SC Forms Expert Committee for Aravalli Mining: देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली पहाड़ियों में अवैध खनन की समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली क्षेत्र में खनन और इससे जुड़े अन्य मामलों की गहन जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने का फैसला किया है। यह समिति पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों से मिलकर बनेगी जो इस संवेदनशील मुद्दे पर विस्तार से काम करेंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि अवैध खनन से होने वाला नुकसान अक्सर ऐसा होता है जिसे वापस ठीक नहीं किया जा सकता। यह बयान इस बात की गंभीरता को दर्शाता है कि अरावली जैसी प्राकृतिक संपदा के साथ किस तरह की लापरवाही हो रही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह आदेश दिया। इस पीठ में जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली भी शामिल थे।
अदालत का आदेश और समिति का गठन
अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और एमिकस क्यूरी के परमेश्वर को निर्देश दिया है कि वे चार हफ्ते के भीतर ऐसे पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के नाम सुझाएं जिन्हें खनन के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल है। इन विशेषज्ञों की मदद से एक मजबूत समिति बनाई जाएगी जो अरावली में खनन से जुड़े हर पहलू की जांच करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यह विशेषज्ञ समिति सीधे अदालत के निर्देशन और निगरानी में काम करेगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि जांच निष्पक्ष और प्रभावी तरीके से हो। यह व्यवस्था इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अरावली का मामला सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं है बल्कि यह राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली जैसे कई क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है।
राजस्थान सरकार का आश्वासन
सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने अदालत को भरोसा दिलाया कि राज्य में किसी भी तरह का अनधिकृत खनन नहीं होने दिया जाएगा। अदालत ने इस आश्वासन को नोट किया और इसे रिकॉर्ड में दर्ज किया। यह एक सकारात्मक संकेत है कि राज्य सरकार अब इस मामले को गंभीरता से ले रही है।
हालांकि, पिछले कई सालों से अरावली क्षेत्र में अवैध खनन की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। कई बार स्थानीय प्रशासन और माफिया के बीच की मिलीभगत की भी बातें सामने आई हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह कदम बेहद जरूरी और समय की मांग है।
अरावली की परिभाषा पर आदेश को टाला गया
कोर्ट ने अपने पहले के एक आदेश को भी कुछ समय के लिए रोक दिया है। यह आदेश 20 नवंबर को दिया गया था जिसमें अरावली पहाड़ियों और श्रृंखलाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया गया था। अदालत ने इस आदेश को फिलहाल लागू नहीं किया है ताकि विशेषज्ञ समिति पूरी तरह से जांच करके एक ठोस राय दे सके।
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अरावली की सीमा और उसकी परिभाषा को लेकर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मान्यताएं रही हैं। कहीं पर कुछ क्षेत्रों को अरावली का हिस्सा माना जाता है तो कहीं उसी क्षेत्र को बाहर रखा जाता है। इस भ्रम की स्थिति का फायदा अवैध खनन करने वाले उठाते रहे हैं।
अवैध खनन से होने वाले नुकसान
अरावली पर्वत श्रृंखला सिर्फ भौगोलिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह पर्यावरण की दृष्टि से भी बेहद जरूरी है। यह दिल्ली और आसपास के इलाकों के लिए एक प्राकृतिक बाधा का काम करती है जो रेगिस्तानी हवाओं को रोकती है। इसके अलावा यह भूजल स्तर को बनाए रखने में भी मदद करती है।
लेकिन पिछले कुछ दशकों में बेतहाशा खनन ने इस पूरी व्यवस्था को खतरे में डाल दिया है। पहाड़ियों को काटकर बजरी और पत्थर निकाले जाने से न सिर्फ पहाड़ समाप्त हो रहे हैं बल्कि जंगल, जानवर और स्थानीय पर्यावरण भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। कई इलाकों में तो पहाड़ पूरी तरह गायब हो चुके हैं।
विशेषज्ञ समिति की भूमिका
अब जो विशेषज्ञ समिति बनने जा रही है, उसकी जिम्मेदारी बहुत बड़ी होगी। इस समिति को यह तय करना होगा कि अरावली की सही परिभाषा क्या होनी चाहिए, किन क्षेत्रों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए और किन इलाकों में नियंत्रित तरीके से खनन की इजाजत दी जा सकती है। साथ ही यह भी देखना होगा कि जो नुकसान पहले ही हो चुका है, उसकी भरपाई कैसे की जाए।
समिति को यह भी सुझाव देना होगा कि भविष्य में अवैध खनन को कैसे रोका जाए और किस तरह की निगरानी व्यवस्था बनाई जाए। इसके लिए तकनीक का इस्तेमाल, सैटेलाइट मॉनिटरिंग और नियमित जांच जैसे उपायों पर विचार किया जा सकता है।
राष्ट्रीय महत्व का मामला
SC Forms Expert Committee for Aravalli Mining: यह मामला सिर्फ अरावली तक सीमित नहीं है। यह एक उदाहरण है कि पूरे देश में प्राकृतिक संसाधनों का किस तरह दोहन हो रहा है। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब देखना यह होगा कि विशेषज्ञ समिति कैसे काम करती है और उसकी सिफारिशों को कितनी गंभीरता से लागू किया जाता है।
समाज की जिम्मेदारी
सरकार और अदालत के फैसलों के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि आम लोग भी इस मुद्दे पर जागरूक हों। अरावली जैसी प्राकृतिक धरोहरों की रक्षा सिर्फ कानून से नहीं बल्कि सामाजिक चेतना से भी होती है। लोगों को यह समझना होगा कि प्रकृति का संरक्षण उनके अपने भविष्य का संरक्षण है।