झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले में गुरुवार की सुबह सुरक्षा बलों ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। सारंडा जंगल के घने इलाके में चलाए गए ऑपरेशन में सुरक्षा बलों ने 1 करोड़ रुपए के इनाम वाले शीर्ष नक्सली नेता पतिराम मांझी उर्फ अनल दा समेत 15 माओवादियों को मार गिराया है। यह झारखंड में माओवादियों के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाइयों में से एक मानी जा रही है।
सीआरपीएफ की विशेष कोबरा यूनिट की 209वीं बटालियन के नेतृत्व में करीब 1500 जवानों ने यह अभियान चलाया। किरीबुरु थाना क्षेत्र के सारंडा जंगल के कुमड़ी इलाके में मंगलवार से ही यह ऑपरेशन जारी था, लेकिन गुरुवार सुबह करीब 6 बजे नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच भयंकर मुठभेड़ शुरू हो गई।
कैसे हुई यह मुठभेड़
प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, सीआरपीएफ की कोबरा 209 बटालियन और राज्य पुलिस की संयुक्त टीम गुरुवार तड़के सारंडा वन के कुंभदिह गांव के आस-पास गश्त कर रही थी। इस दौरान उन्हें खुफिया सूचना मिली थी कि पतिराम मांझी उर्फ अनल दा और लालचंद हेमब्रम उर्फ अनमोल के नेतृत्व वाले माओवादी दस्ते इस क्षेत्र में छिपे हुए हैं।
जैसे ही सुरक्षा बलों ने इलाके को घेरने की कोशिश की, छिपे हुए नक्सलियों ने अचानक भारी गोलीबारी शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों ने भी मोर्चा संभाला और घंटों तक मुठभेड़ चलती रही। इस दौरान 15 नक्सली मारे गए, जिनमें शीर्ष नेता अनल दा भी शामिल था।
भारी मात्रा में हथियार बरामद
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि मुठभेड़ के बाद मौके से भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद बरामद किया गया है। इनमें एके-47 राइफलें, इंसास राइफलें, स्वचालित हथियार, ग्रेनेड और भारी मात्रा में गोलियां शामिल हैं। सुरक्षा बलों ने इलाके की तलाशी अभी भी जारी रखी है, क्योंकि कुछ नक्सलियों के भागने की आशंका है।
झारखंड पुलिस के महानिदेशक (ऑपरेशन) माइकल राज एस ने जानकारी देते हुए कहा कि सभी भागने के रास्तों को बंद करने के लिए अतिरिक्त बल भेजे गए हैं। पूरे सारंडा आरक्षित वन क्षेत्र में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है।
कौन था अनल दा
मारे गए शीर्ष नक्सली नेता पतिराम मांझी उर्फ अनल दा गिरिडीह जिले के पीरतंद गांव का रहने वाला था। वह 1987 से ही माओवादी गतिविधियों में सक्रिय था, यानी करीब 38 सालों से वह नक्सली आंदोलन का हिस्सा था। झारखंड पुलिस वर्षों से उसकी तलाश कर रही थी और उसके सिर पर 1 करोड़ रुपए का इनाम रखा गया था।
अनल दा सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति का महत्वपूर्ण सदस्य था और झारखंड में नक्सली गतिविधियों को संचालित करने में उसकी अहम भूमिका थी। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, वह कई हिंसक घटनाओं और हमलों की योजना बनाने में शामिल था।
रणनीतिक योजना के तहत हुआ ऑपरेशन
यह ऑपरेशन कोई अचानक नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा था। सीआरपीएफ के महानिदेशक (ऑपरेशन) ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने सोमवार को ही चाईबासा में एक अहम बैठक की थी। इस बैठक में माओवादी दस्तों पर अंतिम हमले के लिए रणनीति तैयार की गई थी।
खुफिया तंत्र से मिली सूचना के आधार पर यह पता चला था कि केंद्रीय समिति के सदस्य मिसिर बेसरा उर्फ निर्भय, असीम मंडल उर्फ तिमिर और पतिराम मांझी उर्फ अनल दा सारंडा जंगल क्षेत्र में सक्रिय हैं। इसी आधार पर यह अभियान शुरू किया गया था।
सारंडा जंगल क्यों है खास
झारखंड में सारंडा जंगल को नक्सलियों का सबसे बड़ा और अंतिम गढ़ माना जाता है। यह घना जंगल भौगोलिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण इलाका है। यहां की पहाड़ियां, घाटियां और जंगली रास्ते नक्सलियों को छिपने और हमले करने के लिए आदर्श स्थान प्रदान करते हैं।
कोल्हान क्षेत्र और सारंडा जंगल दशकों से माओवादियों की शरणस्थली रहे हैं। लेकिन अब सुरक्षा बलों ने इन इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी है। पिछले कुछ वर्षों में बुडा पहाड़, चतरा, लातेहार, गुमला, लोहरदगा, रांची और पारसनाथ जैसे इलाकों में नक्सली गतिविधियों को काफी हद तक सीमित किया जा चुका है।
आगे का रोडमैप
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह कार्रवाई झारखंड में नक्सलवाद को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। अधिकारियों ने बताया कि आने वाले दिनों में ऐसे और भी अभियान चलाए जाएंगे ताकि नक्सली गतिविधियों को पूरी तरह से समाप्त किया जा सके।
झारखंड सरकार और केंद्रीय सुरक्षा बलों ने मिलकर नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास कार्य भी तेज किए हैं। सड़कें, स्कूल, अस्पताल और रोजगार के अवसर बढ़ाए जा रहे हैं ताकि स्थानीय युवा नक्सली गतिविधियों की ओर आकर्षित न हों।
चुनौतीपूर्ण इलाका, लेकिन दृढ़ संकल्प
सीआरपीएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सारंडा जंगल में ऑपरेशन करना बेहद मुश्किल है। यहां संचार व्यवस्था कमजोर है, रास्ते दुर्गम हैं और घना जंगल दृश्यता को सीमित करता है। लेकिन जवानों के दृढ़ संकल्प और आधुनिक तकनीक की मदद से यह कार्रवाई सफल रही।
मुठभेड़ में किसी सुरक्षाकर्मी के घायल होने की खबर नहीं है, जो इस ऑपरेशन की सावधानीपूर्वक योजना और बेहतरीन निष्पादन को दर्शाता है।
यह कार्रवाई न केवल सुरक्षा बलों की मजबूती को दिखाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की सख्त नीति रंग ला रही है। झारखंड के लोगों को उम्मीद है कि जल्द ही पूरा राज्य नक्सल हिंसा से मुक्त होगा और शांति और विकास का माहौल बनेगा।