Mardaani 3: ‘मर्दानी’ फ्रेंचाइजी ने हमेशा सिर्फ एक महिला पुलिस अफसर की कहानी नहीं कही, बल्कि समाज के उन अंधेरे कोनों की ओर उंगली उठाई है, जहां कानून पहुंचते-पहुंचते अक्सर देर हो जाती है। ‘मर्दानी 3’ उसी परंपरा को और ज्यादा गंभीर, और ज्यादा बेचैन करने वाले अंदाज में आगे बढ़ाती है। ट्रेलर ने पहले ही इशारा कर दिया था कि इस बार कहानी आसान नहीं होगी, और फिल्म का पहला हिस्सा इस वादे पर पूरी तरह खरी उतरता दिखता है।
शिवानी शिवाजी रॉय: वर्दी में खड़ी एक जिद
रानी मुखर्जी का किरदार शिवानी शिवाजी रॉय अब सिर्फ एक सख्त पुलिस अफसर नहीं रह गया है। इस फिल्म में वह अनुभव, गुस्सा, संवेदना और जिम्मेदारी का मिश्रण बनकर सामने आती हैं। उनके चेहरे पर अब सिर्फ सख्ती नहीं, बल्कि बीते मामलों की थकान और समाज से लगातार लड़ते रहने का बोझ भी झलकता है।
रानी मुखर्जी ने एक बार फिर साबित किया है कि यह किरदार उनके लिए अभिनय नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी जैसा बन चुका है। उनकी आंखों में आक्रोश है, आवाज में ठहराव है और फैसलों में वह दृढ़ता, जो शिवानी को भीड़ से अलग करती है।
कहानी का केंद्र: दो बच्चियां, दो सच्चाइयां
फिल्म की कहानी एक हाई-प्रोफाइल किडनैपिंग केस से शुरू होती है। एक एम्बेसेडर की बेटी और उसके केयरटेकर की बेटी को अगवा कर लिया जाता है। शुरुआती जांच में मामला संवेदनशील है, इसलिए सिस्टम पूरी ताकत के साथ सक्रिय हो जाता है। फाइलें तेजी से खुलती हैं, मीटिंग्स होती हैं और हर संसाधन झोंक दिया जाता है।
लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, एक कड़वा सच सामने आता है। अपहरण सिर्फ एक बच्ची को बचाने का मिशन नहीं था, बल्कि यह एक बड़े मानव तस्करी नेटवर्क का हिस्सा है, जो समाज की सबसे कमजोर कड़ी पर पलता है।
एक खलनायक जो अंदर तक हिला देता है
‘मर्दानी 3’ का सबसे खतरनाक पहलू है इसका विलेन — अम्मा। यह किरदार किसी फिल्मी खलनायक की तरह चिल्लाता नहीं, बल्कि खामोशी से डर पैदा करता है। अम्मा एक ऐसी महिला है, जो भिखारी-माफिया और ट्रैफिकिंग रिंग को नियंत्रित करती है। उसके लिए बच्चे सिर्फ सौदे की चीज हैं।
अम्मा की मौजूदगी सिर्फ अपराध तक सीमित नहीं रहती, वह शिवानी की निजी जिंदगी तक पहुंच जाती है। यही टकराव फिल्म को और ज्यादा बेचैन करने वाला बना देता है। अम्मा हाल के वर्षों में बड़े पर्दे पर दिखे सबसे निर्मम और खौफनाक विलेन में गिनी जा सकती है।
क्या कानून सबके लिए बराबर है?
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका नैतिक सवाल है। जब एम्बेसेडर की बेटी को बचाने के लिए पूरा सिस्टम खड़ा है, तब क्या वही ताकत एक गरीब केयरटेकर की बच्ची के लिए भी दिखाई देगी? क्या इंसानियत का मूल्य हैसियत से तय होगा?
शिवानी का संघर्ष सिर्फ अपराधियों से नहीं है, बल्कि उस सोच से भी है, जो तय करती है कि किस जिंदगी को बचाना ज्यादा जरूरी है।
कहानी जो आपको बांध लेती है
फिल्म का पहला हिस्सा तेज, गंभीर और प्रभावशाली है। कहानी बिना भटके आगे बढ़ती है और दर्शक खुद को जांच का हिस्सा महसूस करने लगता है। रानी मुखर्जी पूरी तरह अपने किरदार में डूबी हुई नजर आती हैं और फिल्म का माहौल लगातार दबाव बनाता है।