छोटा कार्यक्रम, मदद के लिए गौतम हमेशा तैयार रहता।
लोगों के सुख-दुख में खड़ा रहना ही धीरे-धीरे उसकी पहचान बन गया। बिना किसी पद, बिना किसी प्रचार के, उसने जनता के दिलों में अपनी जगह बना ली।
आर्थिक अभावों में पला परिवार
गौतम मूल रूप से इंदौर के भंडार मोहल्ला निवासी परिवार से आता है। उसके पिता हरिभाऊ आपूर्ति कार्यालय में कार्यरत थे। परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य नहीं थी। सात भाई और तीन बहनों वाले इस परिवार में ज़िम्मेदारियाँ जल्दी आ गईं।
इन ज़िम्मेदारियों के बीच शिक्षा और सेवा दोनों को साथ लेकर चलना आसान नहीं था, लेकिन परिवार ने कभी हार नहीं मानी।
बहन सरोज बनी प्रेरणा की मिसाल
गौतम के जीवन में उसकी बहन सरोज की भूमिका बेहद अहम रही। सरोज ने अपने जीवन को परिवार और समाज के लिए समर्पित कर दिया। अविवाहित रहते हुए उन्होंने पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाली और भाई-बहनों को डॉ. बाबा साहब आंबेडकर के विचारों से जोड़कर रखा।
वे अक्सर बाबा साहब का यह कथन दोहराती थीं—शिक्षा शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा वह दहाड़े बिना नहीं रहेगा। सरोज स्वयं भदंत आर्य नागार्जुन सुरई की सेविका रहीं और बुद्ध विहार में रहकर सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाती रहीं।
पढ़ाई, मेहनत और रोज़गार की जद्दोजहद
गौतम ने अख़बार बाँटते हुए अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की। बाद में मुफ्त विद्यापीठ से स्नातक शिक्षा प्राप्त की। परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए उन्होंने बिजली विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में चपरासी की नौकरी भी की।
हालाँकि हालात मुश्किल थे, लेकिन उनके इरादे कभी कमजोर नहीं पड़े। उनके मन में हमेशा एक ही बात थी—जनता की सेवा करनी है, किसी पद के लिए नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के लिए।
राजनीति से पहले समाजसेवा
राजनीति में आने से पहले गौतम का नाम समाजसेवा में जाना जाता था। वे कई सामाजिक कार्यक्रमों, भजन रसोई और जरूरतमंदों की मदद से जुड़े रहे। धीरे-धीरे राजनीतिक लोगों के संपर्क में आए, लेकिन उन्होंने कभी दिखावे की राजनीति नहीं की। उनका काम ही उनका प्रचार बन गया।
जब इस बार नगरसेवक चुनाव के लिए गौतम ने पर्चा भरा, तो बहुतों को हैरानी हुई। लेकिन बस्ती की जनता जानती थी कि यह चुनाव किसी नेता का नहीं, अपने ही बेटे का है।
नतीजा सामने आया—गौतम ने भारी मतों से जीत दर्ज की। यह जीत पैसे, पोस्टर या बड़े भाषणों की नहीं थी, बल्कि वर्षों के विश्वास और सेवा की थी।
आज गौतम नगरसेवक हैं, लेकिन लोगों के लिए वे अब भी वही सुबह अख़बार लाने वाला बेटा हैं। उनकी जीत ने यह साबित कर दिया कि अगर राजनीति में ईमानदारी और सेवा हो, तो जनता आज भी ऐसे चेहरों को चुनती है।
नागपुर की इस जीत ने एक संदेश दिया है—संघर्ष से निकला इंसान ही जनता की असली आवाज़ बन सकता है।