Saranda Naxal Encounter: झारखंड के सारंडा जंगल एक बार फिर देश की सुरक्षा रणनीति के केंद्र में आ गए हैं। यह वही इलाका है, जिसे लंबे समय तक नक्सलियों का अभेद्य किला माना जाता रहा। लेकिन इस बार तस्वीर बदली हुई है। पश्चिमी सिंहभूम जिले में चलाए गए ऑपरेशन मेघाबुरू ने न सिर्फ नक्सलियों को भारी नुकसान पहुंचाया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि अब जंगलों में कानून का राज स्थापित करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाए जा रहे हैं। जिन इलाकों में कभी पुलिस का पहुंचना भी चुनौती माना जाता था, आज वहीं सुरक्षाबल 37 घंटे तक डटे रहकर अभियान को अंजाम दे रहे हैं।
37 घंटे चला सर्च और मुठभेड़ अभियान
सुरक्षा बलों को जैसे ही बड़े नक्सली दस्ते की मौजूदगी की सूचना मिली, इलाके को घेर लिया गया। लगातार 37 घंटे तक चले सर्च और मुठभेड़ अभियान के दौरान जंगलों में भारी गोलीबारी होती रही। इस दौरान सुरक्षाबलों ने नक्सलियों को पीछे हटने का मौका नहीं दिया और दबाव बनाए रखा।
13 इनामी नक्सलियों का खात्मा
इस अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि 13 इनामी नक्सलियों का मारा जाना है। इन सभी पर कुल 4.49 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि मारे गए नक्सली संगठन में कितनी ऊंची भूमिका निभा रहे थे। इनमें एक महिला नक्सली का मारा जाना भी शामिल है, जो सक्रिय दस्ते का हिस्सा थी। मारी गई महिला नक्सली मुवति होनहांगा पर 2 लाख रुपये का इनाम था।
टॉप कमांडर रापा मुंडा का अंत
इस मुठभेड़ में जो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है, वह है जोनल कमांडर रापा उर्फ रापा मुंडा। उस पर झारखंड और ओडिशा सरकार की ओर से कुल 35 लाख रुपये का इनाम था। वह कई बड़े हमलों का मास्टरमाइंड रहा था, जिसमें झारखंड जगुआर के जवान की शहादत वाला आईईडी विस्फोट भी शामिल है। उसका मारा जाना नक्सली नेतृत्व के लिए अपूरणीय क्षति है।
शवों को निकालने में आई चुनौतियां
इलाके की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शवों को बाहर लाने के लिए छह ट्रैक्टरों और कई मजिस्ट्रेटों को तैनात करना पड़ा। लगातार फायरिंग के कारण प्रशासनिक टीम को भी कई बार पीछे हटना पड़ा। जब हालात नियंत्रण में आए, तब जाकर शवों को जंगल से बाहर लाया जा सका।
नाकेबंदी से गांवों की जिंदगी ठहरी
मुठभेड़ के दौरान आसपास के गांवों में रहने वाले परिवारों की जिंदगी थम सी गई। सुरक्षा कारणों से रास्तों पर नाकेबंदी कर दी गई, जिससे ग्रामीणों का आवागमन बंद रहा। डर और अनिश्चितता के बीच लोगों ने अपने घरों में ही शरण ली।
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि जंगल में अब भी कुछ हार्डकोर नक्सली छिपे हो सकते हैं। मुठभेड़ स्थल पर 20 से ज्यादा नक्सलियों की मौजूदगी की सूचना थी। ऐसे में यह अभियान पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और सर्च ऑपरेशन जारी है।
नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक मोड़
पिछले 10 महीनों में यह तीसरी बड़ी कार्रवाई है, जिसमें करोड़ों के इनामी नक्सली मारे गए हैं। यह साफ संकेत है कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा घोषित 31 मार्च 2026 की समयसीमा को देखते हुए यह ऑपरेशन बेहद अहम माना जा रहा है।